
14 ‘लाख’ भी लिया, ‘विरोध’ भी कर रहे: बस्ती की राजनीति में कैसा है ये दोहरा खेल?
संजय चौधरी के 'भ्रष्टाचार के सैनिक': क्या विकास के नाम पर हो रही है वसूली? मानचित्र पास करने के बदले 14 लाख डकारे, अब फैक्ट्री विरोध का ढोंग क्यों?
14 ‘लाख’ भी लिया, ‘विरोध’ भी कर रहे!
- बस्ती में दोमुंही राजनीति: कभी ठेकेदारों का शोषण, तो कभी विकास का दिखावटी विरोध!
- क्या 2027 में संजय चौधरी का विधायक बनने का सपना रह जाएगा अधूरा?
बस्ती। मीडिया, जिला पंचायत अध्यक्ष संजय चौधरी को याद दिलाना चाहती है, कि जब आपने एथेनॉल बनाने वाली कंपनी से मानचित्र स्वीकृति करवाई 14 लाख विकास शुल्क के रुप में ले लिया तो क्यों आप फैक्ट्री लगने का विरोध कर रहे हैं? कम से कम इस मामले में तो ईमानदारी दिखाए होते।राजनीति में विरोधाभास और अवसरवाद की पराकाष्ठा देखनी हो, तो बस्ती के जिला पंचायत अध्यक्ष संजय चौधरी के हालिया कारनामों पर गौर कीजिए। जिस फैक्ट्री के मानचित्र को खुद अध्यक्ष जी ने अपनी सहमति से पास किया, आज उसी के विरोध में वे सड़कों पर उतरे हैं। यह ‘विरोध’ है या वसूली का दबाव, यह सवाल अब जनता के बीच चर्चा का विषय बन गया है।
प्रमुख मुद्दे और आरोप
- दोहरा मापदंड: लेख में आरोप लगाया गया है कि जिला पंचायत अध्यक्ष संजय चौधरी ने एथेनॉल बनाने वाली कंपनी से मानचित्र स्वीकृति के एवज में 14 लाख रुपये का विकास शुल्क लिया है। अब वही संजय चौधरी उसी फैक्ट्री के निर्माण का विरोध कर रहे हैं, जो उनकी कथनी और करनी में विरोधाभास को दर्शाता है।
- मानचित्र स्वीकृति पर सवाल: लेख के अनुसार, फैक्ट्री का मानचित्र स्वयं जिला पंचायत अध्यक्ष की सहमति से स्वीकृत हुआ था, फिर भी अब वे इसका विरोध कर रहे हैं। इससे विरोध करने वालों की मंशा पर सवाल उठ रहे हैं।
- ठेकेदारों के साथ विवाद: लेख में दावा किया गया है कि संजय चौधरी ने एक भाजपा नेता को कार्यालय के नवीनीकरण का ठेका दिया था, लेकिन भुगतान के समय टालमटोल की। नेताजी ने उधारी लेकर नौ लाख का काम किया, लेकिन उन्हें बहुत कम भुगतान मिला और अब उनका फोन भी नहीं उठाया जा रहा है।
- राजनीतिक भविष्य पर संशय: लेख में चेतावनी दी गई है कि यदि 2027 के चुनावों में भाजपा ने उन्हें झटका दिया, तो उनका विधायक बनने का सपना अधूरा रह सकता है।
मानचित्र स्वीकृति और विरोध का विरोधाभास
जो लोग संजय चौधरी की अगुवाई में फैक्ट्री लगने का विरोध कर रहे हैं, उनमें शायद ही किसी को यह मालूम होगा, कि फैक्ट्री का मानचित्र खुद जिला पंचायत अध्यक्ष की सहमति से स्वीकृति हुआ, और इसके लिए कंपनी ने 14 लाख का भुगतान किया। यह वह भुगतान है जिसकी रसीद दी गई, उस भुगतान के बारे में पता नहीं चला, जो बीडीए की तर्ज पर कार्यालय वाले अतिरिक्त के रुप में लेते हैं। अगर इसका विरोध कोई और करता तो बात समझ में आती, लेकिन वह व्यक्ति कर रहा है, जिसकी सहमति से मानचित्र स्वीकृति हुआ। जिला पंचायत खुद फैक्ट्री लगाने का परमिशन देता है, और इसके अध्यक्ष विरोध करते हैं, इसे आप क्या कहेंगे और क्या समझेंगे?
इसी लिए, विरोध का उतना समर्थन नहीं मिल रहा है, जितना मिलना चाहिए, क्योंकि सभी को मालूम है, कि इस विरोध के पीछे विरोध करने वालों की क्या मंशा छिपी हुई है? इसे लेकर तो खुद संजय चौधरी सवालों के कटघरे में हैं।
मंशा पर उठते सवाल
जिस तरह विरोध करने के बारे में सोशल मीडिया पर कमेंट किए जा रहे हैं, उससे विरोध करने वालों की मंशा का पता चलता है। सभी को मालूम है, कि फैक्ट्री का निर्माण बंद नहीं हो सकता, फिर भी कुछ नेता फैक्ट्री के चालू होने का विरोध कर रहे हैं। अगर संजय चौधरी का विरोध इतना ही जायज होता तो अब तक इस विरोध में न जाने कितने भाजपाई शामिल हो गए होते, और फैक्ट्री शायद बंद भी हो गई होती। जिस नेता को अपने ही पार्टी का समर्थन न मिले, समझ लेना चाहिए, कि विरोध गलत है।आरोप है कि संजय चौधरी ने एथेनॉल बनाने वाली कंपनी से मानचित्र स्वीकृति के नाम पर 14 लाख रुपये का ‘विकास शुल्क’ वसूला था। जब पैसा ले लिया गया और रसीद भी कट गई, तो अब फैक्ट्री के निर्माण का विरोध किस आधार पर हो रहा है? यह दोहरा चरित्र न केवल उनकी ईमानदारी पर सवाल उठाता है, बल्कि यह भी संकेत देता है कि इस विरोध के पीछे कोई छिपा हुआ एजेंडा है।
फिर सवाल उठ रहा है, कि जब यह फैक्ट्री जिला पंचायत अध्यक्ष के गांव के करीब लग रही है, तो क्यों नहीं अब तक विरोध किया? अब क्यों कर रहे हैं, जब फैक्ट्री बनकर तैयार हो गई? क्यों इन्होंने फैक्ट्री का मानचित्र स्वीकृति होने दिया? यही कारण रहा है, कि पिछले पांच साल में संजय चौधरी, ठेकेदार शिवकुमार चौधरी को छोड़कर किसी अन्य का विश्वास नहीं जीत पाए हैं।
ठेकेदारों के साथ धोखाधड़ी का आरोप
एक भाजपा नेता हैं, जो भ्रष्टाचार के खिलाफ धरने पर भी बैठ चुके हैं, आज वह साढ़े छह लाख पाने के लिए पिछले पांच साल से संजय चौधरी से सिफारिश कर रहे हैं। नेताजी का दिल जीतने के लिए शुरुआत के दौर में संजय चौधरी ने इन्हें कार्यालय के नवीनीकरण करने का ठेका दिया। चूंकि नेताजी का तो कोई पंजीकरण था नहीं, इस लिए इनसे कहा गया कि शिवकुमार चौधरी के फर्म पर काम करिए।
अध्यक्ष महोदय पर ‘भ्रष्टाचार के सैनिक’ की संज्ञा के साथ गंभीर आरोप लगाए गए हैं। मामला केवल फैक्ट्री तक सीमित नहीं है, बल्कि उनके साथ काम करने वाले ठेकेदारों की व्यथा भी सामने आई है।
- एक भाजपा नेता का आरोप है कि उन्होंने अध्यक्ष के कार्यालय के नवीनीकरण के लिए करीब नौ लाख रुपये का काम किया, लेकिन बदले में उन्हें केवल कुछ हजार रुपये थमाए गए और अब उनका फोन तक उठाना बंद कर दिया गया है।
- इतना ही नहीं, अध्यक्ष जी ने ठेकेदार का पंजीकरण न होने का बहाना बनाकर उन्हें किसी अन्य के फर्म पर काम करने को मजबूर किया, जो स्वयं में प्रशासनिक अनियमितता की ओर इशारा करता है।
नेताजी ने किसी तरह उधार करके लगभग नौ लाख का काम किया, जब भुगतान करने की बारी आई तो पता चला कि ठेकेदार ने तो सारा भुगतान ले लिया, लेकिन नेताजी को एक रुपया भी नहीं दिया। जब अधिक दबाव पड़ा तो शायद टुकड़ों में लगभग ढाई लाख का भुगतान कर दिया, शेष साढ़े छह लाख का भुगतान आज तक नहीं किया। कभी चुनाव का बहाना बनाया, तो कभी होटल को गिरवी से छुड़ाने का बहाना बनाया, लेकिन भुगतान आज तक नहीं किया, अब तो नेताजी का फोन उठाना ही बंद कर दिया।
सोशल मीडिया का ट्रोल और राजनीतिक भविष्य
हाल ही में नेताजी ने सोशल मीडिया के जरिए अपना दर्द बयां किया था, जिसे लेकर लोगों ने संजय चौधरी को खूब ट्रोल किया। बहरहाल, नेताजी जैसे न जाने कितने और नेता और ठेकेदार होंगे, जो न रो पा रहे होंगे, और न हंस ही पा रहे होंगे, क्योंकि दोनों में उन्हीं की बदनामी है।
बहरहाल, इन चार दिनों में संजय चौधरी चाहें जो कर लें, कार्यालय का उद्घाटन करवा लें, त्रिपाठी सिनेमा रोड की दुकानों से पैसा कमा लें, फिर उसके बाद शायद इन्हें कुछ करने को मौका न मिले। और अगर कहीं इन्हें भाजपा वालों ने 2027 में झटका दे दिया तो इनका विधायक बनने का सपना अधूरा रह जाएगा।सोशल मीडिया पर लोग संजय चौधरी के इन दांव-पेच को बखूबी समझ रहे हैं। जनता पूछ रही है कि यदि फैक्ट्री का विरोध इतना ही जायज था, तो मानचित्र स्वीकृति के समय चुप्पी क्यों साधी गई?। राजनीतिक गलियारों में चर्चा है कि यदि 2027 में भाजपा ने उन्हें किनारे किया, तो उनका विधायक बनने का सपना इस तरह के कारनामों के कारण धूल धूसरित हो सकता है।

















