
बस्ती: स्वास्थ्य विभाग में ‘स्टेनो’ की समानांतर सरकार! जांच की फाइल दबाकर अल्ट्रासाउंड माफियाओं को दिया ‘सेफ पैसेज’
"बस्ती स्वास्थ्य विभाग में 'स्टेनो' बना सुपर सीएमओ! 15 दिन तक फाइल दबाकर अल्ट्रासाउंड माफियाओं को दिया जीवनदान"
अजीत मिश्रा (खोजी)
🔔बस्ती CMO कार्यालय बना ‘स्टेनो का अखाड़ा’! 15 दिन तक गायब रही जांच की फाइल, क्या भ्रष्टाचार की भेंट चढ़ गया विभाग?🔔
बस्ती मंडल | ब्यूरो रिपोर्ट | 16 अप्रैल, 2026
- “सीएमओ बेबस, स्टेनो बेखौफ! क्या भ्रूण परीक्षण के अड्डों को बचाने के लिए रोकी गई जांच की फाइल?”
- “बस्ती मंडल में प्रशासनिक ‘सर्जरी’ की दरकार: भ्रष्टाचार की चादर ओढ़े बैठा सीएमओ कार्यालय, जांच पत्र गायब होने से मचा हड़कंप”
- “स्टेनो की मनमानी या भ्रष्टाचार का गठजोड़? बस्ती के इन 4 बड़े अल्ट्रासाउंड सेंटरों पर क्यों मेहरबान है विभाग?”
- “साहब! आपकी नाक के नीचे चल रहा ‘फाइल दबाओ’ खेल; स्टेनो राज में नियम-कानून हुए तार-तार”
बस्ती। उत्तर प्रदेश के स्वास्थ्य विभाग में ‘सिस्टम’ को दीमक की तरह चाटने वाले भ्रष्टाचारियों के हौसले इतने बुलंद हैं कि अब बड़े अधिकारियों के आदेश भी रद्दी के भाव समझे जा रहे हैं। बस्ती जिले के मुख्य चिकित्साधिकारी (CMO) कार्यालय से एक ऐसा सनसनीखेज मामला सामने आया है, जिसने पूरे विभाग की कार्यप्रणाली पर कालिख पोत दी है। यहां किसी साहब का नहीं, बल्कि एक ‘स्टेनो’ का राज चल रहा है, जिसकी दबंगई के आगे नियम-कानून बौने साबित हो रहे हैं।
🔔15 दिनों तक फाइल ‘दफन’, आखिर किसका था संरक्षण?
सबसे चौंकाने वाला खुलासा 30 मार्च 2026 के एक पत्र को लेकर हुआ है। CMO डॉ. राजीव निगम ने PC-PNDT के नोडल अधिकारी डॉ. ए.के. चौधरी को स्पष्ट निर्देश दिया था कि 7 दिन के भीतर जिले के संदिग्ध अल्ट्रासाउंड सेंटरों की जांच कर रिपोर्ट सौंपें। लेकिन ताज्जुब देखिए! डिस्पैच नंबर मिलने के बावजूद यह पत्र 15 दिनों तक संबंधित अधिकारी की मेज तक नहीं पहुंचा।
🎯बड़ा सवाल: क्या यह महज एक ‘लिपिकीय त्रुटि’ थी या फिर उन अवैध अल्ट्रासाउंड सेंटरों को बचाने की एक सोची-समझी साजिश, जो मोटी मलाई विभाग के गलियारों में पहुंचा रहे हैं?
🔔स्टेनो अनिल कुमार चौधरी: स्वयंभू ‘मिनी CMO’?
विभागीय सूत्रों और कर्मचारियों की मानें तो स्टेनो अनिल कुमार चौधरी ने कार्यालय को अपनी जागीर बना लिया है। आरोप है कि वह विभागीय फैसलों में खुद हस्तक्षेप करता है और CMO से सिर्फ मुहर लगवाता है। राज्य कर्मचारी नियमावली को ताक पर रखकर किया जा रहा उसका आचरण अब चर्चा का विषय बना हुआ है। कर्मचारियों में भारी आक्रोश है, लेकिन ‘ऊपर’ तक पहुंच के चलते इस ‘स्टेनो राज’ पर नकेल कसने वाला कोई नहीं है।
🔔जांच के घेरे में ये अल्ट्रासाउंड सेंटर
अल्ट्रासाउंड सेंटरों की धांधली का आलम यह है कि पंजीकरण कहीं और है और धंधा कहीं और से संचालित हो रहा है। इस सिंडिकेट में मुख्य रूप से इन संस्थानों के नाम उछल रहे हैं:
- नव ज्योति
- गौर अल्ट्रासाउंड
- लाइफ अल्ट्रासाउंड
- कृष्णा डायग्नोस्टिक सेंटर
🔔साजिश की क्रोनोलॉजी: 15 दिन की ‘खामोशी’ का राज
30 मार्च को जारी आदेश को 15 अप्रैल तक दबाए रखना कोई मानवीय भूल नहीं, बल्कि एक सुनियोजित ‘प्रशासनिक हत्या’ है।
- जांच का मकसद: CMO ने संदिग्ध अल्ट्रासाउंड केंद्रों पर छापेमारी और उनकी वैधता की जांच का आदेश दिया था।
- खेल: सूत्रों का दावा है कि इन 15 दिनों के भीतर स्टेनो और उसके सिंडिकेट ने संबंधित सेंटर संचालकों को ‘अलर्ट’ कर दिया, ताकि वे जांच से पहले अपने कागजात और अवैध मशीनें ठिकाने लगा सकें।
- अल्ट्रासाउंड सेंटरों का मायाजाल: पंजीकरण कहीं, संचालन कहीं!
🎯नव ज्योति, गौर, लाइफ और कृष्णा डायग्नोस्टिक जैसे केंद्रों के नाम इस पूरे प्रकरण में प्रमुखता से उछल रहे हैं। इन पर गंभीर आरोप हैं:
- लोकेशन फ्रॉड: पंजीकरण शहर के एक कोने में है, लेकिन कमाई के लिए सेंटर दूसरे गैर-पंजीकृत इलाकों में चलाए जा रहे हैं।
- PC-PNDT की धज्जियां: आरोप है कि इन सेंटरों पर बिना किसी योग्य रेडियोलॉजिस्ट के धड़ल्ले से जांच हो रही है, जो सीधे तौर पर कानून का उल्लंघन है।
- कमीशन का खेल: स्टेनो अनिल कुमार चौधरी पर आरोप है कि वह इन सेंटरों और विभाग के बीच ‘कड़ी’ का काम करता है, जिससे विभाग के फैसलों को प्रभावित किया जा सके।
🔔कर्मचारी नियमावली का खुला उल्लंघन
कार्यालय के भीतर दबी जुबान में कर्मचारी यह कहने लगे हैं कि स्टेनो अनिल कुमार चौधरी खुद को ‘सुपर सीएमओ’ समझने लगा है। राज्य कर्मचारी आचरण नियमावली के अनुसार, कोई भी कर्मचारी विभागीय निर्णयों में हस्तक्षेप नहीं कर सकता, लेकिन यहाँ स्टेनो ही तय कर रहा है कि कौन सी फाइल आगे बढ़ेगी और किसे डस्टबिन में डालना है। आखिर किसके रसूख के दम पर एक अदना सा कर्मचारी पूरे मंडल के स्वास्थ्य ढांचे को बंधक बनाए बैठा है?
🔔जनता की सेहत से खिलवाड़ और ‘साहब’ का मौन
CMO डॉ. राजीव निगम की कार्यशैली पर भी अब उंगलियां उठ रही हैं। जब उन्हें पता चला कि उनके आदेश का अनुपालन नहीं हुआ और फाइल रोक दी गई, तो उन्होंने अब तक अनुशासनात्मक कार्रवाई क्यों नहीं की? क्या साहब का अपने ही मातहतों पर नियंत्रण खत्म हो चुका है, या फिर यह ‘मौन’ किसी बड़े समझौते का हिस्सा है? इस पूरे प्रकरण में CMO की रहस्यमयी चुप्पी सबसे बड़ा सवाल खड़ा करती है। आखिर क्या वजह है कि अपनी नाक के नीचे हो रही इस मनमानी पर साहब मौन हैं? क्या उच्चाधिकारी इस ‘भ्रष्टाचार के खेल’ का संज्ञान लेंगे या फिर फाइल की तरह इस मामले को भी दबा दिया जाएगा?
✍️खोजी रिपोर्ट का निष्कर्ष: > यदि बस्ती के जिलाधिकारी (DM) और स्वास्थ्य महानिदेशक ने इस ‘स्टेनो-माफिया’ गठजोड़ पर तत्काल सर्जिकल स्ट्राइक नहीं की, तो वह दिन दूर नहीं जब जिले की स्वास्थ्य सेवाएं पूरी तरह वेंटिलेटर पर होंगी।
🔥बस्ती की जनता पूछ रही है— स्वास्थ्य विभाग की साख बचाने के लिए इस ‘स्टेनो राज’ का अंत कब होगा?🔥





















