
स्वदेशी का ढोंग, विदेशी से मोह: बस्ती जिला पंचायत का ‘नेपाली’ खेल!
बस्ती जिला पंचायत का 'विदेशी' खेल: स्वदेशी का अपमान, नेपाल से मंगाईं ईंटें! योगी सरकार में 'नेपाली' मोह! क्या बस्ती के उद्योगों की अर्थी निकाल रहे हैं अधिकारी?
अजीत मिश्रा (खोजी)
बस्ती जिला पंचायत का ‘विदेशी’ मोह: स्वदेशी हुनर का अपमान और सरकारी धन की बंदरबांट!
विशेष रिपोर्ट: ब्यूरो, बस्ती मंडल
- भ्रष्टाचार की ‘इंटरनेशनल’ ईंट: नेपाल से मंगवाई सामग्री, सवालों पर एएमए का अहंकार! एएमए की खुली चुनौती: “जो लिखना है लिखो, मेरा कुछ नहीं होगा” – लोकतंत्र के चौथे स्तंभ का अपमान!
- जांच के डर से RTI का झुनझुना! विदेशी ईंटों की कीमत बताने में क्यों कांप रहे हाथ? कमीशन का ‘नेपाली’ कनेक्शन? जिला पंचायत की कार्यशैली पर उठे गंभीर सवाल।
- साहब को ‘देसी’ पसंद नहीं! नेपाल के ईंटों से चमकेगा जिला पंचायत का नया भवन। ‘एशियन कंकरीटों’ पर मेहरबानी: बस्ती के कुटीर उद्योगों के पेट पर लात मार रहे जिम्मेदार।
- वोकल फॉर लोकल का जनाज़ा: सीमा पार से मंगाया सामान, जनता की कमाई से भरा जा रहा विदेशी खजाना! बस्ती की जनता पूछ रही: क्या भारत में ईंटें बनना बंद हो गई हैं, जो नेपाल से मंगाना पड़ा?
- गिल्लम चौधरी के सवालों से हड़कंप! जिला पंचायत के ‘विदेशी प्रेम’ पर सदस्य भी खफा। नेपाल का नंबर, विदेशी लोगो: आखिर किसके इशारे पर हो रही ये ‘इंपोर्टेड’ लूट?
बस्ती। उत्तर प्रदेश की योगी सरकार जहाँ एक ओर ओडीओपी (ODOP) और स्थानीय उद्योगों को बढ़ावा देने के लिए दिन-रात एक कर रही है, वहीं बस्ती जिला पंचायत के कारनामे सरकार की मंशा पर पानी फेर रहे हैं। जिला पंचायत ने अपने नवनिर्मित कार्यालय भवन के सौंदर्यकरण के लिए स्थानीय कुटीर उद्योगों को ठेंगा दिखाते हुए पड़ोसी देश नेपाल से इंटरलॉकिंग ईंटें मंगवाई हैं। यह मामला अब जिले में चर्चा और आक्रोश का विषय बन गया है।जहाँ एक तरफ पूरा देश ‘वोकल फॉर लोकल’ और आत्मनिर्भर भारत का दम भर रहा है, वहीं बस्ती जिला पंचायत ने अपनी ही मिट्टी और कुटीर उद्योगों की पीठ में छुरा घोंप दिया है। खबर है कि जिला पंचायत ने अपने नवनिर्मित कार्यालय भवन के लिए स्वदेशी ईंटों को दरकिनार कर नेपाल से ‘इंपोर्टेड इंटरलॉकिंग ईंटें’ मंगवाई हैं। यह जिला पंचायत शायद प्रदेश की पहली ऐसी संस्था बन गई है जिसे भारतीय ईंटों में खोट नजर आने लगा है।

नेपाली कंपनी ‘एशियन कंकरीटों’ पर मेहरबानी क्यों?
मौके पर मिले साक्ष्यों के अनुसार, निर्माण स्थल पर जो ईंटें पहुंची हैं, वे किसी स्थानीय भट्ठे या फैक्ट्री की नहीं, बल्कि नेपाल की कंपनी ‘एशियन कंकरीटों’ की हैं।हैरानी की बात यह है कि इन ईंटों पर ‘एशियन कंकरीटों’ नामक नेपाली कंपनी का रिबन लगा है और उस पर नेपाल का ही मोबाइल नंबर अंकित है। गूगल सर्च और कंपनी के मानचित्र से स्पष्ट है कि इस कंपनी का कारोबार केवल नेपाल में है, भारत में नहीं।
- क्या बस्ती या भारत के किसी कोने में इंटरलॉकिंग ईंटों का निर्माण बंद हो गया है?
- विदेश से ईंटें मंगवाने पर आने वाला भारी-भरकम ट्रांसपोर्ट और अतिरिक्त खर्च किसकी जेब से जा रहा है?
- क्या यह ‘कमीशन’ के चक्कर में जनता की गाढ़ी कमाई की सरेआम बर्बादी नहीं है?
- ईंटों के ऊपर बाकायदा नेपाल की कंपनी का ‘लोगो’ और रिबन लगा हुआ है।
- इन पैकेटों पर नेपाल का मोबाइल नंबर (+977 9802711167) अंकित है, जो पुष्टि करता है कि यह माल सीधे सीमा पार से आया है।
- हैरानी की बात यह है कि इस कंपनी का भारत में कोई कारोबार या नेटवर्क नहीं है, फिर भी जिला पंचायत ने इसी कंपनी को तरजीह दी।
सवालों के घेरे में एएमए (AMA) की चुप्पी और अहंकार
जब इस विदेशी खरीद के पीछे का गणित समझने के लिए अपर मुख्य अधिकारी (एएमए) से संपर्क किया गया, तो उनका व्यवहार अत्यंत गैर-जिम्मेदाराना रहा।जब इस विदेशी ईंट की कीमत और स्रोत के बारे में अपर मुख्य अधिकारी (एएमए) से जवाब माँगा गया, तो उन्होंने जिम्मेदारी जेई और ठेकेदार पर मढ़ दी। जो जानकारी एक मिनट में दी जा सकती थी, उसके लिए बेशर्मी से ‘RTI के तहत सूचना माँगने’ की सलाह दी गई। यह रवैया साफ दर्शाता है कि दाल में कुछ काला नहीं, बल्कि पूरी दाल ही काली है।
- जानकारी छिपाने का प्रयास: एएमए ने ईंटों की कीमत और खरीद के स्रोत के बारे में बताने के बजाय, मामला जेई और ठेकेदार पर टाल दिया।
- RTI का बहाना: जो जानकारी सार्वजनिक होनी चाहिए थी, उसके लिए अधिकारियों ने पत्रकारों को आरटीआई (RTI) के तहत आवेदन करने का झुनझुना थमा दिया।
- लोकतंत्र का अपमान: सूत्रों के मुताबिक, अधिकारियों ने यहाँ तक कह दिया कि उन्होंने बड़े अखबारों को भी कह दिया है कि “जो लिखना हो लिखो, मेरा कुछ नहीं होगा”। यह अहंकार बताता है कि भ्रष्टाचार की जड़ें कितनी गहरी हैं।
स्थानीय उद्योगों की ‘अर्थी’ निकालने की तैयारी?
जिले में दर्जनों ऐसे कुटीर उद्योग और गाँव हैं जहाँ बेहतरीन इंटरलॉकिंग ईंटों का निर्माण होता है। इन स्थानीय उद्योगों को दरकिनार कर विदेश से माल मंगाना न केवल आर्थिक अपराध है, बल्कि उन हजारों मजदूरों के पेट पर लात मारना है जो यहाँ के भट्ठों पर काम करते हैं।
अध्यक्ष की भूमिका पर भी सवाल
लोग अब जिला पंचायत अध्यक्ष से भी सवाल कर रहे हैं कि क्या उनकी नाक के नीचे हो रहे इस ‘विदेशी खेल’ की उन्हें भनक नहीं है? पूर्व के अधिकारियों के शालीन व्यवहार और वर्तमान अधिकारियों के इस ‘गुस्सैल’ और ‘अहंकारी’ रवैये की तुलना अब आम जनता में होने लगी है।एएमए का रवैया न केवल गैर-जिम्मेदाराना है, बल्कि लोकतंत्र के चौथे स्तंभ के प्रति अपमानजनक भी है। सूत्रों के अनुसार, उन्होंने यहाँ तक कह दिया कि “जो लिखना हो लिखो, मेरा कुछ नहीं होगा।” क्या यह अहंकार जिला पंचायत अध्यक्ष की शह पर है या अधिकारियों ने जिले को अपनी जागीर समझ लिया है?
बड़ा सवाल: जिले के लोग अब गिल्लम चौधरी जैसे जांबाज जिला पंचायत सदस्यों की ओर देख रहे हैं और पूछ रहे हैं कि आखिर इस भ्रष्टाचार और स्वदेशी के अपमान पर सब खामोश क्यों हैं? एक तरफ देश आर्थिक चुनौतियों से जूझ रहा है और दूसरी तरफ यहाँ सरकारी पैसे से विदेशी कंपनियों की तिजोरियाँ भरी जा रही हैं।आखिर नेपाल से ईंटें मंगाने के पीछे कितना बड़ा कमीशन का खेल छिपा है? क्या शासन इसकी उच्च स्तरीय जांच कराकर दोषी अधिकारियों पर कार्रवाई करेगा या ‘स्वदेशी’ का नारा सिर्फ कागजों तक ही सीमित रहेगा
यह मामला केवल ईंटों की खरीद का नहीं, बल्कि सरकारी नीति और स्थानीय उद्योगों के साथ किए गए धोखे का है। यदि इसकी उच्च स्तरीय जाँच नहीं हुई, तो यह स्पष्ट हो जाएगा कि यहाँ ‘विकास’ नहीं, बल्कि ‘विदेशी सेटिंग’ का खेल चल रहा है।



















