
समीर वानखेड़े ब्यूरो चीफ:
त्योहारों की मांग बढ़ते ही चीनी के दामों ने आसमान छू लिया है। होलसेल में चीनी ने 7000 रुपये प्रति क्विंटल का आंकड़ा पार कर लिया है, जबकि रिटेल में भाव 70 रुपये किलो तक पहुंच गया है। इससे सीजन से पहले 42 रुपये प्रति किलो MSP की कारखानदारों की मांग बेमानी हो गई है।
दामों को काबू में करने के लिए केंद्र सरकार अब शुल्क-मुक्त (ड्यूटी फ्री) चीनी आयात की अनुमति देने पर विचार कर रही है।
निर्यातक से आयातदार बना भारत
केंद्र की इस नीति से सीमित मात्रा में चीनी का आयात तो होगा, लेकिन ब्राजील के बाद दुनिया के दूसरे सबसे बड़े निर्यातक भारत पर अब आयातक का ठप्पा लग जाएगा।
इसका एक और बड़ा कारण है – पेट्रोल में इथेनॉल मिश्रण का राजनीतिक विरोध। विपक्षी दलों द्वारा इसे मुद्दा बनाने से नए सीजन में इथेनॉल उत्पादन पर भी संकट मंडरा रहा है। उत्तर प्रदेश समेत 6 राज्यों में होने वाले चुनावों से पहले अगर केंद्र ने इथेनॉल नीति में ढील दी, तो पूरी शुगर इंडस्ट्री के अस्तित्व पर सवाल खड़ा हो जाएगा।
आंकड़ों में पूरा गणित
पिछले सीजन में कुल उत्पादन: 324 लाख मीट्रिक टन
इथेनॉल की ओर डायवर्ट: 31 लाख टन
शुद्ध चीनी उत्पादन: 293 लाख टन
सीजन शुरू होने पर पुराना स्टॉक: 45 लाख टन
देश में सालाना खपत: 285 लाख टन
सरकार ने निर्यात की अनुमति दी: 20 लाख टन, लेकिन वैश्विक दाम गिरने से सिर्फ 8 लाख टन ही निर्यात हो पाया।
मौजूदा बफर स्टॉक: फिर से 45 लाख टन, जो सिर्फ 2 महीने के लिए ही काफी है।
मांग और सप्लाई में मामूली अंतर के कारण ही दाम भड़क रहे हैं। सरकार ने स्टॉक लिमिट का आदेश देकर कोशिश की, लेकिन त्योहारी मांग के आगे वह नाकाम रही। अब महंगाई इंडेक्स पर दबाव के चलते आयात ही आखिरी विकल्प बचा है।
कारखानदार 5 साल से MSP बढ़ाने के लिए केंद्र के चक्कर काट रहे थे, राज्य सरकार ने CM की अध्यक्षता में कमेटी भी बनाई। लेकिन बाजार ने सरकार से पहले ही फैसला कर दिया। फिलहाल मिल मालिक खुश हैं, पर यह खुशी ज्यादा दिन नहीं टिकेगी। आयात से सप्लाई बढ़ते ही दाम फिर गिरेंगे और अगर इथेनॉल का सहारा भी छूटा, तो शुगर इंडस्ट्री के लिए आगे की राह बेहद कठिन होगी।










