
अजीत मिश्रा (खोजी)
बस्ती का स्वास्थ्य तंत्र या ‘मौत का सौदागर’: प्रशासन की खामोशी कब टूटेगी?
ब्यूरो रिपोर्ट, बस्ती मंडल
- जांच के नाम पर ‘लीपा-पोती’ का ढकोसला, बस्ती में कब तक मासूमों की बलि चढ़ाएगा यह अस्पताल?
- एक साल, दो मौतें और फिर भी खुला अस्पताल—क्या बस्ती स्वास्थ्य विभाग ‘लाशों का सौदागर’ है?
- बस्ती स्वास्थ्य विभाग की शर्मनाक सच्चाई: लाइसेंस मिला, लेकिन सुरक्षा गायब!
बस्ती में स्वास्थ्य सेवाओं के नाम पर क्या चल रहा है? क्या जिला प्रशासन और स्वास्थ्य विभाग ने अपनी आँखें बंद कर ली हैं? जिगिना चौराहा स्थित एक निजी अस्पताल में एक और नवजात की मौत ने फिर से साबित कर दिया है कि यहाँ का स्वास्थ्य ढांचा पूरी तरह खोखला और संवेदनहीन हो चुका है।
क्या ये अस्पताल हैं या ‘कसाईखाने’?
हैरानी की बात यह है कि जिस अस्पताल में एक साल के भीतर दो मौतें हो चुकी हैं, उसे लाइसेंस कैसे मिल गया? जब पिछले साल जुलाई 2025 में भी यहाँ लापरवाही की घटना सामने आई थी, तो प्रशासन तब क्या कर रहा था? क्या विभाग को एक और मासूम की बलि चढ़ने का इंतज़ार था? यह केवल ‘लापरवाही’ नहीं, बल्कि ‘आपराधिक खेल’ है, जिसे पैसे की हवस में खेला जा रहा है।
खोखले दावे और फाइलें दबाने की संस्कृति
प्रशासन का यह कहना कि ‘मामले की जांच हो रही है’ और ‘पोस्टमॉर्टम रिपोर्ट का इंतज़ार है’, जनता के साथ मज़ाक है। हर बार जब कोई घटना होती है, विभाग एक जांच टीम गठित कर देता है, कुछ दिन शोर होता है, और फिर सब कुछ फाइलों में दब जाता है। अस्पताल प्रबंधन के खिलाफ कोई ठोस कार्रवाई न होना यह दर्शाता है कि इनकी सांठगांठ कितनी गहरी है।
सिस्टम की लाचारी का फायदा उठा रहे निजी अस्पताल
रिपोर्ट के अनुसार, इस अस्पताल में न तो पर्याप्त एक्सपर्ट डॉक्टर हैं और न ही गंभीर मरीजों को संभालने की व्यवस्था। दिन के 2 बजे के बाद वहाँ सिर्फ कर्मचारी मिलते हैं। जब अस्पताल के पास मूलभूत सुविधाएं ही नहीं हैं, तो उन्हें मरीजों की जान से खेलने की अनुमति किसने दी?
हमारी मांग:
- तुरंत सील हो अस्पताल: बिना किसी और देरी के उस अस्पताल का लाइसेंस रद्द कर उसे स्थायी रूप से सील किया जाए।
- जवाबदेही तय हो: पिछले एक साल में हुई मौतों के लिए अस्पताल के मालिकों और जिम्मेदार अधिकारियों पर सख्त आपराधिक मुकदमा दर्ज हो।
- जांच में पारदर्शिता: जांच के नाम पर होने वाले ‘लीपा-पोती’ के खेल को बंद कर, दोषियों को जेल की सलाखों के पीछे भेजा जाए।
बस्ती की जनता अब और खामोश नहीं रहेगी। अगर प्रशासन ने इस बार भी रसूखदारों के दबाव में कोई ढिलाई बरती, तो यह जनता के विश्वास की हत्या होगी। क्या मुख्यमंत्री के स्तर से इस पूरे रैकेट की निष्पक्ष जांच नहीं होनी चाहिए?
जागो, बस्ती के जिम्मेदार अधिकारियों! मासूमों की चीखें और उनके माता-पिता के आंसू आपसे जवाब मांग रहे हैं।

















