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जनता की जेब पर डाका या ‘होम डिलीवरी’ का नया घोटाला? गैस एजेंसियों ने बिना डिलीवरी डकारे ₹1.98 करोड़; प्रशासन की चुप्पी पर उठ रहे सवाल

बस्ती में गैस माफिया का तांडव: बिना डिलीवरी डकारे 1.98 करोड़, जनता बेहाल!होम डिलीवरी के नाम पर 'महाघोटाला': सेवा शून्य, वसूली करोड़ों में!

अजीत मिश्रा (खोजी)

विशेष रिपोर्ट: बस्ती में ‘गैस माफिया’ का नंगा नाच, सरकारी तंत्र नतमस्तक! होम डिलीवरी के नाम पर 1.98 करोड़ का ‘सिलेंडर घोटाला’, जनता की गाढ़ी कमाई पर डाका

ब्यूरो रिपोर्ट: बस्ती मंडल (उत्तर प्रदेश)

  • अंधेर नगरी चौपट राजा: गैस किल्लत के बीच एजेंसियों ने रचा 2 करोड़ का खेल!
  • 33 रुपये का ‘अदृश्य’ खेल: बस्ती की जनता से वसूली गई बिना दी गई सेवा की कीमत।
  • गैस एजेंसियों की ‘गुंडागर्दी’: न रसीद का लिहाज, न जनता के पसीने की कद्र।
  • प्रशासन मौन या शामिल? करोड़ों की लूट पर पूर्ति विभाग ने क्यों मूंदी आंखें?
  • तेल कंपनियों का कमीशन भी, जनता से अवैध वसूली भी; आखिर कब थमेगी ये लूट?
  • सिलेंडर एक, लूट अनेक: बस्ती मंडल में उपभोक्ताओं का ‘आर्थिक चीरहरण’।
  • डिलीवरी के नाम पर डकैती: क्या प्रशासन लौटाएगा जनता के 1.98 करोड़ रुपये?

बस्ती। उत्तर प्रदेश के बस्ती मंडल में इन दिनों रसोई गैस की किल्लत ने हाहाकार मचा रखा है। लेकिन इस आपदा को ‘अवसर’ में बदलते हुए गैस एजेंसियों ने भ्रष्टाचार की सारी सीमाएं लांघ दी हैं। पिछले दो महीनों के आंकड़ों पर गौर करें तो एक सनसनीखेज सच सामने आता है— यहाँ गैस एजेंसियों ने बिना एक कदम चले, बिना एक भी सिलेंडर घर पहुंचाए, उपभोक्ताओं की जेब से 1.98 करोड़ रुपये साफ कर दिए हैं। यह सीधे तौर पर जनता की मेहनत की कमाई पर डकैती है, जिसे ‘सिस्टम’ की शह पर अंजाम दिया जा रहा है।बस्ती जिले में रसोई गैस की किल्लत क्या शुरू हुई, गैस एजेंसियों की चांदी हो गई। एक तरफ आम जनता एक-एक सिलेंडर के लिए भीषण गर्मी और लंबी लाइनों में धक्के खा रही है, वहीं दूसरी तरफ गैस एजेंसियों ने “होम डिलीवरी” के नाम पर करीब 2 करोड़ रुपये (1.98 करोड़) डकार लिए हैं। यह हम नहीं, बल्कि धरातल पर दिख रहे आंकड़े और जनता का दर्द चीख-चीख कर कह रहा है।

लूट का गणित: रसीद में सेवा, हकीकत में धोखा

नियमों के अनुसार, प्रति घरेलू गैस सिलेंडर (निर्धारित मूल्य ₹975) में ₹33 होम डिलीवरी शुल्क के रूप में जमा कराए जाते हैं। पिछले 60 दिनों में बस्ती में लगभग 6 लाख सिलेंडरों का वितरण हुआ है। चौंकाने वाली बात यह है कि गैस एजेंसियों ने स्वीकार किया है कि किल्लत और भीड़ के कारण ‘होम डिलीवरी’ संभव नहीं हो पा रही है।

बावजूद इसके, प्रत्येक उपभोक्ता से वह ₹33 वसूले गए जो उसे घर पर सिलेंडर पहुंचाने के बदले देने थे। इस हिसाब से बिना कोई सेवा दिए एजेंसियों ने ₹1,98,00,000 (एक करोड़ 98 लाख) अपनी तिजोरियों में भर लिए हैं। सवाल यह उठता है कि जब सेवा दी ही नहीं गई, तो यह पैसा वापस क्यों नहीं किया गया?

नियमों के मुताबिक, गैस सिलेंडर की निर्धारित कीमत (₹975 घरेलू) में 33 रुपये होम डिलीवरी का शुल्क शामिल होता है। लेकिन पिछले दो महीनों से बस्ती में होम डिलीवरी पूरी तरह ठप है। उपभोक्ता खुद लाइन में लगकर सिलेंडर ले जा रहे हैं, लेकिन एजेंसियां रसीद में होम डिलीवरी का पैसा काटकर उन्हें खुलेआम लूट रही हैं।

  • दो महीने का खेल: लगभग 6 लाख सिलेंडर बांटे गए।
  • लूट का गणित: प्रति सिलेंडर ₹33 के हिसाब से ₹1.98 करोड़ का सीधा चूना जनता को लगा।
  • अतिरिक्त मार: कई जगह तो उपभोक्ताओं से ₹1050 से लेकर ₹1300 तक वसूले जा रहे हैं।

कालाबाजारी और बदतमीजी चरम पर

रिपोर्ट्स के मुताबिक, सिलेंडर की किल्लत ने कालाबाजारी को जन्म दे दिया है। वितरकों के साथ अभद्रता और सिलेंडर छीनने की खबरें आम हो चुकी हैं। लेकिन इस पूरे अराजक माहौल में जिला प्रशासन और रसद विभाग मूकदर्शक बना बैठा है। क्या अधिकारियों को करोड़ों के इस घोटाले की भनक नहीं है, या फिर उनकी चुप्पी के पीछे भी कोई ‘कमीशन’ का खेल है?

जनता के तीखे सवाल:

  • जब होम डिलीवरी नहीं दी जा रही, तो रसीद में उसका पैसा क्यों जोड़ा जा रहा है?
  • जिला प्रशासन इन मुनाफाखोर एजेंसियों पर कार्रवाई कब करेगा?
  • क्या ‘डिजिटल इंडिया’ और ‘पारदर्शिता’ का दावा करने वाली सरकार इन बेबस उपभोक्ताओं का पैसा वापस दिलाएगी?

लाइनों में अपमान और ब्लैक मार्केटिंग का खेल

बस्ती की सड़कों पर गैस एजेंसियों के बाहर सुबह 4 बजे से ही उपभोक्ताओं की लंबी कतारें लग जाती हैं। दिन भर धूप में तपने के बाद भी जब सिलेंडर नहीं मिलता, तो उपभोक्ताओं का सब्र टूट जाता है।

  • अवैध वसूली: आरोप है कि होम डिलीवरी न मिलने पर मजबूर जनता से ₹1050 से लेकर ₹1300 तक वसूले जा रहे हैं।
  • कमीशन का दोहरा खेल: एक तरफ एजेंसियां जनता को लूट रही हैं, वहीं दूसरी तरफ ऑयल कंपनियां भी उन्हें प्रति सिलेंडर भारी-भरकम कमीशन (घरेलू पर ₹73 और व्यावसायिक पर ₹120) दे रही हैं। इसके बावजूद उपभोक्ताओं को लूटने की भूख कम नहीं हो रही।

प्रशासनिक मौन: क्या अधिकारियों का भी है हिस्सा?

IOCL के अधिकारी संतोष सोनी स्वीकार करते हैं कि बुकिंग के समय ही ₹33 ले लिए जाते हैं और वर्तमान में डिलीवरी की स्थिति नहीं है। लेकिन इस ‘खुली लूट’ पर रोक लगाने के लिए विभाग की ओर से कोई ठोस कदम नहीं उठाया गया। आखिर जिला प्रशासन और पूर्ति विभाग इन एजेंसियों के लाइसेंस रद्द क्यों नहीं कर रहा? क्या इन करोड़ों रुपयों की मलाई में ऊपर तक हिस्सेदारी है?

जनता का आक्रोश और सुलगते सवाल

गैस वितरण केंद्रों पर आए दिन बदतमीजी और छीना-झपटी की खबरें आ रही हैं। उपभोक्ता अब पूछ रहे हैं:

  • सरकार कहां है? क्या मुख्यमंत्री के जीरो टॉलरेंस की नीति बस्ती के गैस वितरकों पर लागू नहीं होती?
  • पैसा वापस कब होगा? जो ₹1.98 करोड़ अवैध रूप से वसूले गए, क्या विभाग उन्हें उपभोक्ताओं के बैंक खातों में वापस कराएगा?
  • सुरक्षा का क्या? भीड़ के नाम पर महिलाओं और बुजुर्गों के साथ जो अभद्रता हो रही है, उसका जिम्मेदार कौन है?

निष्कर्ष: बस्ती मंडल में गैस का यह संकट प्राकृतिक कम और ‘मानव निर्मित’ ज्यादा नजर आता है। यह महज वितरण की समस्या नहीं, बल्कि एक संगठित आर्थिक अपराध है। यदि प्रशासन ने तत्काल इन माफियाओं पर नकेल नहीं कसी, तो जनता का यह आक्रोश किसी बड़े जनांदोलन का रूप ले सकता है।

बस्ती मंडल की जनता अब जवाब मांग रही है। अगर जल्द ही इन एजेंसियों पर लगाम नहीं कसी गई, तो यह आक्रोश सड़कों पर उतरने में देर नहीं लगाएगा।

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