उत्तर प्रदेशआजमगढ़इतवाकुशीनगरगोंडागोरखपुरबस्तीराम मंदिर अयोध्यालखनऊसिद्धार्थनगर 

बस्ती में ‘अमृत’ के नाम पर बंट रहा ज़हर: ८० अस्पतालों का रजिस्ट्रेशन खत्म, फिर भी खुली हैं मौत की दुकानें!

मुंडेरवा के 'अमृत हॉस्पिटल' में बड़ा फर्जीवाड़ा; बोर्ड 'सुपर स्पेशलिटी' का, अंदर गायब मिले डॉक्टर, अप्रशिक्षित स्टाफ के भरोसे खिलवाड़।

अजीत मिश्रा (खोजी)

बस्ती में ‘अमृत’ के नाम पर बंट रहा ज़हर, ८० अस्पतालों का रजिस्ट्रेशन खत्म फिर भी चल रही मौत की दुकानें!

– विशेष संवाददाता, बस्ती

  • स्वास्थ्य विभाग की नाक के नीचे ‘यमलोक’ का कारोबार: पंजीकरण एक्सपायर्ड, डॉक्टर नदारद… बस्ती में आखिर कब बंद होगा इलाज के नाम पर कत्ल?
  •  ३२५ में से सिर्फ २४० के पास वैध लाइसेंस; बाकी ८० अस्पताल किसके रहमों-करम पर काट रहे मरीजों की जेब और जान?
  • डिग्री पुरानी, डॉक्टर गायब, दलाल सक्रिय… बस्ती के निजी अस्पतालों में चल रहा है जिंदगी का ‘खूनी सौदा’!
  •  मुंडेरवा में रेडियंट से लेकर अमृत हॉस्पिटल तक लापरवाही का लंबा इतिहास; मौतों के बाद भी महकमा सिर्फ ‘नोटिस’ देने में व्यस्त।

बस्ती। उत्तर प्रदेश के बस्ती जिले में स्वास्थ्य व्यवस्था वेंटिलेटर पर है और इसे वेंटिलेटर पर डालने वाले कोई और नहीं, बल्कि चंद रुपयों के खातिर इंसानी जिंदगी का सौदा करने वाले ‘सफेदपोश दलाल’ और ‘फर्जी डॉक्टर’ हैं। मुंडेरवा रोड पर संचालित ‘अमृत हॉस्पिटल’ पर हुई हालिया छापेमारी ने स्वास्थ्य महकमे की नींद तो उड़ा दी है, लेकिन इसके साथ ही एक ऐसा खौफनाक सच भी उजागर किया है, जिसे सुनकर किसी की भी रूह कांप जाए।

​नाम ‘अमृत’ और अंदर काम सीधे यमराज को न्योता देने वाला! यह सिर्फ एक अस्पताल की कहानी नहीं है, बल्कि यह बस्ती जिले के चप्पे-चप्पे पर फैले उस मकड़जाल का हिस्सा है, जहां मरीजों को इलाज नहीं, बल्कि सीधे मौत के मुहाने पर धकेला जाता है।

​खेल सुपर स्पेशलिटी का, हकीकत में ‘रजिस्ट्रेशन’ गायब!

​मुंडेरवा रोड स्थित इस ‘अमृत हॉस्पिटल’ के बाहर बड़े-बड़े अक्षरों में ‘मल्टी स्पेशलिटी, सुपर स्पेशलिटी कार्डियोलॉजी सेंटर’ और ‘प्रमुख रोग निदान केंद्र’ के चमचमाते बोर्ड टांगे गए थे। आम जनता, विशेषकर ग्रामीण इलाकों के सीधे-साधे लोग, इन भारी-भरकम अंग्रेजी शब्दों और दावों के झांसे में आ जाते हैं कि यहाँ दिल की गंभीर बीमारियों का इलाज होगा।

​लेकिन जब प्रशासनिक टीम ने यहाँ छापा मारा, तो जो हकीकत सामने आई वह चौंकाने वाली थी:

  • एक्सपायर्ड रजिस्ट्रेशन: इस तथाकथित सुपर स्पेशलिटी अस्पताल का पंजीकरण बीते ३० अप्रैल को ही समाप्त हो चुका था।
  • गायब डॉक्टर, फर्जी स्टाफ: जिस डॉ. प्रतिभा शर्मा की एमबीबीएस डिग्री के आधार पर इस अस्पताल का रजिस्ट्रेशन कराया गया था, उनकी डिग्री का रिन्यूअल (नवीनीकरण) ही नहीं हुआ था। हद तो तब हो गई जब जांच में पता चला कि डॉ. प्रतिभा मौके पर मौजूद ही नहीं थीं! दूर-दराज के किसी डॉक्टर की डिग्री कागजों पर दिखाकर, अस्पताल के भीतर सारा खेल अप्रशिक्षित, अनुभवहीन और कथित ‘स्वास्थ्य कर्मियों’ (कंपाउंडरों-दलालों) द्वारा खेला जा रहा था।
  • अवैध पैथोलॉजी और एक्स-रे: अस्पताल के भीतर बिना किसी मानक और अनुमति के अवैध पैथोलॉजी, एक्स-रे और अल्ट्रासाउंड मशीनें धड़ल्ले से चल रही थीं।

​मुंडेरवा में ‘रेडियंट’ और ‘अमृत’ का खूनी नेक्सस: प्रसूताओं की जान से खिलवाड़

​यह पहला मौका नहीं है जब मुंडेरवा क्षेत्र में ऐसा खेल पकड़ा गया हो। रेलवे क्रॉसिंग के पास बिना किसी वैध पंजीकरण के चल रहे ‘रेडियंट हॉस्पिटल’ का इतिहास भी दागदार रहा है। जानकार बताते हैं कि इस इलाके में नॉर्मल डिलीवरी कराने के नाम पर गर्भवती महिलाओं को भर्ती किया जाता है। विशेषज्ञ डॉक्टरों की अनुपस्थिति में, केवल ‘अनुभव’ के दम पर अप्रशिक्षित स्टाफ ऑपरेशन थियेटर में घुस जाता है।

​जब इन अनक्वालिफाइड लोगों की लापरवाही से प्रसूता की हालत बिगड़ जाती है और वह मरने की कगार पर पहुंच जाती है, तो ये अस्पताल वाले आनन-फानन में मरीज को एम्बुलेंस में लादकर किसी निजी बड़े अस्पताल या लखनऊ रेफर कर अपना पल्ला झाड़ लेते हैं। इसी रेडियंट अस्पताल में कुछ समय पहले लापरवाही के चलते एक प्रसूता की मौत भी हो चुकी है, लेकिन सांठगांठ के चलते कार्रवाई को फाइलों में दबा दिया गया।

​मौतों का सिलसिला लंबा है, लेकिन कार्रवाई सिर्फ ‘कागजी’

​बस्ती जिले में निजी अस्पतालों की लापरवाही से होने वाली मौतों की फेहरिस्त बहुत लंबी है, मगर विडंबना देखिए कि हर बार स्वास्थ्य विभाग सिर्फ ‘नोटिस’ जारी करने या कुछ दिनों के लिए ‘सील’ करने की रस्म अदायगी करके सो जाता है:

  • मामला १ (रोडवेज स्थित अस्पताल): करीब सालभर पहले लापरवाही के कारण यहाँ एक मासूम बच्चे की मौत हुई थी। भारी हंगामे के बाद प्रशासन ने अस्पताल को सील किया था। लेकिन कुछ ही महीनों बाद बंद कमरों के पीछे ‘सेटिंग’ हुई और वह अस्पताल आज फिर सीना ताने खड़ा है।
  • मामला २ (बुजुर्ग महिला की मौत): करीब ११ महीने पहले एक अन्य नामी अस्पताल में डॉक्टरों की घोर लापरवाही के चलते एक बुजुर्ग महिला की जान चली गई थी। परिजनों ने खूब रोना-पीटना मचाया, जांच बैठी, लेकिन नतीजा? ढाक के तीन पात! आज भी वह अस्पताल बदस्तूर चल रहा है।
  • मामला ३ (पंचपेडिया रोड): महज तीन महीने पहले पंचपेडिया रोड पर संचालित एक अस्पताल में एक और बुजुर्ग महिला ने दम तोड़ा। हर बार की तरह हंगामा हुआ और हर बार की तरह मामले को रफा-दफा कर दिया गया।
  • मामला ४ (कप्तानगंज का फर्जीवाड़ा): कप्तानगंज में तो हद ही हो गई, जहां एक फर्जी फार्मासिस्ट खुद डॉक्टर बनकर लोगों को एंटी-रेबीज के इंजेक्शन लगा रहा था। उसे रंगे हाथों पकड़ा गया, मगर इस रैकेट की जड़ें इतनी गहरी हैं कि ये फिर से पनप जाते हैं।

​आंकड़ों का खौफनाक सच: ८० अस्पताल बिना लाइसेंस के सक्रिय!

​सरकारी आंकड़े खुद चीख-चीखकर स्वास्थ्य विभाग की नाकामी बयां कर रहे हैं। जिले में कुल ३२५ अस्पतालों ने पंजीकरण के लिए आवेदन किया था, जिनमें से मानकों को पूरा करने वाले २४० अस्पतालों का ही रिन्यूअल (पंजीकरण) हो सका है।

सबसे बड़ा सवाल: बाकी बचे ८० अस्पतालों का रजिस्ट्रेशन ३० अप्रैल को समाप्त हो चुका है। नियम के मुताबिक, १ मई से इन अस्पतालों में एक भी मरीज की भर्ती या इलाज नहीं होना चाहिए था। लेकिन हकीकत यह है कि इन ८० अस्पतालों में आज भी काउंटर पर धड़ल्ले से पर्चियां कट रही हैं, ऑपरेशन हो रहे हैं और मरीजों की जेबें व जान दोनों काटी जा रही हैं। इनमें से सिर्फ २५ से ३० अस्पतालों ने ही रिन्यूअल के लिए दोबारा आवेदन करने की जहमत उठाई है, बाकी के ५० से ज्यादा अस्पताल बिना किसी खौफ के ‘अवैध’ रूप से चल रहे हैं।

 

​दलालों और आशा बहुओं का खूनी सिंडिकेट

​इन अवैध अस्पतालों की रीढ़ हैं- कमीशनखोर दलाल और कुछ भ्रष्ट एम्बुलेंस चालक व आशा बहुएं। जिला अस्पताल, महिला अस्पताल या ग्रामीण पीएचसी (PHC) में जैसे ही कोई गरीब या सीधा-साधा ग्रामीण मरीज पहुंचता है, ये दलाल सक्रिय हो जाते हैं। सरकारी डॉक्टरों की कमियों या भीड़ का डर दिखाकर, ये दलाल मरीजों को बहला-फुसलाकर इन ‘मौत के कुओं’ (अवैध प्राइवेट अस्पतालों) में शिफ्ट करवा देते हैं। इसके बदले इन दलालों को प्रति मरीज ३० से ४० प्रतिशत तक का मोटा कमीशन मिलता है।

​मुख्य चिकित्सा अधिकारी (CMO) का दावा बनाम जमीनी हकीकत

​जब इस पूरे मामले पर जिले के मुख्य चिकित्सा अधिकारी (CMO) डॉ. राजीव निगम से बात की गई, तो उनका कहना था:

​”पंजीकरण के बिना कोई भी अस्पताल संचालित नहीं किया जा सकता। यदि कोई ऐसा कर रहा है तो यह पूरी तरह से गलत और अवैध है। एमबीबीएस की डिग्री पर पंजीकृत मल्टीस्पेशलिटी अस्पतालों की सघन जांच की जाएगी। जो भी दोषी पाया जाएगा, उसके खिलाफ अस्पताल सीलिंग समेत कठोरतम विधिक कार्रवाई की जाएगी।”

 

अखबार का तीखा सवाल:

माननीय सीएमओ साहब! आपके दावे कागजों पर बेहद सुदृढ़ हैं, लेकिन जमीनी हकीकत यह है कि आपकी नाक के ठीक नीचे, पंचपेडिया रोड, कचहरी रोड, रुधौली रोड और मुंडेरवा में ये ८० अवैध अस्पताल शान से चल रहे हैं। क्या स्वास्थ्य विभाग सिर्फ किसी और मरीज की ‘लाश’ गिरने का इंतजार कर रहा है, ताकि वह मौके पर जाकर एक नया नोटिस जारी कर सके?

​बस्ती की जनता अब इस ‘नोटिस-नोटिस’ के खेल से थक चुकी है। जब तक इन अवैध अस्पतालों के मालिकों को जेल की सलाखों के पीछे नहीं भेजा जाएगा और इन्हें संरक्षण देने वाले विभागीय अधिकारियों पर गाज नहीं गिरेगी, तब तक बस्ती में ‘इलाज के नाम पर कत्ल’ का यह धंधा बंद नहीं होने वाला!

Check Also
Close
Back to top button
error: Content is protected !!