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उत्तर प्रदेशबस्ती

विकास या विनाश? 14 गांवों के अस्तित्व पर मंडराया एथनॉल फैक्ट्री का खतरा!

ग्रामीणों का फूटा गुस्सा: 'फैक्ट्री नहीं, हमें अपना भविष्य बचाना है' प्रशासन की मिलीभगत या अनदेखी? जनसुनवाई के बिना ही शुरू हुआ एथनॉल फैक्ट्री का निर्माण!

अजीत मिश्रा (खोजी)

संपादकीय: विकास की अंधी दौड़ में दांव पर ग्रामीणों का भविष्य और अस्तित्व

  • भूजल पर डाका और खेती की बर्बादी: एथनॉल फैक्ट्री के खिलाफ ग्रामीणों ने खोला मोर्चा!
  • चेतावनी: यदि समय रहते नहीं रुकी फैक्ट्री, तो होगा बड़ा जन आंदोलन!

बस्ती: क्या ‘विकास’ की परिभाषा सिर्फ फैक्ट्रियों की चिमनियाँ खड़ी करना है? या फिर असली विकास वह है, जिसमें स्थानीय लोगों की सुरक्षा, पर्यावरण और भविष्य सुरक्षित हो? बस्ती जिले के भानपुर तहसील में ग्राम दसिया में प्रस्तावित एथनॉल फैक्ट्री के खिलाफ ग्रामीणों द्वारा खोला गया मोर्चा इसी सवाल को रेखांकित करता है।

​यह खबर केवल एक निर्माण कार्य के विरोध की नहीं है, बल्कि उस व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े करती है, जो स्थानीय आबादी की चिंताओं को दरकिनार कर अपनी परियोजनाओं को थोपना चाहती है। 14-15 गांवों की घनी आबादी, 200 मीटर की दूरी पर स्थित सरकारी विद्यालय और गिरता भूजल स्तर—क्या ये तथ्य प्रशासन को दिखाई नहीं दे रहे?

सवाल प्रशासन की कार्यप्रणाली पर:

ग्रामीणों का यह आरोप अत्यंत गंभीर है कि इस परियोजना के लिए न तो कोई उचित ‘जनसुनवाई’ की गई और न ही ‘पर्यावरणीय प्रभाव आकलन’ की जानकारी सार्वजनिक की गई। यदि परियोजना पारदर्शी है, तो उसे छिपाने की क्या आवश्यकता है? क्या स्थानीय निवासियों का यह जानने का अधिकार नहीं है कि उनके घर, खेत और स्वास्थ्य पर इसका क्या असर पड़ेगा?

भूजल संकट और पर्यावरणीय खतरे:

एथनॉल उत्पादन में पानी की भारी खपत जगजाहिर है। जब क्षेत्र पहले से ही भूजल संकट से जूझ रहा है, ऐसे में यह फैक्ट्री इलाके के किसानों, पशुओं और आम जनजीवन के लिए ‘मौत का परवाना’ साबित हो सकती है। कृषि भूमि पर प्रदूषण की मार और स्वास्थ्य पर पड़ने वाला प्रतिकूल प्रभाव किसी भी सभ्य समाज के लिए चिंता का विषय होना चाहिए।

चेतावनी को गंभीरता से ले प्रशासन:

‘सरदार सेना’ और ग्रामीणों का यह विरोध कोई मामूली बात नहीं है। यदि प्रशासन ने समय रहते इस मामले का संज्ञान नहीं लिया और निर्माण कार्य पर रोक लगाकर निष्पक्ष जांच नहीं कराई, तो स्थिति बिगड़ना निश्चित है। किसानों और ग्रामीणों का धैर्य जवाब दे रहा है और आंदोलन की चिंगारी किसी भी वक्त भड़क सकती है।

​विकास का स्वागत होना चाहिए, लेकिन विनाश की नींव पर नहीं। प्रशासन को यह स्पष्ट करना होगा कि वे बड़े औद्योगिक घरानों के हितों की रक्षा कर रहे हैं या उन ग्रामीणों की, जिन्होंने उन्हें चुनकर वहां बैठाया है।

समय रहते जागना ही जनहित में है, वरना बाद में पछताने के अलावा कुछ नहीं बचेगा।

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