उत्तर प्रदेशलखनऊ

यूपी में बिजली चोरी का काला सच: कुछ इलाकों में 77% तक पहुंचा आंकड़ा, महकमे के दावों की खुली पोल

बिजली चोरी सिर्फ एक वित्तीय अपराध नहीं है, बल्कि यह उन करोड़ों ईमानदार उपभोक्ताओं के साथ सीधा विश्वासघात है जो महकमे की अक्षमता का खामियाजा महंगी दरों और बेतरतीब कटौती के रूप में भुगत रहे हैं।

अजीत मिश्रा (खोजी)

⚡77% बिजली चोरी और सुस्त तंत्र: उत्तर प्रदेश में महकमे की मेहरबानी से रोशन हो रहे हैं चोरों के आशियाने⚡

  • मेहरबानी या मिलीभगत? 77% बिजली चोरी वाले फीडरों के इंजीनियरों को नोटिस, अब होगी बेनामी संपत्तियों की जांच
  • वाराणसी, गाजीपुर से प्रतापगढ़ तक ‘चोरी के गढ़’: यूपीपीसीएल ने चिन्हित किए सबसे फिसड्डी 50 फीडर
  • 18% चोरी घटने के सरकारी दावों पर सवाल: महकमे के साए में बेखौफ दौड़ रहा बिजली माफियाओं का नेटवर्क

​उत्तर प्रदेश के बिजली महकमे में सब कुछ ठीक नहीं है। एक तरफ पावर कॉरपोरेशन (यूपीपीसीएल) पूरे प्रदेश में बिजली चोरी के मामलों में 18 फीसदी की कमी का ढोल पीट रहा है, तो दूसरी तरफ जमीनी हकीकत इन दावों की धज्जियां उड़ा रही है। राज्य के कुछ इलाकों में बिजली चोरी का आंकड़ा हैरान करने वाला 77 फीसदी तक पहुंच गया है। क्या इतनी बड़ी चोरी बिना स्थानीय विभागीय मिलीभगत के संभव है? यह सवाल आज हर उस ईमानदार उपभोक्ता के जेहन में उठ रहा है जो समय पर बिल चुकाने के बावजूद या तो कटौती झेल रहा है या बिजली माफियाओं के पापों का आर्थिक बोझ उठा रहा है।

​⚡चोरों के गढ़ बने ये फीडर, महकमे की नींद अब खुली

स्थिति की भीषणता को देखते हुए यूपीपीसीएल ने प्रत्येक डिस्काम से 10-10 सर्वाधिक बिजली चोरी वाले फीडर चिन्हित किए हैं, जिसके तहत कुल 50 सबसे संवेदनशील फीडरों की सूची तैयार की गई है। गाजीपुर, वाराणसी, प्रतापगढ़, गड़वारा और भटनी जैसे इलाकों के फीडर इस सूची में सबसे ऊपर हैं, जहां बिजली चोरी का यह नंगा नाच तंत्र के माथे पर कालिख पोतने के लिए काफी है। इन फीडरों पर बिजली चोरी का यह खेल रातों-रात शुरू नहीं हुआ है, लेकिन इसके बावजूद जिम्मेदार अधिकारियों ने आंखें मूंदे रखीं, जो सीधे तौर पर उनकी संलिप्तता की ओर इशारा करता है।

इंजीनियरों पर शिकंजा या महज कागजी खानापूर्ति?

मामले के तूल पकड़ने के बाद यूपीपीसीएल प्रशासन ने कार्रवाई का पाखंड रचते हुए इन चिन्हित फीडरों के लापरवाह इंजीनियरों को नोटिस जारी किए हैं। इतना ही नहीं, अब इन जिम्मेदार इंजीनियरों की संपत्तियों की भी जांच कराने की बात कही जा रही है। लेकिन सवाल यह है कि क्या यह कार्रवाई महज कागजी घोड़े दौड़ाने तक सीमित रहेगी या वाकई भ्रष्ट तंत्र की जड़ों पर कोई ठोस प्रहार होगा? दशकों से बिजली चोरी के इन अड्डों को संरक्षण देने वाले अफसरों को सिर्फ नोटिस थमाना नाकामी छिपाने की कोशिश भर है। जब तक इन इंजीनियरों की अकूत बेनामी संपत्तियों पर सख्त गाज नहीं गिरती, तब तक इस खुली लूट पर लगाम लगना नामुमकिन है।

​बिजली चोरी सिर्फ एक वित्तीय अपराध नहीं है, बल्कि यह उन करोड़ों ईमानदार उपभोक्ताओं के साथ सीधा विश्वासघात है जो महकमे की अक्षमता का खामियाजा महंगी दरों और बेतरतीब कटौती के रूप में भुगत रहे हैं। यदि यूपीपीसीएल इस बार सिर्फ चेतावनी देकर फाइलें बंद कर देता है, तो यह मान लिया जाएगा कि सिस्टम के शीर्ष पर बैठे लोग खुद इस बंदरबांट के हिस्सेदार हैं। अब समय आ गया है कि आंकड़ों की बाजीगरी बंद हो और इन लापरवाह चेहरों को बेनकाब कर कानून का कड़ा चाबुक चलाया जाए।

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