
वंदे भारत लाइव टीवी — विशेष विस्तृत रिपोर्ट
नैनीताल, 10 सितंबर 2025 — उत्तराखंड के इतिहास का अब तक का सबसे बड़ा वित्तीय घोटाला माने जा रहे एलयूसीसी चिटफंड स्कैम ने एक बार फिर सुर्खियाँ बटोरी हैं। नैनीताल उच्च न्यायालय ने इस मामले में दायर याचिका को पहले से विचाराधीन जनहित याचिका (PIL) के साथ जोड़ दिया है। अदालत ने साफ कर दिया है कि इस घोटाले की सीबीआई जांच कराना ज़रूरी है, क्योंकि मामला कई राज्यों और हजारों निवेशकों से जुड़ा है।

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घोटाले की शुरुआत और जाल
कंपनी का आगमन (2021): एलयूसीसी कंपनी ने देहरादून, ऋषिकेश और पौड़ी समेत कई जिलों में अपने कार्यालय खोले।
एजेंट नेटवर्क: स्थानीय युवाओं और महिलाओं को एजेंट बनाया गया। उन्हें बताया गया कि यदि वे अपने रिश्तेदारों और परिचितों को निवेश कराने के लिए प्रेरित करेंगे तो उन्हें मोटा कमीशन मिलेगा।
निवेशकों को लालच: ऊँचे ब्याज, बीमा जैसी सुविधाएँ और भविष्य में बड़े मुनाफे का झांसा दिया गया।
कानूनी स्थिति: कंपनी ने न तो सोसायटी रजिस्ट्रेशन कराया और न ही वित्तीय नियामक एजेंसियों से अनुमति ली।
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घोटाले का खुलासा
2023–24: अचानक कंपनी ने सभी दफ्तर बंद कर दिए।
मुख्य आरोपी: कंपनी का सीएमडी और अन्य अधिकारी दुबई भाग गए।
निवेशकों की मुश्किलें: लाखों की जमा पूंजी डूब गई। पीड़ित एजेंटों पर दबाव डालने लगे।
एफआईआर: उत्तराखंड सहित विभिन्न राज्यों में अब तक 56 मुकदमे दर्ज हो चुके हैं।
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अदालत की कार्यवाही
पीड़ितों ने नैनीताल हाईकोर्ट में याचिका दायर की, जिसमें कहा गया कि राज्य सरकार और पुलिस इतनी बड़ी ठगी की निष्पक्ष जांच करने में सक्षम नहीं है।
अदालत ने सीबीआई से राय मांगी।
सीबीआई के वकील ने कोर्ट में कहा कि एजेंसी को इस मामले पर निर्देश प्राप्त हो चुके हैं।
न्यायमूर्ति पंकज पुरोहित की एकलपीठ ने इस याचिका को पहले से विचाराधीन जनहित याचिका से जोड़ते हुए खंडपीठ को सुनवाई के लिए भेज दिया।
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सरकार और जांच एजेंसियों की स्थिति
राज्य सरकार: पहले ही इस घोटाले की सीबीआई जांच की सिफारिश कर चुकी है।
पुलिस: राज्य पुलिस ने कई केस दर्ज किए हैं, लेकिन अंतरराज्यीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर की वजह से जांच मुश्किल हो रही है।
सीबीआई: अब खंडपीठ के आदेश के बाद औपचारिक रूप से जांच अपने हाथ में ले सकती है।
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पीड़ितों की व्यथा
कई परिवारों की जीवनभर की पूँजी डूब गई है।
लोग बैंक लोन चुकाने में असमर्थ हैं।
जिन एजेंटों ने निवेश करवाया, वे खुद भी ठगी का शिकार बने और अब सामाजिक दबाव झेल रहे हैं।
निवेशक सवाल उठा रहे हैं कि आखिर बिना पंजीकरण के इतनी बड़ी कंपनी ने राज्य में कैसे कारोबार कर लिया।
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आगे का रास्ता
खंडपीठ की सुनवाई अब निर्णायक होगी।
सीबीआई जांच शुरू होने पर अंतरराष्ट्रीय स्तर पर आरोपियों की गिरफ्तारी के लिए इंटरपोल का सहारा लिया जा सकता है।
आरोपियों की संपत्ति की कुर्की और निवेशकों को मुआवजा दिलाने की प्रक्रिया शुरू हो सकती है, लेकिन इसमें समय लगने की संभावना है।
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निष्कर्ष
एलयूसीसी घोटाला केवल एक वित्तीय धोखाधड़ी नहीं है, बल्कि यह प्रशासनिक लापरवाही और निगरानी तंत्र की कमी का बड़ा उदाहरण है। हजारों निवेशक आज भी न्याय और अपनी मेहनत की कमाई वापस पाने की उम्मीद लगाए बैठे हैं। नैनीताल हाईकोर्ट का सीबीआई जांच की ओर झुकाव इस मामले में एक नया मोड़ है। अब देखना यह है कि क्या एजेंसी आरोपियों को पकड़कर पीड़ितों को न्याय दिला पाएगी या यह मामला भी वर्षों तक अदालतों और फाइलों में अटका रहेगा।
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👉 वंदे भारत लाइव की खास रिपोर्ट: यह मामला केवल एक आर्थिक घोटाला नहीं बल्कि निगरानी तंत्र की बड़ी चूक है। अब देखना होगा कि सीबीआई जांच से पीड़ितों को कब और कैसे राहत मिलती है।
📺 वंदे भारत लाइव इस घोटाले की हर सुनवाई और हर अपडेट पर नजर रखे हुए है।




