‘टेंडर’ नकली, ‘फर्म’ नकली और ‘भुगतान’ नकली – बस्ती के सीएमओ कार्यालय में 6 करोड़ रुपये के घोटाले का सनसनीखेज मामला.
इस पूरे भ्रष्टाचार की शिकायत दो साल पहले दीपक कुमार मिश्रा ने डीएम से की थी, जिसके बाद डीएम ने सीडीओ और सीटीओ की एक जांच टीम गठित कर दी। लेकिन विडंबना यह है कि आज तक उस जांच टीम ने अपनी रिपोर्ट ही नहीं सौंपी है। रिपोर्ट न सौंपने की असल वजह यह है कि जिस सीटीओ पर फर्जी भुगतान करने के गंभीर आरोप हैं, उसी को जांच अधिकारी बना दिया गया।
अजीत मिश्रा (खोजी)
🖇️बिना टेंडर के पिछले पांच सालों से चहेती फर्म ‘मां काली’ (अमरनाथ यादव) को हर साल लगभग सवा करोड़ रुपये का अवैध भुगतान किया जा रहा है.🖇️
🖇️भ्रष्टाचार की पत्रावली मांगने वाले बाबू प्रमोद कुमार मिश्रा को फाइल देने से बचाने के लिए कार्यालय स्तर पर लगातार पैंतरे अपनाए जा रहे हैं.
🖇️एसपी विजिलेंस द्वारा नोटिस दिए जाने के बावजूद आरोपी बाबू प्रेम बहादुर सिंह के खिलाफ सीएमओ कार्यालय द्वारा कोई कार्रवाई नहीं की गई है.
🖇️घोटाले की जांच के लिए गठित टीम पर सवाल खड़े हो रहे हैं क्योंकि जिस सीटीओ पर फर्जी भुगतान का आरोप है, वही जांच अधिकारी बनाए गए हैं.
🖇️जांच रिपोर्ट लंबित रहने के बीच यह चर्चा जोरों पर है कि मामला “20 लाख रुपये में मैनेज” हो चुका है.
बस्ती।। बस्ती जिले के मुख्य चिकित्सा अधिकारी (CMO) कार्यालय में भ्रष्टाचार के एक ऐसे नासूर का पर्दाफाश हुआ है, जो प्रशासनिक विफलता और मिलीभगत की पराकाष्ठा को बयान करता है। यहां पिछले पांच वर्षों से विद्युत कार्यों के नाम पर ‘टेंडर नकली, फर्म नकली और भुगतान नकली’ का खेल धड़ल्ले से चल रहा है। इस पूरे घोटाले के केंद्र में सीएमओ कार्यालय के बाबू प्रेम बहादुर सिंह और सीएमओ की संदिग्ध भूमिका है, जिन्होंने मिलकर सरकारी खजाने से लगभग छह करोड़ रुपये का बंदरबांट किया है।
टेंडर गायब, चहेती फर्म को हर साल सवा करोड़ का रेवड़ी वितरण
नियमों को ताक पर रखकर पिछले पांच साल से विद्युत कार्य के लिए कोई टेंडर ही नहीं निकाला गया है। कायदे से हर साल नियमानुसार टेंडर होना चाहिए था, लेकिन टेंडर प्रक्रिया को दरकिनार कर मनमाने तरीके से प्रेम बहादुर सिंह की शह पर ‘मां काली’ यानी अमरनाथ यादव को हर साल लगभग सवा करोड़ रुपये का काम और भुगतान किया जा रहा है। इस तरह कागजों और फर्जीवाड़े के जरिए लगभग छह करोड़ रुपये का अवैध भुगतान किया जा चुका है। इस बड़े खेल को छिपाने के लिए मुख्य पत्रावली को ही गायब कर दिया गया है।
फर्जी फर्म और नियमों की सरेआम धज्जियां
जब पांच साल पहले सीएमओ कार्यालय में विद्युत कार्य के लिए टेंडर निकला था, तब ‘स्वामित्व एंटरप्राइजेज’ ने 21 प्रतिशत बिलो (कम दरों) पर कमेटी द्वारा टेंडर फाइनल कराया था। लेकिन जब अनुबंध करने की बारी आई, तो वह फर्म सामने नहीं आई और यह बात सामने आई कि यह फर्म भी ‘मां काली’ की सहयोगी ‘जायसवाल एंड ब्रदर्स’ की ही है। नियम यह कहता है कि यदि टेंडर फाइनल होने के बाद फर्म अनुबंध के लिए न आए, तो उसे ब्लैकलिस्ट कर पुनः टेंडर निकाला जाना चाहिए। इसके विपरीत, एक गहरी साजिश के तहत प्रेम बहादुर सिंह और अमरनाथ यादव ने बिना किसी कानूनी प्रावधान के केवल ‘सहमति पत्र’ के आधार पर अमरनाथ यादव को 21 प्रतिशत बिलो दर पर काम सौंप दिया। हद तो तब हो गई जब अमरनाथ यादव का चरित्र प्रमाण-पत्र बस्ती के डीएम द्वारा और हैसियत प्रमाण-पत्र गोरखपुर के डीएम द्वारा बनाया गया, जबकि नियमानुसार दोनों प्रमाण-पत्र एक ही जिले के डीएम द्वारा जारी होने चाहिए थे।
फाइलों को दबाने की कोशिश और विजिलेंस का शिकंजा
जब गोरखपुर से पांच साल बाद तबादला होकर सीएमओ कार्यालय आए बाबू प्रमोद कुमार मिश्रा ने इस मामले की पत्रावली प्रेम बहादुर सिंह से मांगी, तो कार्यालय में हड़कंप मच गया। इस पत्रावली में प्रेम बहादुर सिंह और मां काली के काले कारनामों का पूरा इतिहास छिपा हुआ है। प्रमोद मिश्रा को पत्रावली न मिल सके, इसके लिए हरसंभव पैंतरे अपनाए जा रहे हैं, हालांकि प्रमोद मिश्रा ने इसके लिए लिखित पत्र भी दिया है। एसपी विजिलेंस ने भी पत्रावली उपलब्ध न कराने के मामले में प्रेम बहादुर सिंह को नोटिस थमाया है, लेकिन इसके बावजूद सीएमओ की ओर से उनके खिलाफ कोई कार्रवाई नहीं की गई है।
जांच के नाम पर लीपापोती और ‘मैनेजमेंट’ का खेल
इस पूरे भ्रष्टाचार की शिकायत दो साल पहले दीपक कुमार मिश्रा ने डीएम से की थी, जिसके बाद डीएम ने सीडीओ और सीटीओ की एक जांच टीम गठित कर दी। लेकिन विडंबना यह है कि आज तक उस जांच टीम ने अपनी रिपोर्ट ही नहीं सौंपी है। रिपोर्ट न सौंपने की असल वजह यह है कि जिस सीटीओ पर फर्जी भुगतान करने के गंभीर आरोप हैं, उसी को जांच अधिकारी बना दिया गया। चर्चा है कि सीटीओ को फर्जी भुगतान के एवज में चार प्रतिशत कमीशन मिला था, जिसके कारण जांच को ठंडे बस्ते में डाल दिया गया। स्थिति यह है कि आरोपी पक्ष अब खुलेआम यह दावा कर रहा है कि “मामला 20 लाख में मैनेज हो गया है, अब कुछ नहीं होगा”। जब जिले के शीर्ष स्तर पर अधिकारी ही इस तरह मैनेज हो रहे हों, तो प्रेम बहादुर सिंह और संदीप राय जैसे लोगों के हौसले बुलंद होना स्वाभाविक है।















