
खाकी की साख पर बट्टा: गोल्हौरा थाने में ‘न्याय’ कम, ‘वसूली’ का शोर ज़्यादा!
एक माह, चार पर गाज: क्या गड़बड़ केवल कर्मियों में है या पूरे सिस्टम की जड़ें खोखली हैं?
अजीत मिश्रा (खोजी)
🚨 खाकी पर कालिख: जब ‘रक्षक’ ही बनने लगें ‘भक्षक’🚨
बस्ती मंडल, उत्तर प्रदेश।
सिद्धार्थनगर ।। पुलिस की वर्दी सुरक्षा, भरोसे और न्याय का प्रतीक मानी जाती है। लेकिन जब इसी वर्दी की आड़ में ‘वसूली’ का खेल होने लगे और निर्दोषों पर डंडे बरसने लगें, तो समझ लीजिए कि लोकतंत्र के चौथे स्तंभ और आम जनता के बीच का विश्वास तार-तार हो रहा है। सिद्धार्थनगर के गोल्हौरा थाने की हालिया घटनाओं ने एक बार फिर यह कड़वा सच सामने लाकर खड़ा कर दिया है।
💫भ्रष्टाचार की ‘चेन’: रिश्वत से पिटाई तक का सफर
एक ही महीने के भीतर चार पुलिसकर्मियों पर कार्रवाई होना कोई मामूली घटना नहीं है। यह इशारा है उस सड़न की ओर जो थाने की चारदीवारी के भीतर घर कर चुकी है।
लेन-देन की संस्कृति: सिपाही द्वारा युवक को छोड़ने के नाम पर रिश्वत लेना और मामला तूल पकड़ने पर पैसे वापस करना, यह साबित करता है कि भ्रष्टाचार अब ‘गुप्त’ नहीं बल्कि ‘साहस’ के साथ किया जा रहा है।
अधिकारों का हनन: होली जैसे त्योहार के दिन निर्दोषों की पिटाई और बिना सोचे-समझे हिरासत में लेना पुलिस की कार्यप्रणाली पर गंभीर प्रश्नचिह्न खड़ा करता है। क्या पुलिस का काम कानून व्यवस्था बनाए रखना है या अपनी सत्ता का दुरुपयोग करना?
😇लाइन हाजिर: सजा या महज औपचारिकता?
अक्सर देखा जाता है कि भ्रष्टाचार या विवादों में घिरे पुलिसकर्मियों को ‘लाइन हाजिर’ कर दिया जाता है। लेकिन क्या यह स्थायी समाधान है?
“भ्रष्टाचार की जड़ें तब तक नहीं कटेंगी, जब तक दोषी अधिकारियों को केवल ‘लाइन’ नहीं, बल्कि ‘सेवा’ से बाहर का रास्ता नहीं दिखाया जाएगा।”
थानेदार की भूमिका की जांच होना एक सकारात्मक कदम है, क्योंकि बिना ‘ऊपर’ की शह के निचले स्तर पर इतना बड़ा साहस मुमकिन नहीं है। पुलिस कप्तान डॉ. अभिषेक महाजन की सक्रियता सराहनीय है, लेकिन विभाग को यह सुनिश्चित करना होगा कि ऐसी घटनाएं दोबारा न हों।
💫आम नागरिक कब तक सहेंगे?
जब थानों में ‘रेट कार्ड’ फिक्स होने लगें और न्याय की जगह बोली लगने लगे, तो गरीब आदमी कहाँ जाएगा? गोल्हौरा की घटना में ग्रामीणों का हंगामा करना इस बात का सबूत है कि अब जनता का धैर्य जवाब दे रहा है। लोग अब चुपचाप सहने के बजाय सड़कों पर उतरकर जवाब मांग रहे हैं।
💫 सुधारात्मक कदम जरूरी
👉पुलिस विभाग को छवि सुधारने के लिए केवल कार्रवाई ही नहीं, बल्कि एक गहरी ‘सफाई’ की जरूरत है।
👉जवाबदेही तय हो: अगर मातहत भ्रष्टाचार कर रहे हैं, तो थाना प्रभारी की जिम्मेदारी सीधे तौर पर तय की जानी चाहिए।
👉सीसीटीवी का पहरा: थानों के हर कोने में सीसीटीवी और उनकी मॉनिटरिंग सीधे उच्च अधिकारियों द्वारा हो।
👉जनता से संवाद: पुलिस को ‘शासक’ नहीं ‘सेवक’ की भूमिका में लौटना होगा।
अंतिम शब्द: खाकी पर लगा भ्रष्टाचार का यह दाग केवल चार कर्मियों का नहीं, बल्कि पूरे सिस्टम की साख का सवाल है। इसे धोने के लिए सख्त संदेश और कड़ी कार्रवाई की दरकार है।

















