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भ्रष्टाचार छुपाने का नया पैंतरा! हरैया महिला अस्पताल में टेंडर का ‘सच’ मांगा, तो थमा दिया 32 हजार का बिल

सरकारी अस्पताल या वसूली केंद्र? RTI में खुली पोल, तो 16 हजार पन्नों के पीछे छुपाया टेंडर और भुगतान का खेल

अजीत मिश्रा (खोजी)

सरकारी अस्पताल या वसूली का अड्डा? RTI में माँगा टेंडर-भुगतान का सच, तो अस्पताल प्रशासन ने थमा दिया 32 हजार का बिल!

ब्यूरो रिपोर्ट: बस्ती मंडल, उत्तर प्रदेश

  • गरीबों के अस्पताल में अमीर हुई फाइलें! टेंडर और मशीन खरीद की कुंडली जानने के लिए चुकाने होंगे ₹32,676
  • बस्ती स्वास्थ्य महकमे में हड़कंप: एजेंसियों पर मेहरबानी और आउटसोर्सिंग में घालमेल, ‘थर्ड पार्टी’ के बहाने सच दबाने की कोशिश
  • RTI पर 32 हजार का ‘टैक्स’! हरैया महिला चिकित्सालय के करोड़ों के टेंडर और खर्चों पर उठे गंभीर सवाल

हरैया (बस्ती)। उत्तर प्रदेश सरकार जहाँ एक तरफ भ्रष्टाचार पर जीरो टॉलरेंस और सरकारी विभागों में पारदर्शिता का ढिंढोरा पीट रही है, वहीं बस्ती जिले के हरैया स्थित ‘100 शय्या महिला चिकित्सालय’ में भ्रष्टाचार की परतों को छुपाने का एक बेहद चौंकाने वाला खेल सामने आया है। अस्पताल में हुए टेंडर, मशीन खरीद, आउटसोर्सिंग और भुगतानों में हुए कथित घपले को दबाने के लिए अस्पताल प्रशासन ने सूचना के अधिकार (RTI) को ही कमाई और बचाव का जरिया बना लिया है।

​अस्पताल के काले कारनामों का कच्चा चिट्ठा बाहर न आ जाए, इसके लिए RTI आवेदक से रिकॉर्ड देने के बदले 32,676 रुपये की भारी-भरकम राशि जमा करने का फरमान सुनाया गया है। इस चौंकाने वाले जवाब के बाद पूरे स्वास्थ्य महकमे में हड़कंप मच गया है और क्षेत्र में टेंडर व भुगतानों को लेकर तीखे सवाल उठने शुरू हो गए हैं।

​क्या है पूरा मामला? खोलिए भ्रष्टाचार की परतें:

​एक सजग नागरिक द्वारा सूचना के अधिकार (RTI) के तहत वर्ष 2024 से 31 मार्च 2026 तक अस्पताल में हुए कार्यों, खर्चों, टेंडर प्रक्रियाओं और भुगतानों से संबंधित दस्तावेज मांगे गए थे। मुख्य चिकित्साधिकारी (CMO) कार्यालय से ट्रांसफर होकर जब यह आवेदन मुख्य चिकित्सा अधीक्षक (CMS) कार्यालय पहुँचा, तो जो जवाब मिला उसने सरकारी तंत्र की नीयत को पूरी तरह बेनकाब कर दिया।

​अस्पताल प्रशासन ने दलील दी है कि मांगी गई सूचनाएं लगभग 16,338 पन्नों में हैं, और RTI अधिनियम के तहत ₹2 प्रति पृष्ठ की दर से ₹32,676 जमा करने के बाद ही ये अभिलेखागार से बाहर निकलेंगे।

बड़ा सवाल: क्या 16,338 पन्नों का यह विशालकाय पहाड़ सिर्फ इसलिए खड़ा किया गया है ताकि भारी-भरकम फीस सुनकर आवेदक पीछे हट जाए और टेंडर के नाम पर हुआ खेल फाइलों में ही दफन रहे?

 

​इन गंभीर मुद्दों पर फंसा है पेच, उठ रहे हैं तीखे सवाल:

  1. कंपनियों और ठेकेदारों का रहस्यमयी नेटवर्क: RTI के जवाब में खुद माना गया है कि अस्पताल में विभिन्न सेवाओं के लिए कई बाहरी एजेंसियों का चयन किया गया। इसमें श्री दिनेश कुमार सिंह कांट्रैक्टर, मेसर्स एम एंड जे कंपनी गोंडा, प्वाइंट ऑफ केयर लेबोरेटरीज प्राइवेट लिमिटेड लखनऊ और मेसर्स सूफू एसोसिएट्स लखनऊ जैसी फर्में शामिल हैं। इन एजेंसियों को किस आधार पर मलाईदार टेंडर बांटे गए, इसकी पूरी कुंडली अब तक गुप्त रखी गई है।
  2. आउटसोर्सिंग में भारी घालमेल की बू: अस्पताल में आउटसोर्स कर्मचारियों की नियुक्ति, उनकी उपस्थिति पंजिका, वेतन भुगतान, ईपीएफ (EPF) और ईएसआई (ESI) से जुड़े अहम दस्तावेज मांगे गए थे। अस्पताल प्रशासन ने यह कहकर पल्ला झाड़ लिया कि कर्मचारियों का चयन जिला शहरी आजीविका केंद्र (DUDA) के माध्यम से किया जाता है। आखिर कर्मचारियों के हक और वेतन भुगतान की फाइलों को छुपाने के पीछे किसका हाथ है?
  3. मशीन और उपकरण खरीद में ‘गोलमाल’: अस्पताल में खरीदी गई मशीनों, उनके सप्लायर, लागत और भुगतान की मंजूरी के रिकॉर्ड्स पर अस्पताल प्रशासन गोलमोल जवाब दे रहा है। उनका कहना है कि ‘मशीनों की सूची स्पष्ट नहीं होने’ के कारण सूचना देने में कठिनाई हो रही है। सरकारी अस्पताल में करोड़ों की मशीनें आ जाती हैं, लेकिन उनके बिल और सप्लायर की सूची स्पष्ट न होना सीधे तौर पर मिलीभगत की ओर इशारा करता है।
  4. ‘तीसरे पक्ष’ (Third Party) का बहाना: जब भुगतानों से जुड़े बिल और वाउचर की प्रतियां मांगी गईं, तो अस्पताल प्रशासन ने बड़ी चालाकी से “तृतीय पक्ष” का हवाला देते हुए कह दिया कि संबंधित पक्ष की सहमति के बिना सूचना नहीं दी जा सकती। जनता के टैक्स के पैसे से होने वाले भुगतान को छुपाने के लिए यह ‘थर्ड पार्टी’ का नया पैंतरा किसके इशारे पर खेला जा रहा है?

​ऑडिट न होना… या जानबूझकर टालना?

​हैरानी की बात यह है कि महालेखाकार (AG) प्रयागराज की ओर से इस अस्पताल का अभी तक कोई ऑडिट नहीं किया गया है। वित्तीय वर्ष 2024-25 की केवल आंतरिक समीक्षा रिपोर्ट पर कार्रवाई का नाटक चल रहा है। अस्पताल प्रशासन का दावा है कि टेंडर और भुगतान को लेकर कोई शिकायत प्राप्त नहीं हुई है, लेकिन जब कोई रिकॉर्ड सार्वजनिक करने को ही तैयार नहीं है, तो शिकायत किस आधार पर होगी?

​जनता में भारी आक्रोश, पारदर्शिता की मांग:

​इतनी बड़ी रकम (32 हजार से अधिक) की मांग ने स्थानीय जनता और जागरूक नागरिकों को आक्रोशित कर दिया है। क्षेत्र के प्रबुद्ध नागरिकों का साफ कहना है कि:

  • ​सरकारी अस्पताल में जनता के पैसे से जो भी खर्च या टेंडर हुए हैं, उनकी जानकारी पूरी तरह से सार्वजनिक होनी चाहिए।
  • ​सूचना देने के नाम पर मोटी रकम वसूलने की यह कोशिश सीधे तौर पर भ्रष्टाचार को संरक्षण देने जैसी है।

ब्यूरो टिप्पणी:

क्या बस्ती जिले का स्वास्थ्य महकमा और जिला प्रशासन हरैया महिला चिकित्सालय के इस ‘सफेद हाथी’ बन चुके सिस्टम की उच्च स्तरीय जांच कराएगा? या फिर ₹32,000 की इस ‘RTI दीवार’ के पीछे टेंडर और करोड़ों के भुगतानों का यह खेल ऐसे ही परदे के पीछे चलता रहेगा? जनता जवाब मांग रही है!

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