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जनता की जेब पर ‘रिकॉर्ड’ डाका, सुविधाओं के नाम पर बस्ती में सन्नाटा!

नगर पालिका ने वसूले 9 करोड़, पर बदहाली से कराह रहे शहर के वार्ड: कागजों पर चमका '9 करोड़' का राजस्व, जमीन पर बजबजा रही बस्ती की हकीकत!

अजीत मिश्रा (खोजी)

बस्ती ब्यूरो विशेष: दावों की चमक के पीछे अंधेरे में डूबी बस्ती! रिकॉर्ड टैक्स वसूली का ढिंढोरा, लेकिन विकास के नाम पर जनता को सिर्फ मिला ‘ठेंगा’

  • प्रोत्साहन राशि की होड़ में अफसरों ने चमकाए आंकड़े, जनता को मिला सिर्फ ‘ठेंगा’
  •  टैक्स वसूली में ‘नंबर 1’ पालिका, विकास के नाम पर ‘शून्य’!
  •  सरकारी खजाना तो भर गया हुक्मरानों, अब बदहाल सड़कों और नालियों का हिसाब कौन देगा?
  • खजाना फुल, जनता गुल! 9 करोड़ की रिकॉर्ड वसूली के बाद भी नरकीय जीवन जीने को मजबूर बस्ती की जनता।

बस्ती, उत्तर प्रदेश।।‌ नगर पालिका बस्ती के हुक्मरान इन दिनों अपनी पीठ थपथपाने में व्यस्त हैं। अखबारों में बड़े-बड़े बयानों के जरिए यह ढिंढोरा पीटा जा रहा है कि इस वित्तीय वर्ष में रिकॉर्डतोड़ नौ करोड़ रुपये से अधिक की राजस्व वसूली हुई है। दावा किया जा रहा है कि पिछले वर्षों (चार करोड़ 12 लाख) के मुकाबले यह दोगुनी छलांग है। लेकिन सवाल यह उठता है कि क्या टैक्स की यह “रिकॉर्डतोड़” मार झेलने वाली बस्ती की जनता को विकास के नाम पर कुछ मिला भी है, या फिर यह भारी-भरकम रकम सिर्फ सरकारी फाइलों का पेट भरने और कागजी आंकड़े चमकाने के काम आ रही है?

कागजों पर विकास की गंगा, जमीन पर बजबजाती नालियां!

​नगर पालिका के जिम्मेदार अधिकारी बड़े गर्व से कह रहे हैं कि इस वसूली से शहर के सभी वार्डों में नालियां, सड़कें और लाइटें दुरुस्त की जाएंगी। लेकिन जरा मुड़कर शहर की हकीकत देखिए! आज भी हल्की सी बारिश होते ही बस्ती की सड़कें टापू में तब्दील हो जाती हैं। नालियां बजबजा रही हैं, कचरे के ढेर पालिका के ‘स्वच्छ और सुंदर बस्ती’ के दावों का मुंह चिढ़ा रहे हैं। जब जनता अपनी जेब ढीली कर रही है, जल कर और गृह कर (हाउस टैक्स) के नाम पर पालिका का खजाना भर रही है, तो बदले में उसे नरकीय जीवन क्यों मिल रहा है?

प्रोत्साहन राशि की होड़ में जनता पर टैक्स का बोझ?

​इस सरकारी रिपोर्ट में एक बात साफ लिखी है कि शासन स्तर से यह फरमान है कि जो नगर निकाय हर साल अपनी राजस्व वसूली बढ़ाएगा, उसे अतिरिक्त ‘प्रोत्साहन राशि’ दी जाएगी। अब समझ में आया कि यह रिकॉर्ड वसूली का खेल क्या है! शासन से अपनी वाहवाही कराने और प्रोत्साहन फंड बटोरने के चक्कर में नगर पालिका के अधिकारी आम जनता पर टैक्स का भारी बोझ लाद रहे हैं। जनता को समय पर टैक्स जमा करने के लिए ‘जागरूक’ (या कहें मजबूर) तो कर दिया गया, लेकिन क्या उन्हें मिलने वाली बुनियादी सुविधाओं के लिए कोई जागरूकता दिखाई गई?

दुकानदारों और गृहस्वामियों से सिर्फ ‘वसूली’, राहत कब?

​नामांतरण शुल्क, दुकानों का किराया, जल कर और मकान टैक्स… हर जगह से पालिका ने पैसे खींचे हैं। अधिकारी कह रहे हैं कि इस बार भी वसूली में भारी वृद्धि होगी। जनता पूछ रही है कि इस ‘रिकॉर्ड’ वृद्धि का फायदा सिर्फ अफसरों की मीटिंगों और कागजी आंकड़ों को चमकाने के लिए होगा या फिर बस्ती की बदहाल सड़कों और अंधेरे में डूबे मोहल्लों की तकदीर भी बदलेगी?

ब्यूरो की दो टूक:

नगर पालिका प्रशासन यह साफ समझ ले कि लोकतंत्र में जनता ‘दुधारू गाय’ नहीं है कि आप सिर्फ टैक्स दुहते रहें और बदले में उसे टूटी सड़कें और जाम नालियां दें। अगर इस नौ करोड़ की भारी-भरकम रकम के बाद भी जमीन पर विकास कार्य शुरू नहीं हुए, तो जनता आने वाले दिनों में इस कागजी विकास का हिसाब सड़क पर उतरकर मांगेगी। अधिकारी आंकड़ों की बाजीगरी बंद करें और टैक्सपेयर्स के पैसे का हिसाब सीधे काम से दें!

 

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