
गाजीपुर में पुलिस महानिरीक्षक की ओर से गैंगस्टर के मामले में कोर्ट की ओर से अपराधियों को सजा दिलाए जाने के लिए ऑपरेशन कन्वेंशन चलाया जा रहा है, जिसके चलते मॉनिटरिंग सेल से अपराधियों को जेल की सलाखों तक पहुंचाने का काम किया जा रहा है. इसी के चलते एक ऐसे अपराधी को 3 साल की सजा सुनाई गई है, जिसका लोगों में इतना खौफ था कि उनके खिलाफ कोई गवाही तक नहीं देता था.उत्तर प्रदेश के गाजीपुर का एक ऐसा अपराधी, जिसके भय से न कोई गवाही देना चाहता था और न ही उसके खौफ से कोई अपराधिक कृत्य करने पर मुकदमा दर्ज कराने की हिम्मत करता था. हालांकि इस अपराधी पर पुलिस ने साल 2009 में मुकदमा दर्ज किया था. इससे पहले 2002 में भी गैंगस्टर का मुकदमा दर्ज किया गया था, लेकिन कोई गवाह नहीं था. अब पुलिस महानिरीक्षक की ओर से चलाए जा रहे अपराधी को सजा दिलाए जाने के लिए ऑपरेशन कन्वेंशन के चलते गाजीपुर के विशेष न्यायाधीश एससी एसटी कोर्ट ने इस अपराधी को 3 साल की कारावास की सजा सुनाई है. दरअसल गाजीपुर के दिलदारनगर थाना क्षेत्र का रहने वाला नजमुद्दीन, जो एक संगठित आपराधिक गिरोह चलाता था. उसके गैंग में कई अन्य सदस्य भी शामिल थे और वह आए दिन आपराधिक घटनाओं को अंजाम दिया करते थे. कई आपराधिक घटनाओं के बावजूद कोई भी उनके खिलाफ मुंह खोलने या गवाही देने को तैयार नहीं होता था. तब तत्कालीन दिलदारनगर थाना के प्रभारी राम निहोर मिश्र ने 2009 में मुकदमा दर्ज कराया.मुकदमा दर्ज कराने की हिम्मत नहीं उन्होंने बताया था कि गैंग लीडर नजमु उर्फ नजमुद्दीन और लड्डन के साथ ही कई अन्य लोग मिलकर गैंग चला रहे हैं और यह गैंग अपने आर्थिक और भौतिक लाभ के लिए दिलदारनगर थाना क्षेत्र के साथ-साथ आसपास के इलाकों में अपराध को बढ़ावा दे रहे हैं. लोगों के अंदर इनका भय और खौफ इस कदर था कि लोग इनके खिलाफ मुकदमा दर्ज कराने की हिम्मत भी नहीं जुटा पाते थे. उस वक्त इनके ऊपर कुल पांच मुकदमे दर्ज थे.3 साल की सजा और 3 हजार का जुर्माना तब गैंगस्टर के तहत मामला दर्ज कर चार्जशीट कोर्ट में पेश की गई थी. इसके बाद ट्रायल के दौरान अभियोजन पक्ष ने तीन गवाह भी पेश किए. वहीं इससे पहले दिलदारनगर थाने में एक मुकदमा 11 जून 2002 को भी गैंगस्टर एक्ट के तहत दर्ज किया गया था. इस मामले में भी अभियोजन पक्ष ने एक गवाह पेश किया. दोनों पक्षों की दलीलें सुनने के बाद विशेष न्यायाधीश एससी-एसटी एक्ट और विशेष न्यायाधीश गैंगस्टर एक्ट अलख कुमार की अदालत ने आरोपियों को दोनों मामलों में दोषी मानते हुए तीन-तीन साल की कारावास और तीन-तीन हजार रुपए का जुर्माना लगाया था.
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