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सागर। वंदे भारत लाइव टीवी न्यूज संवाददाता सुशील द्विवेदी। मप्र शासन संस्कृति विभाग और मप्र नाट्य विद्यालय भोपाल एवं ज़िला प्रशासन सागर द्वारा 5 दिवसीय रंग प्रयोग नाट्य समारोह का आयोजन शहर के पद्माकर सभागार मोतीनगर में किया जा रहा है। इसके दूसरे दिन लेखक नील सायमन द्वारा लिखित नाटक सुहाने अफसाने का मंचन किया गया। इस नाटक में प्रख्यात रूसी नाटककार एंटोन चेखव की 6 कहानियों को पिरोया गया है। इसका निर्देशन श्री विद्यानिधि वनारसे, पुणे द्वारा किया गया। सुहाने अफसाने नाटक में 6 कहानियों का मंचन है। जो हल्के फुल्के हास्य से शुरू होकर त्रासदी पर जाकर खत्म होती हैं। लेखक सूत्रधार के माध्यम से कहानियां आगे बढ़ती हैं। जिसमें पहली कहानी में एक अदना कर्मचारी फिल्म देखने के दौरान अपने अफसर पर छींक देता है। ग्लानि होने पर वह माफी मांगता है और अफसर उसे सामान्य बात कहकर हल्के में लेकर माफ कर देता है। लेकिन घर आकर चिरौंजीलाल नामक क्लर्क को एहसास होता है कि साहब ने शायद उसे पूरे मन से माफ नहीं किया। इसलिए वह उनके घर जाकर फिर से माफी मांगता है। अफसर थोड़ा खीझकर उसे जाने के लिए कहता है। यह सारे दृश्य सहज हास्य उत्पन्न करते हैं। यह सिलसिला एक दो बार और होने के बाद अंत में क्लर्क को लगता है कि एक छोटी सी छींक ने उसका जीवन तबाह कर दिया है। इस ग्लानि के वशीभूत होकर क्लर्क फांसी लगा लेता है और इस कहानी का त्रासद अंत होता है। अगली कहानी एक मालकिन और उसकी आया की है, जो बच्चों को पढ़ाती है। महीने का हिसाब करते हुए मालकिन कई बहाने बनाते हुए उसकी सैलरी काटकर 9 हजार से एक हजार तक ले आती है। जब इतना होने पर भी आया खुशी से वो पैसे स्वीकार कर जाने लगती है, तो फिर मालकिन कहती है कि वो मजाक कर रही थी और किसी को इतना भी सीधा और मूर्ख नहीं होना चाहिए। तीसरी कहानी एक रंगीन मिजाज युवा गौतम सिंघानिया की है। जो दूसरों की बीवी हासिल करने की फिराक में रहता है और उसे कामयाबी भी मिलती है। लेकिन कहानी के अंत में जब मधुरा नामक विवाहित महिला उससे मिलने आती है और अपनी बात शिद्दत से रखती है, तो उसका यह खेल वहीं बंद हो जाता है। चौथी कहानी समुद्र में गोते लगाने वाले एक युवक की है। जिसमें वह अपनी रोजी रोटी के लिए समुद्र किनारे टहल रहे लोगों को बहला कर उसका करतब देखने के लिए मनाता है। इस कहानी का अंत भी त्रासदीपूर्ण होता है। जब वह गोताखोर अपने एक दर्शक से कहता है कि तीन बार की डुबकी के बाद उसके दोस्त का नाम पुकार देना जो पास की गुमटी में चाय पी रहा है। उसे पानी से बाहर निकालने वही आएगा, क्योंकि मुझे तैरना नहीं आता। उस दोस्त का नाम इतना लंबा और कठिन होता है कि यह तमाशा देखने वाले दर्शक को याद नहीं रहता। पानी में छलांग लगाने के बाद जब तीसरी डुबकी पर दर्शक उसके दोस्त को पुकारने का उपक्रम करता है तो उसे नाम ध्यान नहीं आता। अगली कहानी एक कस्बे से फाइल का ऑडिशन देने आई एक लड़की की है। जिसे डायरेक्टर यह सोचकर नजरअंदाज कर देता है कि यह कहां टिकेगी। लेकिन जब लड़की अपने पिता की मौत को याद कर अपना भावपूर्ण ऑडिशन देकर जाती है जो सबकी आंखें नम कर देता है। तब डायरेक्टर को अहसास होता है कि इसके मुकाबले कोई टिकने वाला नहीं है। अंतिम कहानी में एक बाप अपने बेटे को जिंदगी के हर रंग से वाकिफ करने के लिए उसके 19 वें जन्मदिन पर कोठे वाली के पास ले जाता है। बेटा सहमा हुआ सा एक कोने में बैठा रहता है। लेकिन मोलभाव के बाद जब बाप बेटे को कोठेवाली के पास जाने का इशारा करता है, तो बेटा उसकी देहरी पर जाकर कहता है कि अब वह सम्पूर्ण आदमी बनकर लौटेगा और उसे किसी की भी जरूरत नहीं पड़ेगी। यह प्रस्तुति एक सहयोगात्मक प्रयास रहा है, जिसमें अभिनेता, परिकल्पक, मंच कर्मचारी इन सभी ने प्रदर्शन के हर पहलू में अपना दिल और आत्मा डाल दी है। कलाकारों में अर्पित ठाकुर, अभिषेक मंडोरिया, संजना, अभय आनन्द बडोनी हिमाद्रि व्यास, शारोन मेरी मसीह गौतम सारास्वत, प्रदीप तिवारी- रोहित खिलवानी, कनिष्क द्विवेदी बिशाल बरुवा आदि शामिल रहे। संगीत संचालन सागर शुक्ला एवं प्रकाश परिकल्पना प्रसन्न सोनी ने किया l स्थानीय समन्वयन युग्सृष्टि थिएटर समिति सागर के सदस्यों ने किया।





