नेताओं के संरक्षण के कारण हर्रैया और आसपास के क्षेत्रों के हज़ारों स्कूली लड़के और नवयुवक नशे के आदी होकर बर्बाद हो रहे हैं.

अजीत मिश्रा (खोजी)
नेताओं की सरपरस्ती और युवा पीढ़ी की बर्बादी: सियासत की छांव में फल-फूल रहा गांजा साम्राज्य
- तस्कर रवि गुप्त और दुर्गेश सोनकर के बीच वर्चस्व की लड़ाई और गैंगवार छिड़ चुका है, जिसके तहत वे एक-दूसरे के आदमियों को पुलिस से पकड़वा रहे हैं.
- छिंदवाड़ा में 320 किलो गांजा और दुर्गेश सोनकर के आदमियों की गिरफ्तारी इसी आपसी रंजिश और मुखबिरी का नतीजा है.
- विक्रमजोत चौकी, छावनी और हर्रैया थानों को इस अवैध कारोबार से हर महीने भारी मात्रा में बंधी हुई रकम मिलती है.
- राजनीतिक दलों और नेताओं (जैसे पूर्व मंत्री राजकिशोर सिंह और अन्य) के पाले बदलने के साथ इन तस्करों का वर्चस्व घटता-बढ़ता रहा है, जो रैलियों में भीड़ जुटाने और चुनाव प्रबंधन का काम करते हैं.
बस्ती और आसपास के क्षेत्रों में युवाओं की नसों में जहर घोल रहा अवैध गांजा कारोबार किसी छिपी हुई हकीकत से कम नहीं है। गांजा तस्कर रवि गुप्त और दुर्गेश सोनकर के फौव्वारे की तरह बढ़ते साम्राज्य की कहानी महज़ दो अपराधियों की नहीं, बल्कि उस राजनीतिक संरक्षण की दास्तान है जिसके साये में ये तस्कर आम नागरिकों की जिंदगियों से खिलवाड़ कर रहे हैं। यदि इन तस्करों को नेताओं का खुला साथ न मिला होता, तो आज हर्रैया और आसपास के क्षेत्रों के हज़ारों स्कूली लड़के और नवयुवक नशे के आदी होकर बर्बाद न हो रहे होते।
इन दोनों तस्करों ने शुरुआत में साथ मिलकर काम किया, लेकिन जल्द ही बड़े बनने की होड़ और महत्वाकांक्षा ने इन्हें आमने-सामने ला खड़ा किया। आपसी रंजिश के चलते छिड़ा यह ‘गैंगवार’ अब सिर्फ वर्चस्व की लड़ाई नहीं रह गया है, बल्कि एक-दूसरे के अवैध कारोबार को नेस्तनाबूद करने के लिए पुलिस तक तस्करों की मुखबिरी का खेल चल रहा है। छिंदवाड़ा में 320 किलो गांजा और दुर्गेश सोनकर नकर के आदमियों की गिरफ्तारी इसी अंतर्कलह और पुलिस-तस्कर गठजोड़ का जीता-जागता उदाहरण है। रवि गुप्त के जेल जाने के बाद उसके विरोधी खेमे में राहत है, तो दुर्गेश खेमे में मायूसी; और इस पूरे खेल में पुलिस की भूमिका भी सवालों के घेरे में कम नहीं है।
तथ्य यह उजागर करते हैं कि कैसे थानों और चौकियों के स्तर पर हर महीने बंधी हुई रकमें पहुंचती हैं—चाहे वह विक्रमजोत चौकी हो या छावनी और हर्रैया थाने, जहां से हर माह मोटी रकम वसूली जाती रही है। मीडिया के सामने जब्ती के आंकड़ों में हेरफेर करने के किस्से भी कम चौंकाने वाले नहीं हैं, जहां पचास किलो या छप्पन बंडल गांजे की जगह महज कुछ बोरियां ही थाने और प्रेस के सामने प्रदर्शित की जाती हैं। यह इस बात का प्रमाण है कि खाकी और खादी की मिलीभगत के बिना यह अवैध कारोबार इतने बड़े पैमाने पर संचालित नहीं हो सकता था।
सबसे विचलित करने वाली तस्वीर राजनीतिक मंचों और तस्करों के अंतःसबंधों की है। कभी पूर्व मंत्री राजकिशोर सिंह के खेमे की कृपा से फल-फूल रहे दुर्गेश सोनकर ने जब चुनाव में राजनीतिक निर्देश मानने से इनकार किया, तो उसका कारोबार कुछ समय के लिए ठप पड़ गया, और विरोधी रवि गुप्त ने उसी राजनीतिक छत्रछाया में अपना वर्चस्व स्थापित कर बभनान, विशेषगंज और अमारी मोड़ जैसे अहम अड्डे हथिया लिए। जब सत्ता बदली और मंत्री हारे, तो समीकरण फिर पलटे और तस्कर पाला बदलकर विधायक के खेमे में जा बैठे।
इन अपराधियों का इस्तेमाल राजनीतिक रैलियों में भीड़ जुटाने, तख्तियां-पोस्टर लगाने और चुनाव प्रबंधन के लिए किया जाता है। बदले में इन्हें मिलता है ऐसा अभयदान जिसके बल पर वे पार्षदी के चुनाव जीतने से लेकर करोड़ों के वारे-न्यारे करने तक का सफर तय करते हैं। सवाल यह उठता है कि क्या जनप्रतिनिधियों की राजनीतिक रोटियां सेकने के लिए हज़ारों घरों के चिराग बुझते रहना और नौजवानों का भविष्य दांव पर लगना स्वीकार्य है? यदि समय रहते इस राजनीतिक-अपराध गठजोड़ पर नकेल नहीं कसी गई, तो यह नशा दीमक की तरह पूरी पीढ़ी को खोखला कर देगा।
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