
अजीत मिश्रा (खोजी)
‘सरकारी वेतन’ और ‘विदेशी शान’: क्या ईमानदारी सिर्फ कागजों पर है?
- 16 साल से कुर्सी पर कब्जा, 10 फीसदी कमीशन का खेल: बस्ती पीडब्ल्यूडी में मची लूट।
- ‘बच्चों’ को ‘विदेश’ में पढ़ाना है, तो ‘पट्टू बाबू’ से सीखें धांधली का गुर!
- सरकारी वेतन केवल मुखौटा: करोड़ों की संपत्ति और भाई को ठेका दिलाने का कच्चा-चिट्ठा।
बस्ती के पीडब्ल्यूडी (PWD) विभाग का एक ‘टेंडर बाबू’ आजकल चर्चा का विषय बना हुआ है। सूत्रों द्वारा उजागर तथ्यों के अनुसार, 40 हजार रुपये मासिक वेतन पाने वाले प्रभात कुमार उर्फ ‘पट्टू बाबू’ के तीन बच्चे न्यूजीलैंड जैसे महंगे देश में शिक्षा प्राप्त कर रहे हैं। सवाल यह है कि एक सामान्य कर्मचारी, जो मुश्किल से एक छोटा वाहन खरीद सकता है, वह विदेश में शिक्षा का सालाना 50 लाख रुपये का खर्च कैसे उठा रहा है?बस्ती के पीडब्ल्यूडी (PWD) विभाग का ‘टेंडर बाबू’ प्रभात कुमार उर्फ पट्टू बाबू, आज भ्रष्टाचार की एक ऐसी मिसाल बन चुका है, जिसे देखकर ईमानदारी भी अपना सिर झुका ले। 40 हजार रुपये महीने का वेतन पाने वाले इस बाबू की जीवनशैली और उसके कारनामे किसी बड़े उद्योगपति को भी मात देने वाले हैं। आखिर कैसे एक सरकारी कर्मचारी का वेतन और उसकी विलासिता के बीच का यह विरोधाभास आज सवालों के घेरे में है?
भ्रष्टाचार का ’10 फीसदी’ वाला गणित
पट्टू बाबू पिछले 16 वर्षों से विभाग में टेंडर बाबू के पद पर कुंडली जमाए बैठे हैं। उन पर आरोप है कि वे टेंडर प्रक्रिया में हेराफेरी कर ठेकेदारों से 10 फीसदी नकद कमीशन वसूलते हैं। उनकी करतूतों का दायरा यहीं नहीं रुकता; उन्होंने अपने भाई की फर्म ‘प्रकाश ट्रेडर्स’ को संत कबीरनगर और सिद्धार्थनगर में करोड़ों के ठेके दिलाए। कागजों पर भाई का नाम, लेकिन संचालन खुद पट्टू बाबू करते हैं। इसके अलावा, पत्नी के नाम पर बाजार दर से एक करोड़ रुपये से अधिक की संपत्ति खरीदी गई, जिसका जिक्र सरकारी मानव संपदा पोर्टल पर भी नहीं किया गया।
पट्टू बाबू पिछले 16 वर्षों से विभाग में टेंडर बाबू के पद पर जमे हुए हैं। उनके कारनामों का कच्चा-चिट्ठा कुछ इस प्रकार है:
- वे टेंडर प्रक्रिया में हेराफेरी कर ठेकेदारों से सीधे 10 प्रतिशत नकद कमीशन वसूलते हैं।
- उन्होंने विभाग के नियमों को ताक पर रखकर अपने भाई की फर्म, ‘प्रकाश ट्रेडर्स’, को संत कबीरनगर और सिद्धार्थनगर में करोड़ों के ठेके दिलवाए।
- इन ठेकों में कभी 1.10 प्रतिशत तो कभी 2.20 प्रतिशत जैसे कम बिलों पर टेंडर पास किए गए, जिन्हें परदे के पीछे से पट्टू बाबू ही संचालित करते हैं।
- पत्नी के नाम पर बाजार दर से एक करोड़ रुपये से अधिक की कीमती संपत्ति खरीदी गई है, जिसका उल्लेख सरकारी मानव संपदा पोर्टल पर जानबूझकर नहीं किया गया।
- दशकों का साम्राज्य: पट्टू बाबू पिछले 16 वर्षों से विभाग में टेंडर बाबू के पद पर काबिज हैं, जिन्हें हटाने की हिम्मत बड़े अधिकारियों में भी नहीं थी क्योंकि उन्हें भ्रष्ट नेताओं और ठेकेदारों का संरक्षण प्राप्त था।
- कमीशन का खेल: आरोप है कि पट्टू बाबू टेंडर प्रक्रिया में ‘सेटिंग’ करके ठेकेदारों से 10 फीसदी नकद कमीशन वसूलते थे।
- अपनों की चांदी: विभाग के नियमों को ताक पर रखकर अपने भाई की फर्म को करोड़ों के ठेके दिलाए गए। यही नहीं, कथित तौर पर पत्नी के नाम पर बाजार दर से एक करोड़ रुपये से अधिक की संपत्ति भी खरीदी गई, जिसका उल्लेख मानव संपदा पोर्टल पर नहीं है।
रसूख ऐसा कि ‘तबादला’ भी एक साजिश
पट्टू बाबू की पकड़ का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि विभाग में उनके खिलाफ कोई भी अधिकारी कुछ बोलने की हिम्मत नहीं जुटा पाता था। के अनुसार, जब भी विभाग में किसी ईमानदार अधिकारी (जैसे कि प्रेमचंद्र) ने व्यवस्था को सुधारने या टेंडर प्रक्रिया में पारदर्शिता लाने की कोशिश की, तो उन्हें ही साजिश रचकर निशाना बनाया गया।
साजिश का तरीका बेहद शातिर है:
- जो अधिकारी रास्ते का रोड़ा बनते हैं, उनकी शिकायतें करवाई जाती हैं।
- अपने चहेते ठेकेदारों को फायदा पहुँचाने के लिए टेंडर की शर्तों में जानबूझकर ‘अनावश्यक मशीनरी’ जैसी शर्तें जोड़ी जाती हैं।
- जब कोई जाँच की बात करता है, तो उसे ‘नेताओं का संरक्षण’ दिखाकर खामोश कर दिया जाता है।
साजिश और तंत्र की विफलता
सूत्रों के अनुसार, जब ईमानदारी से काम करने वाले अधिकारियों ने इस तंत्र को तोड़ने की कोशिश की, तो उन्हें ही साजिश का शिकार बनाकर उनका तबादला कर दिया गया। जो लोग शिकायतों की पारदर्शिता की बात करते हैं, वे केवल उन लोगों को निशाना बनाते हैं जो उनके स्वार्थ के रास्ते में आते हैं।
यह मामला केवल एक बाबू का नहीं, बल्कि उस पूरी व्यवस्था का है जहाँ ‘ईमानदार पिता की विरासत’ को उनके ही बच्चों ने भ्रष्टाचार की भेंट चढ़ा दिया है। क्या यह ‘पट्टू बाबू’ और उनसे जुड़े रसूखदारों की संपत्ति की निष्पक्ष जांच का समय नहीं है? जब तक जवाबदेही तय नहीं होगी, तब तक ऐसे ‘पट्टू बाबू’ सरकारी खजाने पर डाका डालते रहेंगे।यह केवल पट्टू बाबू की कहानी नहीं है, बल्कि विभाग में व्याप्त उस सड़न की कहानी है जहाँ ‘ईमानदारी’ एक गुनाह बन चुकी है। पट्टू बाबू के खिलाफ कोई ठोस कार्रवाई न होना और उनके संरक्षण में जमे हुए अन्य भ्रष्ट अधिकारियों का 30 सालों से एक ही जगह टिके रहना, शासन की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े करता है।
पट्टू बाबू जैसे लोग, जो सरकारी खजाने को अपना निजी कोष समझते हैं, विभाग की छवि को धूमिल कर रहे हैं। अब प्रश्न यह है कि क्या प्रशासन इन साक्ष्यों पर संज्ञान लेते हुए उनके और उनके संरक्षकों के खिलाफ कोई कार्रवाई करेगा, या यह मामला भी पिछली शिकायतों की तरह रफा-दफा कर दिया जाएगा?






















