उत्तर प्रदेशबस्ती

बहादुरपुर ब्लॉक में ‘जंगलराज’: फर्जी प्रमुख का दबदबा, पिस्टल के दम पर चल रहा है प्रशासन

बहादुरपुर ब्लॉक में 'गुंडागर्दी': नकली प्रमुख के बेटे पर दूसरी बार FIR पिस्टल की नोक पर चल रहा बहादुरपुर ब्लॉक: अधिकारी बेबस, प्रमुख बंधक

अजीत मिश्रा (खोजी)

कुर्सी की गरिमा तार-तार: बकौल ‘नकलची’ और अराजकता का नंगा नाच

  • क्या बीडीओ और प्रधान सुरक्षित हैं? बहादुरपुर में ‘नकलची’ पिता-पुत्र का आतंक
  • 20 करोड़ के भुगतान पर बवाल: बहादुरपुर ब्लॉक में कमीशनखोरी और मारपीट के आरोप
  • असली प्रमुख दरकिनार, नकली का राज: बहादुरपुर ब्लॉक में फिर गरमाया विवाद

​बस्ती जिले की प्रशासनिक व्यवस्था इस समय एक ऐसे दौर से गुजर रही है, जहाँ ‘कानून’ शब्द का अर्थ शायद केवल फाइलों की शोभा बढ़ाना रह गया है। हालिया घटनाक्रम ने यह साबित कर दिया है कि सत्ता की हनक और संरक्षण में पल रहे कुछ लोग ब्लॉक कार्यालय को अपनी ‘निजी जागीर’ और ‘लूट का अड्डा’ समझने की भूल कर रहे हैं।बस्ती जिले का बहादुरपुर ब्लॉक इस समय चर्चा का केंद्र बना हुआ है, लेकिन वजह विकास कार्य नहीं, बल्कि यहाँ चल रही प्रशासनिक अराजकता है। यहाँ के ‘नकलची प्रमुख’ केके दूबे के पुत्र शैलेंद्र दूबे पर दूसरी बार एफआईआर दर्ज की गई है, जो क्षेत्र में व्याप्त गुंडागर्दी और सरकारी तंत्र की लाचारी को बयां करती है।

क्या है पूरा मामला?

  • पिस्टल के दम पर आदेश: आरोप है कि शैलेंद्र दूबे ब्लॉक कार्यालय में बैठकर बीडीओ (BDO) और अन्य अधिकारियों को पिस्टल की नोक पर आदेश-निर्देश देते हैं।
  • पहली एफआईआर: इससे पहले, तत्कालीन बीडीओ दुर्गा दत्त शुक्ल ने 20 करोड़ रुपये के कार्यों को पिस्टल के दम पर जबरन स्वीकृत करवाने और उनका चश्मा तोड़ देने के आरोप में 2 दिसंबर को एफआईआर दर्ज कराई थी।
  • ताजा घटना: हालिया मामला 21 जून 2026 का है, जिसमें ग्राम पंचायत अबेनीपुर के प्रधान का काम देखने वाले अजय प्रताप चौधरी को पिस्टल से धमकाने और उसकी बट से मारपीट करने का आरोप लगा है। इस मामले में शैलेंद्र दूबे, उनके पुत्र सौरभ, कृष्ण मुरारी, शिवम दूबे और 15 अज्ञात लोगों पर केस दर्ज किया गया है।

​बहादुरपुर के तथाकथित ‘नकलची प्रमुख’ केके दूबे के पुत्र शैलेंद्र दूबे पर दूसरी बार एफआईआर दर्ज होना कोई मामूली घटना नहीं है, बल्कि यह जिले में व्याप्त प्रशासनिक अराजकता का एक स्याह उदाहरण है। एक तरफ ब्लॉक का असली प्रमुख असहाय खड़ा तमाशा देख रहा है, और दूसरी तरफ एक ऐसा व्यक्ति, जिसे कुर्सी पर बैठने का कोई संवैधानिक अधिकार नहीं है, वह पिस्टल की नोक पर बीडीओ को आदेश दे रहा है।

इस पूरे प्रकरण का सबसे शर्मनाक पहलू यह है कि ब्लॉक के ‘असली प्रमुख’ रामकुमार को कुर्सी पर बैठने का मौका ही नहीं मिल रहा है। खबरों के अनुसार, असली प्रमुख को ही उनके घर में बंधक बनाकर या उन्हें किनारे रखकर ‘नकलची प्रमुख’ और उनका पुत्र ब्लॉक को अपनी बपौती समझकर चला रहे हैं। यह जिला और प्रदेश का संभवतः पहला ऐसा ब्लॉक है, जहाँ लोगों ने अपने फायदे के लिए असली प्रमुख को ही अगवा कर लिया।

कमीशन और लूट का खेल

  • घटना का मुख्य कारण मनरेगा के कार्यों का भुगतान और कमीशन का विवाद बताया जा रहा है।
  • आरोप है कि ये लोग चाहते थे कि उनके पसंदीदा प्रधानों का ही भुगतान हो और जो कमीशन नहीं दे रहे थे, उन्हें प्रताड़ित किया जा रहा था।
  • शैलेंद्र दूबे और उनके साथियों ने प्रधानों से कमीशन न देने पर गुस्सा जाहिर किया और गुंडागर्दी की।

सत्ता के संरक्षण में पनपती गुंडागर्दी

आरोप है कि शैलेंद्र दूबे और उनके साथियों ने न केवल फर्जी भुगतान के लिए दबाव बनाया, बल्कि सरकारी अधिकारियों के साथ मारपीट और अभद्रता करने की हदें पार कर दीं। 20 करोड़ के कार्यों में पिस्टल की नोक पर जबरिया स्वीकृति लेने का आरोप हो या फिर हालिया घटना में ग्राम पंचायत अबेनीपुर के प्रधान को धमकाने और मारपीट करने का मामला, यह स्पष्ट है कि इन्हें किसी का डर नहीं है।

असली प्रमुख की लाचारी और सवालिया निशान

यह स्थिति न केवल शर्मनाक है बल्कि व्यवस्था पर एक गहरा तमाचा है कि जिले में एक ऐसा ब्लॉक भी मौजूद है, जहाँ असली प्रमुख को ही बंधक बनाकर ‘नकली प्रमुख’ अपनी मनमानी चला रहे हैं। क्या जिले का प्रशासन इतना कमजोर हो चुका है कि एक ब्लॉक कार्यालय का संचालन ‘पिस्टल की बट’ तय करेगी?पिता-पुत्र की जोड़ी को पूर्व सांसद का संरक्षण प्राप्त है, जिसके चलते वे ब्लॉक कार्यालय को अपनी मर्जी से चला रहे हैं। यहाँ तक कि शैलेंद्र दूबे ने अपनी रसूख का इस्तेमाल कर लखनऊ में नगर पंचायत अध्यक्ष के लिए आलीशान बंगला भी बनवा लिया है।

यह पूरा घटनाक्रम न केवल स्थानीय प्रशासन की विफलता को दर्शाता है, बल्कि इस बात की ओर भी इशारा करता है कि कैसे कुछ लोग राजनीतिक संरक्षण का लाभ उठाकर लोकतंत्र की गरिमा को तार-तार कर रहे हैं।

निष्कर्ष: यह मामला सिर्फ शैलेंद्र दूबे के खिलाफ एफआईआर तक सीमित नहीं है, बल्कि यह उस संरक्षण-तंत्र की जांच की मांग करता है जिसके दम पर ये लोग ब्लॉक को अपनी ‘बपौती’ समझते हैं। यदि अब भी सख्त कार्रवाई नहीं हुई, तो कानून का शासन केवल कागजों तक ही सिमट कर रह जाएगा। समय आ गया है कि इन ‘नकलची प्रमुखों’ के दबदबे को खत्म कर लोकतंत्र की मर्यादा को बहाल किया जाए।

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