

गांव आला के दो-चार दिन बढ़िया टाइम पास हो जाहि, सब टुकड़े संभाल कर रखना भाइयों – जब भी देखोगे, खुशी मिलेगी!
✍️ रिपोर्ट: एलिक सिंह
संपादक – वंदे भारत लाइव टीवी न्यूज़
जिला प्रभारी – भारतीय पत्रकार अधिकार परिषद
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सहारनपुर/ग्राम संवाद –
गांव की मिट्टी, वहां की बोली, और अपनों की संगत – ये तीन चीजें जब मिलती हैं, तो शहर की सारी भागदौड़, सारी थकान छू-मंतर हो जाती है। ऐसा ही माहौल बीते कुछ दिनों से पश्चिमी उत्तर प्रदेश के गांव ‘गाम आला’ में देखने को मिला, जब शहरों में रहने वाले कई युवक छुट्टियों में वापस गांव पहुंचे।
गांव की चौपाल, शाम को खेतों की पगडंडियों पर हँसी-ठिठोली, और रात को चारपाई पर बैठकर चलती गप्पें – ये सब पल कैमरों में कैद होते रहे। एक युवक ने तो भावुक होते हुए कहा –
“गाम आला के दो चार दिन बढ़िया टाइम पास हो जाहि, सब टुकड़े संभाल कर रखना भाइयों… जब भी देखोगे, खुशी मिलेगी।”
यह वाक्य अब गांव में युवाओं के बीच एक लोकप्रिय जुमला बन गया है, जो उनकी भावनाओं को पूरी तरह व्यक्त करता है।
गांव के बुजुर्गों ने भी इस मिलन पर खुशी जताई। रामसिंह पहलवान (65) बोले, “आजकल के बच्चे तो शहरों में खो गए हैं। पर जब ये लौटते हैं, तो गांव का आंगन फिर से खिल उठता है।”
गांव में लौटे युवाओं ने कुछ पुराने स्कूल दोस्तों के साथ क्रिकेट मैच रखा, नहर पर नहाना हुआ, और रात को दादी-नानी की कहानियों के साथ रोटियाँ टूटीं। हर पल एक याद बन गया।
इस पूरे दौर में मोबाइल कैमरे सबसे सक्रिय रहे – कभी किसी ने सेल्फी ली, तो किसी ने ग्रुप वीडियो बनाया। एक व्हाट्सऐप ग्रुप बना – “गाम आला के टुकड़े”, जिसमें इन पलों को सहेज कर रखा जा रहा है।
कहने को तो ये दो-चार दिन थे, पर दिलों में आजीवन बस जाने वाली यादें बन गए।
गांव की यही मिट्टी है जो शहरों में रहते हुए भी हमारी जड़ों को नहीं टूटने देती।





