
अजीत मिश्रा (खोजी)
विशेष रिपोर्ट: बस्ती में ‘सफेदपोश’ कसाई? चंद रुपयों के लिए गर्भ में घोंटा जा रहा मासूमों का दम!
ब्यूरो रिपोर्ट: बस्ती मंडल, उत्तर प्रदेश
- अल्ट्रासाउंड नहीं, ये ‘कत्लगाह’ हैं: बस्ती में सिस्टम की नाक के नीचे रची जा रही मौत की पटकथा!
- नोटिस का ढोंग और मासूमों की बलि: कब बंद होगा बस्ती में मौत का ये व्यापार?
- कागज़ पर ‘सब ठीक’, कोख में ‘मौत’: फर्जी रिपोर्ट के खेल ने ली एक और मासूम की जान।
- सफेद कोट के पीछे छिपे गिद्ध: रेडियोलॉजिस्ट नदारद, फिर भी धड़ल्ले से बंट रहे मौत के प्रमाणपत्र।
- सिस्टम का सन्नाटा भयावह है: कुदरहा कांड के बाद भी कुकुरमुत्ते की तरह खुले सेंटरों पर कार्रवाई सिफ़र।
- जागो जिला प्रशासन!: क्या सीलिंग और नोटिस की फाइलों से लौट आएगी उस माँ की खुशियाँ?
- “मरीजों की जान से खेलते इन सौदागरों का हिसाब कौन करेगा? बस्ती के आँगन में मातम है, और साहबों के दफ्तर में चैन की नींद!”
- “वो डॉक्टर नहीं, यमराज के दलाल हैं, जो कोख की धड़कन और मशीन के शोर में फर्क नहीं समझते।”
बस्ती। धर्म और सेवा का चोला ओढ़े स्वास्थ्य माफियाओं ने अब सीधे मासूमों की जान का सौदा करना शुरू कर दिया है। जिले में कुकुरमुत्ते की तरह उगे अवैध अल्ट्रासाउंड सेंटर अब ‘मौत के केंद्र’ बन चुके हैं। ताजा मामला कुदरहा इलाके का है, जहाँ एक मां ने स्वास्थ्य विभाग की लापरवाही और फर्जी रिपोर्ट्स के चलते अपने गर्भ में पल रहे नौ माह के शिशु को खो दिया। यह सिर्फ एक मौत नहीं, बल्कि सिस्टम द्वारा की गई सरेआम हत्या है।
रिपोर्ट नहीं, मौत का वारंट हैं ये केंद्र
हैरानी की बात यह है कि एक तरफ अल्ट्रासाउंड सेंटर ‘सब कुछ सामान्य’ होने की रिपोर्ट थमाते हैं, तो दूसरी तरफ चंद घंटों बाद ही पता चलता है कि बच्चा दस दिन पहले ही दम तोड़ चुका था। आखिर ये कौन से ‘विशेषज्ञ’ हैं जो बिना डॉक्टर के डिग्री टांगे रिपोर्ट पर हस्ताक्षर कर रहे हैं? बस्ती की सड़कों पर स्थित कई सेंटरों में न तो योग्य रेडियोलॉजिस्ट हैं और न ही नियमों का पालन हो रहा है। सवाल यह है कि स्वास्थ्य विभाग की नाक के नीचे चल रहे ये बिना हस्ताक्षर वाले रिपोर्ट आखिर किसके संरक्षण में जारी हो रहे हैं?
कमीशन का खेल और प्रशासन की चुप्पी
सूत्रों की मानें तो इन अवैध सेंटरों और झोलाछाप सेंटरों का जाल इतना गहरा है कि ऊपर से नीचे तक कमीशन का पैसा पहुंच रहा है। कागजों पर कार्रवाई के नाम पर नोटिस तो जारी कर दिए जाते हैं, लेकिन जमीनी हकीकत यह है कि सीलिंग के बाद ये सेंटर फिर से नए नाम के साथ खुल जाते हैं।
प्रमुख सवाल जो स्वास्थ्य विभाग को चुभेंगे:
- क्या सीएमओ कार्यालय सिर्फ नोटिस भेजने के लिए बना है? ठोस कानूनी कार्रवाई क्यों नहीं होती?
- जिन सेंटरों पर अपंजीकृत डॉक्टर और बिना हस्ताक्षर की रिपोर्ट्स मिल रही हैं, उन्हें अब तक जेल क्यों नहीं भेजा गया?
- क्या जिला प्रशासन को किसी बड़ी अनहोनी या जन-आक्रोश का इंतजार है?
- जनता की जिंदगी से खिलवाड़ बंद हो!
एक तरफ सरकार बेहतर स्वास्थ्य सुविधाओं का ढिंढोरा पीट रही है, वहीं दूसरी तरफ बस्ती मंडल के इन सेंटरों में गर्भवती महिलाओं को गुमराह कर उनकी कोख उजाड़ी जा रही है। अगर जल्द ही इन अवैध सेंटरों पर बुलडोजर नहीं चला और इन ‘सफेदपोश अपराधियों’ को सलाखों के पीछे नहीं भेजा गया, तो बस्ती की जनता सड़कों पर उतरने को मजबूर होगी। कोख में कत्लगाह और सिस्टम का सन्नाटा: बस्ती के ‘सफेदपोश’ गिद्धों का सच
उत्तर प्रदेश के बस्ती मंडल में इन दिनों मानवता शर्मसार है। चिकित्सा जैसे पवित्र पेशे को ‘व्यापार’ बना चुके कुछ गिद्धों ने समाज की रगों में भ्रष्टाचार का ऐसा जहर घोल दिया है कि अब कोख भी सुरक्षित नहीं बची। कुदरहा और आसपास के क्षेत्रों से आई खबरें यह साबित करने के लिए काफी हैं कि हम एक ऐसे समाज में जी रहे हैं जहाँ ‘डॉक्टर’ और ‘यमराज’ के बीच का अंतर मिट चुका है।
1. आधुनिकता का ढोंग और नैतिकता का पतन
हम 21वीं सदी में मंगल तक पहुँचने की बात करते हैं, लेकिन ज़मीनी हकीकत यह है कि बस्ती की गलियों में लगे चमचमाते बोर्ड वाली मशीनें तकनीक नहीं, बल्कि ‘मौत के औजार’ बन चुकी हैं। विरोधाभास देखिए—एक तरफ बेटी बचाने के सरकारी नारे दीवारों पर रंगे हैं, और दूसरी तरफ उन्हीं दीवारों के भीतर अवैध अल्ट्रासाउंड केंद्रों पर बिना किसी डॉक्टर के, नौसिखिए हाथों द्वारा गर्भवती महिलाओं की किस्मत लिखी जा रही है। यह कैसी आधुनिकता है जहाँ मशीनें तो महँगी हैं, पर इंसान की जान कौड़ियों के भाव बिक रही है?
2. ‘नोटिस’ का खेल या कार्रवाई का दिखावा?
जब भी कोई मासूम जान जाती है, स्वास्थ्य विभाग की गहरी नींद टूटती है। फिर शुरू होता है ‘नोटिस-नोटिस’ का वह पुराना खेल, जिसे जनता अब अच्छी तरह समझ चुकी है। विभाग का कहना है कि “नोटिस जारी कर दिया गया है।” क्या एक कागज़ का टुकड़ा उस माँ की सूनी गोद भर सकता है?
- बिना हस्ताक्षर के रिपोर्ट देना क्या अपराध नहीं है?
- बिना रेडियोलॉजिस्ट के सेंटर चलाना क्या डकैती नहीं है?
अगर यह अपराध है, तो अब तक इन सेंटरों के मालिक सलाखों के पीछे क्यों नहीं हैं? प्रशासन की यह चुप्पी किसी बड़े ‘कमीशन’ की गवाही दे रही है।
3. रसूखदारों का ‘सेहत सिंडिकेट’
खबरों के मुताबिक, शहर के प्रतिष्ठित डॉक्टरों की डिग्रियाँ इन छोटे केंद्रों पर ‘किराए’ पर टंगी हैं। ये बड़े नाम वाले डॉक्टर अपने एसी कमरों में बैठते हैं और उनके नाम का इस्तेमाल कर ये मौत के सौदागर जनता को लूट रहे हैं। यह एक संगठित अपराध है जहाँ रसूखदार डॉक्टर, दलाल और भ्रष्ट कर्मचारी मिलकर एक ऐसा चक्रव्यूह बुनते हैं, जिसमें फँसकर एक आम आदमी अपनी जमा-पूंजी और अपनों की जान, दोनों गँवा देता है।
4. गरीब की बेबसी और रसूख की हनक
अक्सर इन सेंटरों का शिकार वह गरीब होता है जो शहर के बड़े अस्पतालों का खर्च नहीं उठा सकता। वह अपनी उम्मीद लेकर इन सेंटरों पर जाता है, जहाँ उसे ‘सब ठीक है’ का झूठा आश्वासन दिया जाता है। कुदरहा की उस पीड़िता के साथ भी यही हुआ—जब तक उसे सच्चाई का पता चला, तब तक मौत उसकी कोख में घर कर चुकी थी। यह समाज की सबसे बड़ी विफलता है कि यहाँ न्याय भी पीड़ित की हैसियत देखकर तय होता है।
5. सामाजिक चेतना की ज़रूरत
सिर्फ प्रशासन को कोसने से बदलाव नहीं आएगा। हमें यह पूछना होगा कि क्यों हमारे समाज में ऐसे सेंटर फल-फूल रहे हैं? क्यों हम बिना योग्यता जाँचे अपनी जान इनके हाथों में सौंप देते हैं? और सबसे महत्वपूर्ण—बस्ती का प्रबुद्ध वर्ग इन मौतों पर खामोश क्यों है?
बस्ती मंडल की यह घटना एक चेतावनी है। अगर आज इन ‘सफेदपोश कसाइयों’ के खिलाफ सख्त जन-आंदोलन और कानूनी कार्रवाई नहीं हुई, तो कल किसी और घर का चिराग इन फर्जी रिपोर्ट्स की भेंट चढ़ जाएगा। स्वास्थ्य विभाग को चाहिए कि वह सिर्फ फाइलों में खानापूर्ति न करे, बल्कि इन अवैध सेंटरों को जमींदोज कर एक ऐसी मिसाल पेश करे कि दोबारा कोई डॉक्टर के नाम पर मौत का व्यापार न कर सके।
बस्ती की जनता अब जवाब चाहती है—नोटिस नहीं, न्याय चाहिए!
चेतावनी: यह खबर उन तमाम अधिकारियों के लिए एक अलार्म है जो अपनी कुर्सी पर बैठकर फाइलों में ‘सब ठीक है’ लिख रहे हैं। अगर अब भी कार्रवाई नहीं हुई, तो अगली मौत की जिम्मेदारी सीधे आपकी होगी।




















