
जब गांव-कस्बों की सच्चाई सामने लाने वाले ही असुरक्षित हों, तो लोकतंत्र की नींव हिलना तय है।
राजस्थान में खासकर ग्रामीण और तहसील स्तर के पत्रकार आज भी उस बुनियादी सुरक्षा से वंचित हैं, जो कई अन्य राज्यों में हक़ के तौर पर मिलती है। खैरथल-तिजारा जैसे इलाकों में काम करने वाले पत्रकार सीमित संसाधनों, न्यूनतम आय और वास्तविक जोखिम के बीच सच सामने रखते हैं—फिर भी उनके लिए न स्वास्थ्य बीमा, न दुर्घटना बीमा, न पेंशन, न आपात सहायता।
“जब पत्रकार सुरक्षित नहीं होगा, तो सच भी सुरक्षित नहीं रहेगा”—
यह कथन अब नारा नहीं, रोज़मर्रा की सच्चाई बन चुका है।
अब सवाल सिर्फ़ नैतिकता का नहीं, नीति का है।
अगर राज्य सरकार ठोस कदम उठाए, तो हालात बदल सकते हैं। कुछ स्पष्ट और व्यावहारिक मांगें जो तुरंत एजेंडा बननी चाहिए:
राज्य-स्तरीय पत्रकार कल्याण नीति (ग्रामीण/तहसील पत्रकारों को परिभाषा में शामिल करते हुए)
स्वास्थ्य व दुर्घटना बीमा—परिवार सहित
आपात सहायता कोष—हमले/दुर्घटना/इलाज की स्थिति में त्वरित मदद
मान्यता और सुरक्षा प्रोटोकॉल—ग्राउंड रिपोर्टिंग के दौरान प्रशासनिक सहयोग
पेंशन/मानदेय मॉडल—न्यूनतम सामाजिक सुरक्षा के लिए
सरकार से यही अपेक्षा है कि वह घोषणाओं से आगे बढ़कर नीति और क्रियान्वयन दिखाए।
क्योंकि ग्रामीण पत्रकार यूं ही संघर्ष करता रहा, तो नुकसान सिर्फ़ उसका नहीं—सच का होगा।

