अजीत मिश्रा (खोजी)
।। दावों के मीनार और खाली रसोई: प्रशासन की लचर व्यवस्था का जीता-जागता प्रमाण ।।
बस्ती मंडल, उत्तर प्रदेश।
बस्ती: एक तरफ एडीएम प्रतिपाल सिंह चौहान का आधिकारिक दावा है कि जिले में गैस सिलेंडर की कोई कमी नहीं है, वहीं दूसरी तरफ भानपुर स्थित एचपी गैस एजेंसी के बाहर घंटों से कतार में खड़े आम नागरिक इस ‘सरकारी सच’ का मजाक उड़ा रहे हैं। यह स्थिति उस खोखले प्रशासनिक तंत्र की पोल खोलती है, जो दफ्तर की वातानुकूलित कुर्सियों पर बैठकर जमीनी हकीकत को झुठलाने में माहिर है।
💫कागजी दावे बनाम बदहाल हकीकत
प्रशासन का कहना है कि गैस की कोई किल्लत नहीं है। लेकिन सवाल यह है कि यदि आपूर्ति सामान्य है, तो पिछले पांच दिनों से लोग अपनी रसोई का चूल्हा बुझाए क्यों भटक रहे हैं? क्या यह प्रशासनिक अयोग्यता नहीं है कि उपभोक्ता को सिलेंडर मिले नहीं, लेकिन उनके मोबाइल पर ‘डिलीवरी’ का मैसेज पहुंच जाए?
यह केवल एक तकनीकी गड़बड़ी नहीं, बल्कि भ्रष्टाचार और लापरवाही का स्पष्ट संकेत है। क्या यह मैसेज किसी बड़े घोटाले की ओर इशारा कर रहे हैं, जहाँ कागजों पर सिलेंडर किसी और को बेचे जा रहे हैं, जबकि असल उपभोक्ता लाइन में खड़ा है?
💫जब सरकारी ‘दावे’ और जनता के ‘खाली चूल्हे’ आमने-सामने हों
बस्ती। सत्ता के गलियारों में बैठकर ‘सब चंगा है’ का राग अलापना कितना आसान होता है, इसका जीता-जागता नमूना बस्ती में देखने को मिल रहा है। एडीएम प्रतिपाल सिंह चौहान ने बड़ी शान से वीडियो जारी कर कह दिया—’गैस की कोई कमी नहीं है।’ लेकिन जनाब, क्या आपकी नजरें भानपुर स्थित उस गैस एजेंसी की दहलीज तक नहीं पहुँच पाईं, जहाँ पिछले पांच दिनों से आम जनता का पसीना सिलेंडर की आस में सूख रहा है?
💫डिजिटल धोखाधड़ी या प्रशासनिक मिलीभगत?
सबसे बड़ा सवाल यह है कि सिलेंडर हाथ में नहीं, लेकिन मोबाइल पर ‘डिलीवरी’ का मैसेज किस जादू से पहुँच गया? क्या यह महज तकनीकी चूक है, या फिर कालाबाजारी का वह ‘डिजिटल खेल’, जिसमें गैस कागजों पर तो बिक जाती है, लेकिन रसोई तक नहीं पहुँचती? प्रशासन की यह ‘वर्चुअल सप्लाई’ उन घरों के लिए किसी मजाक से कम नहीं है, जहाँ चूल्हे खाली सिलेंडर के साथ ठंडे पड़े हैं।
💫’अफवाह’ का पर्दा और सच्चाई की मार
प्रशासन ने अपनी विफलता को छिपाने के लिए जनता की परेशानी को ‘अफवाह’ का नाम देकर पल्ला झाड़ लिया। लेकिन सच्चाई वीडियो की स्क्रिप्ट से नहीं, लाइन में लगे उन चेहरों से पूछिए जो अपनी मेहनत की कमाई का हिसाब मांग रहे हैं। अधिकारियों का वातानुकूलित कमरों में बैठकर आदेश देना और जनता का तपती धूप में दर-दर भटकना, यह इस बात का सबूत है कि प्रशासन पूरी तरह से ‘जमीन’ से कट चुका है।
💫समय है जवाबदेही का
🔥हम प्रशासन से पूछते हैं:
👉क्या आपकी मॉनिटरिंग सिस्टम केवल फाइलों तक सीमित है?
👉क्या उन जिम्मेदारों पर कार्रवाई होगी जिन्होंने फर्जी मैसेज भेजकर जनता को गुमराह किया?
👉एडीएम साहब का वह ‘आश्वस्त’ बयान किसके दबाव में था, या यह उनकी पूरी तरह से नाकामी?
जनता को अब वादों और वीडियो के डोज नहीं, बल्कि समाधान चाहिए। अगर प्रशासन ने अपनी आंखों से यह ‘पट्टी’ नहीं उतारी, तो जनता का सब्र का बांध टूटना तय है। यह समय केवल लीपापोती का नहीं, बल्कि पारदर्शी जांच और दोषियों को बेनकाब करने का है।
💫जनता की नाराजगी और सवालों के घेरे में प्रशासन
लोगों का गुस्सा जायज है। अधिकारी केवल वीडियो जारी कर जनता को ‘अफवाहों’ पर ध्यान न देने की सलाह दे रहे हैं, लेकिन जब खुद जनता पांच दिनों से खाली सिलेंडर लेकर घर लौट रही हो, तो उसे अफवाह कैसे माना जा सकता है?
💫प्रशासन से सवाल:
👉यदि सिलेंडर उपलब्ध हैं, तो एजेंसी पर भीड़ क्यों है?
👉बिना सिलेंडर दिए ‘डिलीवरी’ के मैसेज किसके कहने पर भेजे गए?
👉क्या एडीएम साहब का बयान जमीनी हकीकत से अनभिज्ञता का परिणाम है, या फिर जानबूझकर सच को छिपाने की कोशिश?
अधिकारियों को यह समझ लेना चाहिए कि जनता अब उनके डिजिटल दावों और हकीकत के बीच का अंतर बखूबी समझती है। यदि प्रशासन ने तुरंत इस पूरे मामले की पारदर्शी जांच नहीं की और आपूर्ति श्रृंखला को दुरुस्त नहीं किया, तो यह नाराजगी और बढ़ सकती है।








