
अजीत मिश्रा (खोजी)
प्रशासनिक विफलता या वर्दी का खौफ खत्म? अमहट चौकी बनी ‘अखाड़ा’
- अमहट चौकी बनी अखाड़ा: पुलिस के सामने ही हुई जमकर मारपीट
- बस्ती पुलिस की नाकामी: चौकी के बाहर चला ‘तांडव’, खामोश रही खाकी
- चौकी के दरवाजे पर दबंगों का ‘दंगल’, पुलिस बनी रही मूकदर्शक
बस्ती: जनपद की कानून-व्यवस्था का क्या हाल है, इसकी बानगी सोमवार को शहर के बीचों-बीच स्थित कोतवाली थाने की अमहट पुलिस चौकी पर देखने को मिली। जब वर्दीधारियों की नाक के नीचे दो गुटों ने जमकर लात-घूंसे बरसाए और पुलिस मूकदर्शक बनी तमाशा देखती रही। चौकी के मुख्य द्वार पर हुई इस शर्मनाक घटना ने न केवल पुलिस की कार्यप्रणाली पर सवाल खड़े कर दिए हैं, बल्कि यह भी स्पष्ट कर दिया है कि आम जनता के बीच अब खाकी का खौफ खत्म हो चुका है।
वर्दी के सामने दबंगई, कहाँ था पुलिस का ‘डंडा’?
सूत्रों के अनुसार, मामला मामूली विवाद से शुरू हुआ था, लेकिन जब बात चौकी तक पहुँची तो ऐसा लगा कि यह पुलिस का दफ्तर नहीं, बल्कि कोई अखाड़ा हो। हैरानी की बात यह है कि जब दो पक्ष एक-दूसरे पर पिल पड़े थे, तब वहां मौजूद पुलिसकर्मी कानून का पाठ पढ़ाने के बजाय तमाशबीन बने रहे। वर्दीधारियों की इस निष्क्रियता ने कई गंभीर प्रश्न खड़े कर दिए हैं:
- क्या चौकी इंचार्ज का नियंत्रण खत्म हो चुका है? चौकी के दरवाजे पर हुई यह गुंडागर्दी साबित करती है कि अपराधियों में पुलिस का तनिक भी डर नहीं बचा है।
- मूकदर्शक क्यों बनी पुलिस? क्या पुलिस प्रशासन किसी दबाव में है, या फिर अपराधियों के आगे उन्होंने पहले ही घुटने टेक दिए हैं?
- सुरक्षा का दावा खोखला: जब पुलिस अपनी ही चौकी को सुरक्षित नहीं रख पा रही है, तो आम नागरिक की सुरक्षा की गारंटी कौन लेगा?
कानून का मजाक, प्रशासन मौन
अमहट चौकी पर हुई इस घटना ने बस्ती पुलिस की कार्यशैली को कटघरे में खड़ा कर दिया है। चौकी इंचार्ज की कार्यक्षमता पर सवाल उठना लाजिमी है। यदि पुलिस चौकी के सामने खुलेआम कानून की धज्जियां उड़ाई जाएंगी, तो अपराधी बेखौफ होकर वारदातों को अंजाम देंगे ही।
यह घटना मात्र एक लड़ाई नहीं, बल्कि पुलिस तंत्र की विफलता का प्रतीक है। क्या उच्चाधिकारी इस घटना पर संज्ञान लेंगे, या फिर चौकी इंचार्ज को बचाकर मामले को ठंडे बस्ते में डाल दिया जाएगा? जनता को जवाब और कार्रवाई का इंतजार है।



















