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बस्ती की नगर पंचायतें बनीं ‘लूट का टापू’: साहब ही बने ठेकेदार, विकास के नाम पर 50% की सरेआम डकैती!

कुर्सी पर 'साहब', पर्दे के पीछे 'ठेकेदार': बस्ती मंडल में भ्रष्टाचार का ऐसा 'नंगा नाच', जानकर दंग रह जाएंगे आप!

अजीत मिश्रा (खोजी)

भ्रष्टाचार विशेष: ‘साहब’ की चाकरी में विकास वेंटिलेटर पर, नगर पंचायतों में कमीशन का ‘कसाईखाना’

ब्यूरो रिपोर्ट: बस्ती (उत्तर प्रदेश)

  • मर्सिडीज वाली कमाई, खस्ताहाल सड़कें: नगर पंचायतों में बजट डकारने वाला ‘साहब-ठेकेदार सिंडिकेट’ बेनकाब!
  • जब ‘माली’ ही बाग उजाड़ने लगे तो गुहार किससे? बस्ती के साहबों को रास आई यहाँ की ‘उपजाऊ’ कमाई!
  • जीरो टॉलरेंस का निकला दम: नगर पंचायतों में बिना काम के ही हो रहे भुगतान, कमीशनखोरी ने तोड़े सारे रिकॉर्ड!
  • साहब का ‘नया बिजनेस’: सरकारी कलम से लिखते हैं लूट की इबारत, ठेकेदारों को बना दिया अपना गुलाम!
  • भ्रष्टाचार का ‘बस्ती मॉडल’: 50 प्रतिशत कमीशन या काम बंद!
  • नगर पंचायतों में ‘अंधेर नगरी’: साहब की साठगांठ, जनता की गाढ़ी कमाई साफ!
  • साहब की ‘विदाई’ का दर्द: बोले- “इतनी उपजाऊ जमीन (बस्ती) फिर कहाँ मिलेगी?”
  • बस्ती मंडल: विकास वेंटिलेटर पर, अधिकारी ‘कमीशन’ के खेल में मस्त—क्या चलेगा इन ‘सफेदपोश लुटेरों’ पर हंटर?

बस्ती। उत्तर प्रदेश की सत्ता के केंद्र लखनऊ से भले ही भ्रष्टाचार मुक्त शासन के दावे किए जाते हों, लेकिन बस्ती मंडल की नगर पंचायतों में हकीकत इसके ठीक उलट है। यहाँ ‘भ्रष्टाचार’ कोई छुपा हुआ शब्द नहीं, बल्कि एक व्यवस्थित उद्योग बन चुका है। सबसे शर्मनाक पहलू यह है कि जिन अधिकारियों (साहब) को जनता की सेवा और सरकारी धन की सुरक्षा के लिए तैनात किया गया था, वे खुद ‘मुखौटा’ लगाकर बड़े ठेकेदार की भूमिका निभा रहे हैं।भ्रष्टाचार के विरुद्ध ‘जीरो टॉलरेंस’ का दम भरने वाले दावों की धज्जियां कहीं और नहीं, बल्कि बस्ती मंडल की नगर पंचायतों में खुलेआम उड़ाई जा रही हैं। यहाँ विकास की गंगा नहीं, बल्कि कमीशनखोरी की ऐसी ‘गंदी नाली’ बह रही है जिसमें ऊपर से नीचे तक सब हाथ धो रहे हैं। चौंकाने वाली सच्चाई यह है कि जिन कंधों पर भ्रष्टाचार रोकने की जिम्मेदारी थी, वही आज ‘ठेकेदार’ बनकर सरकारी खजाने को दीमक की तरह चाट रहे हैं।

साहब, सिंडिकेट और सरेआम लूट

​अखबार को मिली जानकारी और सत्ताधारी दल के ही असंतुष्ट कार्यकर्ताओं की मानें तो नगर पंचायतों में लूट का एक ऐसा ‘ईकोसिस्टम’ तैयार किया गया है जहाँ नियम-कानून ताक पर हैं। चर्चा आम है कि साहब जब जनपद में कदम रखते हैं, तो अपने साथ अपना खास ‘ठेकेदार’ भी लेकर आते हैं। यह ठेकेदार कोई स्वतंत्र व्यापारी नहीं, बल्कि साहब की काली कमाई का ‘कलेक्शन एजेंट’ होता है। हालिया मामले ने तब तूल पकड़ा जब बस्ती से स्थानांतरित होकर जा रहे एक अधिकारी ने जाते-जाते यह दंभ भरा कि “जितना पैसा बस्ती की जमीन ने उगलकर हमें दिया, उतना पूरी नौकरी में नहीं मिला।” यह बयान बस्ती की जनता के मुँह पर तमाचा है।

नगर पंचायतों की कार्यप्रणाली पर उठ रहे सवालों ने अब जन-आक्रोश का रूप ले लिया है। विश्वस्त सूत्रों और खुद सत्ता पक्ष के लोगों का मानना है कि अन्य विभागों में तो सख्ती दिखी, लेकिन नगर पंचायतें भ्रष्टाचार का सुरक्षित ‘टापू’ बन गई हैं। आरोप संगीन हैं—यहाँ के ‘साहब’ (अधिकारी) अपने चहेते ठेकेदारों के साथ मिलकर बंदरबांट का खेल खेल रहे हैं। हालत यह है कि साहब के रसूख के आगे असली ठेकेदार बौने साबित हो रहे हैं।

“अगर माली ही बाग उजाड़ने पर उतारू हो जाए, तो कांटों से शिकायत कैसी? बस्ती की धरती इन भ्रष्ट साहबों के लिए इतनी ‘उपजाऊ’ हो गई है कि विदाई के वक्त भी इनका मोह नहीं छूट रहा।”

50% कमीशन: विकास की ‘मौत’ का रेट कार्ड

​नगर पंचायतों में स्ट्रीट लाइट से लेकर सड़क निर्माण तक, कमीशन का खेल 50 प्रतिशत तक पहुँच गया है। सूत्रों के अनुसार:

  • बजट पर डकैती: जब कोई बाहरी ठेकेदार शासन से बजट आवंटित करवा कर लाता है, तो ‘साहब’ उसे सीधा प्रस्ताव देते हैं— “अपनी मेहनत का एक-दो लाख लो और घर बैठो, बाकी का पूरा बजट हम इस्तेमाल (हड़प) करेंगे।”
  • कागजी विकास: मंडल की कई नगर पंचायतों में ऐसे दर्जनों कार्य हैं जिनका भुगतान हो चुका है, लेकिन धरातल पर एक ईंट भी नहीं लगी।
  • ईमानदारी के लिए जगह नहीं: अगर कोई इक्का-दुक्का संचालक ईमानदारी दिखाना भी चाहे, तो व्यवस्था उसे कुचल देती है। सिंडिकेट का दबाव इतना है कि बिना 50% कमीशन दिए कोई फाइल आगे नहीं बढ़ती।
  • अंधेर नगरी, चौपट राजा: स्ट्रीट लाइट से लेकर निर्माण कार्यों तक में 50 प्रतिशत कमीशन का खेल चल रहा है।
  • बिना काम के भुगतान: कई ऐसे मामले सामने आए हैं जहाँ धरातल पर ईंट भी नहीं रखी गई, लेकिन कागजों पर विकास की चमक दिखाकर करोड़ों का भुगतान डकार लिया गया।
  • ठेकेदारों की बेबसी: अगर कोई ठेकेदार बजट लाता भी है, तो ‘साहब’ का सीधा फरमान होता है— “जितना खर्च लाए हो उतना लो, बाकी बजट हमारा!”

जांच एजेंसियों की चुप्पी पर सवाल?

​बस्ती मंडल के जागरूक नागरिकों का सवाल वाजिब है—आखिर ‘साहब’ पर कार्रवाई क्यों नहीं होती? अन्य विभागों में छोटी सी गड़बड़ी पर निलंबन और जांच बैठ जाती है, लेकिन नगर पंचायतों के खिलाफ शिकायतों का अंबार लगने के बाद भी फाइलें धूल फांक रही हैं। आरोप है कि जांच करने वाली कमेटियों में भी ‘साहब’ की हिस्सेदारी है। जब रक्षक ही भक्षक का साझेदार हो, तो इंसाफ की उम्मीद बेमानी है।बड़ा सवाल यह है कि जब बिजली, स्वास्थ्य और राजस्व जैसे विभागों पर गाज गिरती है, तो नगर पंचायतों के इन ‘सफेदपोश लुटेरों’ को किसका संरक्षण प्राप्त है? शिकायतों के अंबार लगने के बावजूद कार्रवाई सिफर (Zero) क्यों है? क्या इसलिए कि जांच करने वाले और चोरी करने वाले, दोनों के तार एक ही ‘कमीशन’ की डोर से जुड़े हैं?

योगी की सख्ती बनाम ब्यूरोक्रेसी की ‘मस्ती’

​मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने प्रदेश में भ्रष्टाचार के खिलाफ युद्ध छेड़ रखा है, लेकिन बस्ती के ये ‘साहब’ और उनके पाले हुए ‘ठेकेदार’ सीधे तौर पर सरकार की छवि को धूमिल कर रहे हैं। भाजपा के ही कई नेता अब खुलकर इन अधिकारियों के खिलाफ लामबंद हो रहे हैं। उनका कहना है कि अगर इन ‘भ्रष्ट बागबानों’ को जल्द नहीं हटाया गया, तो ये लोकतंत्र के बाग को पूरी तरह उजाड़ देंगे।यह भ्रष्टाचार केवल आर्थिक अपराध नहीं, बल्कि बस्ती की जनता के साथ विश्वासघात है। मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के कड़े तेवरों के बीच, बस्ती के इन साहबों ने अपनी समानांतर सत्ता चला रखी है। जनता अब पूछ रही है कि ‘ठेकेदार बने इन साहबों’ पर बुलडोजर कब चलेगा? क्या इन भ्रष्ट अधिकारियों की संपत्ति की जांच होगी, जो बस्ती को लूटकर अपनी तिजोरियां भर चुके हैं?

निष्कर्ष: जनता की जेब पर डाका

​यह पैसा न तो साहब का है, न ठेकेदार का। यह जनता का खून-पसीना है जिसे टैक्स के रूप में वसूला गया है। बस्ती मंडल की नगर पंचायतों में चल रहा यह ‘नंगा नाच’ शासन की साख को चुनौती दे रहा है। अब देखना यह है कि शासन इन ‘ठेकेदार रूपी साहबों’ के साम्राज्य को ध्वस्त करता है या बस्ती की जनता ऐसे ही लुटती रहेगी।

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