
“बस्ती: टीबी मुक्त प्रदेश के दावों को लगा ‘भ्रष्टाचार का रोग’, 6 महीने से ओपीडी पर लटका ताला, निजी सेंटर चमकाने में जुटे डीटीओ”
"सरकारी तनख्वाह बस्ती से और मोह अंबेडकर नगर के निजी सेंटर से! साहब की 'गुप्ता' सेटिंग से भगवान भरोसे क्षय रोग विभाग"
अजीत मिश्रा (खोजी)
भ्रष्टाचार की ‘खांसी’ से दम तोड़ता बस्ती का क्षय रोग विभाग, साहब की ‘गुप्ता’ सेटिंग से मरीज बेहाल
ब्यूरो रिपोर्ट, बस्ती मंडल
- “साहब शादी में हैं या कैंप में? सीएमओ और डीटीओ के बयानों ने खोली पोल, मरीजों के हक पर रसूखदारों का डाका”
- “बस्ती में सिस्टम बीमार: कमरा नंबर 3 और 8 पर महीनों से जड़े हैं ताले, डिप्टी सीएमओ की मनमानी से तड़प रहे टीबी मरीज”
- “ब्यूरो स्पेशल: रसूख की ओट में डियूटी से ‘लापता’ डॉक्टर, क्या सुविधा शुल्क के आगे नतमस्तक है बस्ती का स्वास्थ्य विभाग?”
बस्ती। उत्तर प्रदेश की योगी सरकार एक तरफ ‘टीबी मुक्त प्रदेश’ का ढिंढोरा पीट रही है, वहीं बस्ती जिले में जिम्मेदार अधिकारी इस महत्वाकांक्षी योजना के ताबूत में आखिरी कील ठोकने में मशगूल हैं। जिला क्षय रोग अस्पताल खुद ‘लालाज बीमारी’ का शिकार हो चुका है। यहाँ के कर्ता-धर्ता जिला क्षय रोग अधिकारी (DTO) डॉ. ए.के. गुप्ता पिछले कई महीनों से अपनी ड्यूटी से इस कदर नदारद हैं कि अस्पताल के कमरों पर लटके ताले अब उनकी कार्यशैली की पहचान बन चुके हैं।
खोखले दावों की खुली पोल: न पर्ची, न इलाज, बस भटकते मरीज
मीडिया की पड़ताल में जो सच सामने आया है, वह रोंगटे खड़े करने वाला है। अस्पताल के कमरा नंबर 08 (जहाँ ओपीडी की पर्ची कटती है) और कमरा नंबर 03 (जहाँ मरीजों का इलाज होता है) पर महीनों से धूल फांकते ताले लटक रहे हैं। हैरानी की बात यह है कि पिछले 6 महीनों से ओपीडी की एक भी पर्ची नहीं कटी है। टीबी जैसी गंभीर बीमारी से जूझ रहे लाचार मरीज भीषण गर्मी में अस्पताल परिसर के चक्कर काट रहे हैं, लेकिन उन्हें परामर्श देने वाला कोई नहीं है। सरकारी कागजों में तैनात 13 कर्मचारी कहाँ गायब हैं और किसके संरक्षण में अपनी हाजिरी पक्की कर रहे हैं, यह जांच का विषय है।
अंबेडकर नगर में ‘गुप्ता डायग्नोस्टिक’ का मोह, बस्ती की जनता को ठेंगा
सूत्रों के हवाले से जो जानकारी मिली है, वह स्वास्थ्य विभाग के भ्रष्टाचार के गहरे नेटवर्क की ओर इशारा करती है। बताया जा रहा है कि डिप्टी सीएमओ के पद का ‘रौब’ गांठने वाले डॉ. ए.के. गुप्ता का असली मन बस्ती के सरकारी अस्पताल में नहीं, बल्कि अंबेडकर नगर के मालीपुर-दोस्तपुर मार्ग पर स्थित अपने निजी ‘गुप्ता डायग्नोस्टिक सेंटर’ में रमता है। आरोप है कि साहब दिन भर अपने निजी सेंटर पर नोट बटोरते हैं और बस्ती में अपनी गैरमौजूदगी को मैनेज करने के लिए विभाग के उच्चाधिकारियों को मोटा ‘सुविधा शुल्क’ चढ़ाते हैं।
साहब के झूठ और अधिकारियों के विरोधाभास ने खोली कलई
जब मीडिया ने इस ‘लापता’ डॉक्टर की सुध ली, तो झूठ का ऐसा जाल बुना गया कि विभाग खुद ही फंस गया:
- डॉ. ए.के. गुप्ता का दावा: “मैं कुदरहा और बनकटी क्षेत्र में मेडिकल कैंप की जांच कर रहा हूँ।”
- CMO डॉ. राजीव निगम का बयान: “डॉ. गुप्ता शादी में गए हैं और 3 दिन के अवकाश पर हैं।”
सवाल यह है कि अगर डॉक्टर साहब छुट्टी पर हैं, तो वे कैंप में जांच कैसे कर रहे हैं? और अगर वे कैंप में हैं, तो सीएमओ साहब उन्हें शादी में क्यों भेज रहे हैं? यह विरोधाभास साफ बताता है कि ‘दाल में काला नहीं, बल्कि पूरी दाल ही काली है’।
अस्पताल बना नरक: न पानी, न शौचालय
डॉक्टरों की इस लुका-छिपी के बीच गरीब मरीजों की सुध लेने वाला कोई नहीं है। अस्पताल में शुद्ध पेयजल की व्यवस्था ध्वस्त है और शौचालयों की स्थिति इतनी दयनीय है कि स्वस्थ व्यक्ति भी बीमार पड़ जाए। डॉ. आर.के. वर्मा जैसे अन्य रसूखदार डॉक्टर भी ड्यूटी से नदारद मिले, जिससे स्पष्ट है कि यहाँ ‘अंधेर नगरी चौपट राजा’ वाला हाल है।
अब देखना यह है कि क्या शासन के रडार पर ये ‘लापता’ अधिकारी आएंगे या फिर भ्रष्टाचार के ‘सुविधा शुल्क’ के आगे मरीजों की सिसकियां दम तोड़ देंगी?



















