
अजीत मिश्रा (खोजी)
वन विभाग में भ्रष्टाचार का नंगा नाच: क्या ‘मैडम’ और उनकी टीम ने सरकारी खजाने को अपना निजी कोष समझ रखा है?
- बस्ती में भ्रष्टाचार का नंगा नाच: महिला अधिकारियों पर लगा लाखों के गबन का दाग
- मैडम ने तो लूटने की ‘फूलप्रूफ’ योजना बनाई: एक व्यक्ति के नाम पर सात-सात फर्जी बिल का खुलासा
- एमएलसी प्रतिनिधि की सक्रियता से खुला वन विभाग का बड़ा घोटाला: ‘दिशा’ की बैठक में मचा हड़कंप
- क्या ‘मैडम’ का परिवार हराम की कमाई से करेगा गुजारा? वन विभाग के घोटालों पर उठे तीखे सवाल
बस्ती: सरकारी तंत्र में भ्रष्टाचार की जड़ें कितनी गहरी हो चुकी हैं, इसका एक वीभत्स चेहरा बस्ती वन विभाग से सामने आया है। डीएफओ डॉ. सीरीन सिद्दीकी, एसडीओ देवेंद्र प्रताप सिंह और रेंजर सोनल वर्मा के नेतृत्व में जो ‘भ्रष्टाचार का रैकेट’ चला, उसने न केवल विभाग की मर्यादा को तार-तार किया है, बल्कि मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की ‘जीरो टॉलरेंस’ नीति पर भी सीधा प्रहार किया है।बस्ती जिले के वन विभाग में कथित रूप से हुए एक बड़े घोटाले ने पूरे प्रशासनिक तंत्र को हिलाकर रख दिया है। डीएफओ डॉ. सीरीन सिद्दीकी, एसडीओ देवेंद्र प्रताप सिंह और महिला रेंजर सोनल वर्मा पर सरकारी धन के बड़े पैमाने पर बंदरबांट का आरोप है।
’फूलप्रूफ’ लूट की कहानी
मामले का खुलासा तब हुआ जब एमएलसी प्रतिनिधि हरीश सिंह ने ‘दिशा’ की बैठक में इस मुद्दे को प्रमुखता से उठाया। जांच में सामने आया कि इन अधिकारियों ने रेंजर क्लर्क की मिलीभगत से रामनगर रेंज में लगभग 50 लाख रुपये से अधिक का घोटाला किया है। इस पूरे मामले का खुलासा तब हुआ जब एमएलसी प्रतिनिधि हरीश सिंह ने ‘दिशा’ की बैठक में वन विभाग में हो रहे संगठित भ्रष्टाचार का मुद्दा उठाया। यदि हरीश सिंह ने इस मामले को उजागर नहीं किया होता, तो शायद यह घोटाला कभी सामने नहीं आ पाता।
घोटाले का तरीका बेहद शातिर था:
- फर्जी बिलों का खेल: जिन लोगों के नाम पर पौधे लगाए गए, उनकी सुरक्षा, मिट्टी पाटन और लोडिंग-अनलोडिंग के नाम पर फर्जी बिल बनाए गए, जबकि इन कार्यों के लिए कोई बजट ही नहीं था।
- एक व्यक्ति, सात-सात बिल: एक-एक व्यक्ति के नाम पर सात-सात फर्जी बिल बनाकर सरकारी धन का बंदरबांट किया गया। उदाहरण के तौर पर, दिव्यांशु यादव, रामसुब्बा और देवेंद्र कुमार जैसे लोगों के नाम का इस्तेमाल कर लाखों रुपये निकाले गए।
- साक्ष्य मिटाने की कोशिश: जब कथित रेंजर क्लर्क के भ्रष्टाचार का विरोध हुआ, तो उसे बचाने के लिए उसका तबादला रामनगर से मुख्यालय कर दिया गया, लेकिन वह अभी भी पहले की तरह ही काम कर रहा है।
- लाखों का गबन: केवल सात बिलों के माध्यम से ही 50 लाख रुपये से अधिक की रकम हड़पने की साजिश रची गई।
- वित्तीय अनियमितता: जांच में पाया गया कि कई वित्तीय स्वीकृतियों के तहत बड़ी रकम निकाली गई, जिसमें 983/25-26 के तहत 200492 रुपये, 983/25-26 के तहत ही 100056 रुपये और 1103/25-26 के तहत 300035 रुपये जैसी भारी राशियां शामिल थीं।
नैतिकता पर सवाल
सबसे शर्मनाक बात यह है कि एक तरफ इन महिला अधिकारियों की ईमानदारी का बखान किया जाता है, वहीं दूसरी तरफ ये अधिकारी सरकारी धन की लूट में लिप्त हैं। क्या इनका परिवार इस ‘हराम की कमाई’ से अपना पेट भरेगा?
साक्ष्य मिटाने और बचाने की कोशिश
जब कथित रेंजर क्लर्क के भ्रष्टाचार और फर्जी बिलों का विरोध हुआ, तो विभागीय अधिकारियों ने उसे बचाने का प्रयास किया। उसे बर्खास्त करने के बजाय, उसका तबादला रामनगर रेंज से मुख्यालय कर दिया गया, लेकिन वह अभी भी रामनगर में पहले की तरह ही काम कर रहा है। इसके अतिरिक्त, यह भी आरोप है कि इन लोगों ने करीब 5 प्रतिशत कमीशन लेकर सारा पैसा आपस में बांट लिया।
प्रशासन पर सवाल और कार्रवाई की मांग
इस मामले ने मुख्यमंत्री की ‘जीरो टॉलरेंस’ नीति पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। भाकियू भानू गुट के मंडल प्रवक्ता चंद्रेश प्रताप सिंह ने इस पूरे मामले की कड़ी निंदा की है:
- उन्होंने प्रमुख सचिव (वन), सतर्कता अधिष्ठान और बस्ती के डीएम को साक्ष्य के साथ पत्र भेजकर डीएफओ, एसडीओ और रेंजर को तत्काल निलंबित करने की मांग की है।
- उन्होंने मांग की है कि इन अधिकारियों की चल-अचल संपत्ति को जब्त कर रिकवरी की जानी चाहिए।
- चेतावनी दी गई है कि यदि 15 दिनों के भीतर ठोस कार्रवाई नहीं हुई, तो मामला माननीय उच्च न्यायालय और लोकायुक्त में ले जाया जाएगा।
प्रशासन के लिए चुनौती
भाकियू भानू गुट के मंडल प्रवक्ता चंद्रेश प्रताप सिंह ने इस मामले की गंभीरता को देखते हुए प्रमुख सचिव (वन) और सतर्कता अधिष्ठान से तत्काल कार्रवाई की मांग की है। यदि 15 दिनों के भीतर इन अधिकारियों को निलंबित कर उनकी चल-अचल संपत्ति जब्त नहीं की गई, तो मामला उच्च न्यायालय और लोकायुक्त तक ले जाया जाएगा।
सवाल यह भी उठता है कि जब रामनगर के प्रमुख को इस भ्रष्टाचार की जानकारी थी, तो वे अब तक खामोश क्यों रहे? क्या भ्रष्टाचार के इस खेल में विभाग के उच्च अधिकारी भी हिस्सेदार हैं? बस्ती की जनता जवाब मांग रही है।

















