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भ्रष्टाचार का ‘महादंगल’: बस्ती सदर तहसील के अफसरों ने ‘चरागाह’ की करोड़ों की जमीन कौड़ियों में बेची!

कलम के डकैत': बस्ती सदर तहसील में करोड़ों की 'चरागाह' जमीन डकार गए अफसर! योगी राज में 'लेखपाल' बने भगवान; जो काम सीएम नहीं कर सकते, वो सदर तहसील के 'सिंडिकेट' ने कर दिखाया!

अजीत मिश्रा (खोजी)

बस्ती: सदर तहसील में ‘कलम के कसाई’ सक्रिय; करोड़ों की चरागाह जमीन को कौड़ियों में निगला!

ब्यूरो रिपोर्ट: बस्ती मंडल (उत्तर प्रदेश)

  • बस्ती में सरकारी जमीन का ‘महा-साका’: साढे सात लाख की रिश्वत में बेच दी 2 करोड़ की चरागाह!
  • साहबों की सेटिंग, माफिया का कब्जा: डारीडीहा में सरकारी जमीन पर कैसे चल गई ‘जालसाजी’ की आरी?
  • रक्षक ही बने भक्षक: एसडीएम से लेकर लेखपाल तक की मिलीभगत से चरागाह पर चढ़ा ‘अवैध प्लॉटिंग’ का रंग!
  • बस्ती मंडल का काला सच: कहीं बंधक बनते काश्तकार, तो कहीं कौड़ियों के दाम बिक रही चरागाह!
  • बस्ती में ‘चरागाह’ चर गए तहसील के जिम्मेदार; जनता बेहाल, अफसर मालामाल!
  • सावधान! बस्ती में ‘सरकारी जमीन’ सुरक्षित नहीं, यहाँ लेखपाल की कलम के आगे कानून भी नतमस्तक!
  • फर्जी बैनामा, असली मलाई: सदर तहसील के अफसरों ने चरागाह को बना दिया निजी ‘जागीर’!

बस्ती। भ्रष्टाचार जब व्यवस्था की रगों में लहू बनकर दौड़ने लगे, तो नियम-कानून सिर्फ कागजों की शोभा बनकर रह जाते हैं। उत्तर प्रदेश के बस्ती जिले की सदर तहसील में भ्रष्टाचार का एक ऐसा नग्न नाच देखने को मिला है, जिसने शासन और प्रशासन की साख को धूल धूसरित कर दिया है। यहाँ के ‘साहबों’ ने मिलकर वह कारनामा कर दिखाया है, जिसे देश के प्रधानमंत्री या प्रदेश के मुख्यमंत्री भी चाहकर नहीं कर सकते। करोड़ों रुपये की सरकारी ‘चरागाह’ की जमीन को अधिकारियों और कर्मचारियों के सिंडिकेट ने मिलकर निजी हाथों में बेच डाला है।प्रदेश के मुखिया योगी आदित्यनाथ जीरो टॉलरेंस की नीति का ढिंढोरा पीटते हैं, लेकिन बस्ती जिले की सदर तहसील के अधिकारियों और कर्मचारियों ने उनकी साख को बट्टा लगाने में कोई कसर नहीं छोड़ी है। जिस चरागाह की जमीन का स्वरूप स्वयं पीएम या सीएम भी नहीं बदल सकते, उसे सदर तहसील के एसडीएम, तहसीलदार, कानूनगो और लेखपाल के सिंडिकेट ने मिलकर ‘सफेदपोश भू-माफियाओं’ के हाथों बेच डाला। करोड़ों की सरकारी संपत्ति को चंद लाख रुपयों की रिश्वत के खातिर निजी हाथों में सौंपने का यह सनसनीखेज मामला अब चर्चा का विषय बना हुआ है।

लेखपाल की कलम: पीएम-सीएम से भी ऊपर!

कहा जाता है कि सरकारी तंत्र में जो काम नियमतः असंभव है, उसे एक भ्रष्ट लेखपाल अपनी कलम की एक नोक से संभव बना देता है। सदर तहसील के एसडीएम, तहसीलदार, नायब तहसीलदार, कानूनगो और लेखपाल की मिलीभगत से करोड़ों की सरकारी संपत्ति को महज कुछ लाख रुपयों के लालच में खुर्द-बुर्द कर दिया गया। आम जनता के बीच अब यह चर्चा आम है कि जिस चरागाह की जमीन की प्रकृति (Status) बदलने का अधिकार सर्वोच्च अधिकारियों को भी नहीं है, उसे सदर तहसील के कारिंदों ने मोटी रकम लेकर बदल दिया।तहसील के गलियारों में यह कहावत मशहूर हो गई है कि जो काम मुख्यमंत्री नहीं कर सकते, वह एक लेखपाल कर देता है। मामला ग्राम डारीडीहा का है, जहाँ गाटा संख्या 359 (रकबा 253 हेक्टेयर) की चरागाह वाली जमीन को फर्जी तरीके से पहले राम कृष्ण पुत्र समिरन के नाम किया गया। इसके बाद, करीब 8-9 महीने पहले मीना देवी ने इस सरकारी जमीन का फर्जी बैनामा अपने नाम करवा लिया।

हैरानी की बात यह है कि चरागाह की जमीन को न तो बेचा जा सकता है और न ही किसी को पट्टे पर दिया जा सकता है, फिर भी तहसील प्रशासन की मिलीभगत से यह ‘असंभव’ कार्य ‘संभव’ हो गया।

डारीडीहा का ‘महाघोटाला’: ऐसे रची गई साजिश

भ्रष्टाचार का सबसे ताजा और सनसनीखेज मामला सदर तहसील के ग्राम डारीडीहा से सामने आया है। यहाँ गाटा संख्या 359 (रकबा 253 हेक्टेयर) की जमीन, जो चकबंदी से पहले से ही चरागाह के रूप में दर्ज है, उसे जालसाजी के जरिए निजी संपत्ति बना दिया गया।

  • पहला चरण: तहसील प्रशासन ने भारी रकम लेकर इस जमीन को पहले राम कृष्ण पुत्र समिरन (निवासी डारीडीहा) के नाम फर्जी तरीके से दर्ज किया।
  • दूसरा चरण: करीब 8-9 महीने पहले मीना देवी पत्नी राम सवारे ने इस सरकारी जमीन का फर्जी तरीके से राम कृष्ण से बैनामा करवा लिया।
  • तीसरा चरण: चरागाह की इस जमीन पर अब धड़ल्ले से अवैध प्लॉटिंग का काम चल रहा है। जिस जमीन की बाजारू कीमत आज 2 करोड़ रुपये से अधिक है, उसे भ्रष्टाचार की फाइल में दबाकर निजी स्वार्थ की बलि चढ़ा दिया गया।

7.5 लाख की रिश्वत और 2 करोड़ का खेल

सूत्रों के अनुसार, मीना देवी ने 0.1200 हेक्टेयर जमीन को साढे सात लाख रुपये में खरीदा (दिखाया) और अब उसी सरकारी जमीन पर धड़ल्ले से अवैध प्लॉटिंग का खेल चल रहा है। आज इस जमीन की बाजारू कीमत लगभग 2 करोड़ रुपये आंकी जा रही है। शिकायतकर्ता सुमंत कुमार पांडेय ने जिलाधिकारी (DM) से गुहार लगाते हुए इस जमीन को वापस चरागाह के खाते में दर्ज करने और दोषियों पर कार्रवाई की मांग की है।

प्रधान और लेखपाल की जुगलबंदी: कौन देगा FIR?

नियमतः ग्राम प्रधान को भूमि प्रबंधन समिति का अध्यक्ष होने के नाते इस जालसाजी के खिलाफ FIR दर्ज करानी चाहिए थी। लेकिन सूत्रों का कहना है कि लेखपाल (एलएमसी सचिव) के साथ प्रधानों की भी अपनी सेटिंग होती है। कई मामलों में खुद प्रधान सरकारी जमीनों पर अवैध कब्जे किए बैठे हैं, इसलिए वे चुप्पी साधे हुए हैं।

हर्रैया और परसरामपुर में भी बेलगाम हैं ‘कलम के सिपाही’

भ्रष्टाचार की यह जड़ें सिर्फ सदर तक सीमित नहीं हैं। रिपोर्ट के मुताबिक:

  • हर्रैया तहसील: यहाँ भू-माफियाओं का सबसे अधिक बोलबाला है। लेखपाल यहाँ हजार-दो हजार नहीं, बल्कि लाखों की ‘डील’ करते हैं।
  • परसरामपुर (ग्राम बनगवां खास): यहाँ तो हद ही हो गई, जहाँ लेखपाल पुलिस की भूमिका में आकर काश्तकारों को प्रताड़ित करने और उन्हें बंधक बनाने तक का दुस्साहस कर रहे हैं।

रक्षक ही बने भक्षक: क्यों मौन है ग्राम प्रधान?

नियमतः ग्राम प्रधान भूमि प्रबंधन समिति का अध्यक्ष होता है, जिसकी जिम्मेदारी सरकारी भूमि की रक्षा करना है। लेकिन इस मामले में प्रधान की चुप्पी भी संदेह के घेरे में है। चूंकि एलएमसी का सचिव लेखपाल होता है, इसलिए प्रधान और लेखपाल की जुगलबंदी अक्सर भ्रष्टाचार को खाद-पानी देती है। कई मामलों में खुद प्रधान सरकारी जमीनों पर अवैध कब्जे किए बैठे हैं, जिसके कारण वे इन ‘कलम के सौदागरों’ के खिलाफ बोलने की हिम्मत नहीं जुटा पाते।

रिश्वत का बदलता स्वरूप: 5 हजार से 50 हजार तक का सफर

पुराने समय में लेखपाल हजार-पांच हजार की रिश्वत लेते पकड़े जाते थे, लेकिन आज यह आंकड़ा 50 हजार से लेकर लाखों तक पहुँच गया है। हर्रैया तहसील में तो हालात और भी बदतर हैं। वहाँ के लेखपाल काश्तकारों की मदद करने के बजाय उन्हें पुलिसिया अंदाज में धमकाने और बंधक बनाने तक का काम कर रहे हैं। हाल ही में परसरामपुर थाना के ग्राम बनगवां खास से भी ऐसा ही मिलता-जुलता मामला सामने आया है।

प्रशासन से तीखे सवाल

शिकायतकर्ता सुमंत कुमार पांडेय ने जिलाधिकारी (DM) को पत्र लिखकर इस चरागाह की जमीन को वापस सरकारी खाते में दर्ज करने और दोषियों पर कठोर कार्रवाई की मांग की है। अब सवाल यह उठता है:

  • क्या चरागाह की जमीन बेचने वाले अधिकारियों पर FIR दर्ज होगी?
  • क्या अवैध प्लॉटिंग पर प्रशासन का बुलडोजर चलेगा?
  • आखिर कब तक बस्ती मंडल की सरकारी संपत्तियां इन भू-माफियाओं और भ्रष्ट अधिकारियों की जागीर बनी रहेंगी?

बड़ा सवाल: क्या बस्ती जिला प्रशासन इन ‘कलम के डकैतों’ पर बुलडोजर चलाएगा या करोड़ों की सरकारी जमीन इसी तरह ‘भ्रष्टाचार की भेंट’ चढ़ती रहेगी? अब देखना यह है कि इस रिपोर्ट के बाद शासन स्तर पर क्या कार्रवाई होती है। जनता अब जिलाधिकारी से न्याय की उम्मीद लगाए बैठी है। यदि इस मामले में उच्चस्तरीय जांच नहीं हुई, तो वह दिन दूर नहीं जब जिले की हर सरकारी जमीन पर किसी रसूखदार का बंगला खड़ा होगा और पशु चारे के लिए दर-दर भटकेंगे।

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