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राष्ट्रीय प्राकृतिक खेती मिशन अंतर्गत कृषि सखी प्रशिक्षण कार्यक्रम का दूसरा दिन संपन्न

कृषि विज्ञान केंद्र मौलासर में आयोजित किया गया जिसमें 100 से अधिक कृषि सखियों ने उत्साहपूर्वक भाग लिया।

डीडवाना-कुचामन जिले में  राष्ट्रीय प्राकृतिक खेती मिशन के अंतर्गत आयोजित कृषि सखी के पांच दिवसीय द्वितीय आवासीय प्रशिक्षण कार्यक्रम का दूसरा दिन आज सफलतापूर्वक संपन्न हुआ। यह प्रशिक्षण 20 से 24 फरवरी तक कृषि विज्ञान केंद्र मौलासर में आयोजित किया जा रहा है, जिसमें 100 से अधिक कृषि सखियों ने उत्साहपूर्वक भाग लिया।

कार्यक्रम में वरिष्ठ वैज्ञानिक डॉ. अर्जुन सिंह ने प्राकृतिक खेती के मूल सिद्धांतों पर विस्तार से प्रकाश डाला। उन्होंने शून्य बजट प्राकृतिक खेती, मृदा जैविक कार्बन वृद्धि, सूक्ष्मजीव सक्रियता तथा रासायनिक मुक्त खेती की वैज्ञानिक पद्धतियों को समझाया। उन्होंने बताया कि प्राकृतिक खेती में बीजामृत, जीवामृत, घनजीवामृत, अपशिष्ट अपघटक घोल, भूमि आच्छादन (मल्चिंग), मिश्रित एवं बहुफसली प्रणाली का विशेष महत्व है, जिससे मिट्टी की संरचना सुधरती है, जल धारण क्षमता बढ़ती है तथा उत्पादन लागत घटती है।

कृषि अधिकारी पी. डी. चौधरी ने उच्च मूल्य वाली उन्नत फसल किस्मों पर जानकारी दी। उन्होंने ड्रैगन फ्रूट (पिताया), जैतून, मशरूम, शतावरी (जिसकी बेल लगभग 1000 रुपये प्रति किलो तक के भाव से बिकती है), एलोवेरा (घृतकुमारी) तथा मोरिंगा (सहजन) जैसी नकदी एवं निर्यात योग्य फसलों की वैज्ञानिक खेती, उच्च घनत्व रोपण पद्धति, सूक्ष्म सिंचाई (ड्रिप पद्धति) तथा मूल्य संवर्धन की तकनीकों के बारे में बताया।

उन्होंने बताया कि राजस्थान की कई विशिष्ट फसलें अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पहचान बना चुकी हैं, जिनमें सोजत की मेहंदी, मथानिया की मिर्च, जैसलमेर का गोंद, जालौर का इसबगोल, खजूर, अनार, मुल्तानी मिट्टी, गुलाब, जीरा तथा अजवाइन प्रमुख हैं। इन फसलों के प्रसंस्करण, पैकेजिंग एवं निर्यात से किसानों की आय में वृद्धि संभव है।

प्राकृतिक खेती से प्रेरित सफल व्यक्तित्वों का उल्लेख करते हुए सुभाष पालेकर, आकाश चौरसिया, भरत भूषण त्यागी, रूपम चंद पाटीदार तथा भास्कर सावे जैसे कृषकों के उदाहरण प्रस्तुत किए गए, जिन्होंने प्राकृतिक खेती अपनाकर राष्ट्रीय स्तर पर पहचान बनाई।

इसके उपरांत मोहन राम जी बाना ने फसलों के पोषण प्रबंधन पर विस्तृत व्याख्यान दिया। उन्होंने प्रमुख पोषक तत्व (नाइट्रोजन, फास्फोरस, पोटाश) एवं सूक्ष्म पोषक तत्वों की भूमिका समझाते हुए जैविक खाद, गोबर खाद, हरी खाद तथा सूक्ष्मजीव आधारित घोलों के संतुलित उपयोग पर बल दिया। साथ ही “आहार, विहार, विचार और आचार” के सिद्धांतों को अपनाकर संतुलित जीवनशैली एवं कृषि के संबंध को स्पष्ट किया।

रमेश जी बेनीवाल ने प्राकृतिक खेती के व्यावहारिक पक्षों पर जानकारी दी। उन्होंने देसी गाय आधारित बीजामृत, जीवामृत, नीमास्त्र, अग्नास्त्र एवं ब्रह्मास्त्र जैसे जैविक घोलों की निर्माण विधि, अनुप्रयोग मात्रा (डोज), तथा कीट एवं रोग प्रबंधन में इनके प्रभाव के बारे में तकनीकी जानकारी दी। साथ ही अंतरवर्तीय खेती, बहुफसली पद्धति, भूमि आच्छादन एवं जैविक कीट प्रबंधन पर भी प्रकाश डाला।

 

कार्यक्रम का संचालन हरिओम सिंह राणा, संयुक्त निदेशक कृषि विस्तार, डीडवाना-कुचामन की निगरानी में किया गया। कार्यक्रम में बजरंग लाल मीणा, कृषि अधिकारी ने भी अपनी विशेष उपस्थिति दर्ज कराई तथा कृषि सखियों का उत्साहवर्धन किया।

प्रशिक्षण कार्यक्रम में उपस्थित कृषि सखियों ने इसे अत्यंत उपयोगी एवं ज्ञानवर्धक बताया। यह कार्यक्रम प्राकृतिक खेती को बढ़ावा देने तथा किसानों को आत्मनिर्भर बनाने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम सिद्ध हो रहा है।

Natwar Lal Jangid

ङीङवाणा-कुचामन जिले से संबंधित खबर ओर विज्ञापन के लिए सम्पर्क करें। जिला संवाददाता- वंदे भारत लाइव टीवी न्यूज रिपोर्टर- नटवर लाल जांगिड़ मो.नं . 9179069501
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