
*धनबाद :* कुसुम विहार निवासी दिवंगत ड्राइवर राजेंद्र साहनी की पत्नी सरिता देवी अपने पति के शव के साथ तीन दिनों से बीसीसीएल के लोदना क्षेत्रीय कार्यालय के गेट पर धरने पर बैठी हैं। उनके साथ बेटी निशा, बेटे अंकित और छोटी बेटी अमृता भी मौजूद हैं।
परिवार का आरोप है कि राजेंद्र की मौत ड्यूटी के दौरान तबीयत बिगड़ने से हुई, लेकिन प्रबंधन ने न तो मदद की और न ही समय पर अस्पताल पहुंचाने की जहमत उठाई।
*तबीयत बिगड़ने पर भी नहीं दी गई छुट्टी*
राजेंद्र साहनी बीसीसीएल लोदना एरिया 10 के एजीएम एसके सिन्हा के निजी ड्राइवर थे। आरोप है कि 23 अक्टूबर की सुबह रोज की तरह राजेंद्र साहनी काम पर गए थे। जहां उनकी अचानक तबीयत बिगड़ी गई। उसने छुट्टी की मांग पर उसे प्रबंधक की ओर से छुट्टी नहीं दी गई । इस दौर उनकी तबीयत और बिगड़ गई। इसे देख प्रबंधक उसे पहले एक निजी अस्पताल भिजवाया जहां डॉक्टरों ने क्रिटिकल कंडीशन बताते हुए धनबाद के केंद्रीय अस्पताल रेफर किया गया। लेकिन जबतक राजेंद्र को केंद्रीय अस्पताल ले जाया जाता रास्ते में ही उसकी मौत हो गई।
*परिवार ने मुआवजा और आश्रित को नौकरी देने की मांग*
दोपहर में परिवार को सूचना मिली कि उनकी तबीयत अचानक बिगड़ गई है। पहले एक निजी अस्पताल और फिर सेंट्रल अस्पताल ले जाया गया, लेकिन तब तक देर हो चुकी थी। इस दौरान परिवार को यह जानकारी भी नहीं दी गई कि उन्हें कहां ले जाया जा रहा है। पत्नी सरिता देवी का कहना है कि उनके पति सालों से बीसीसीएल अधिकारियों की सेवा में लगे थे। ड्यूटी पर रहते ही उनकी जान चली गई, लेकिन अब कोई उनकी सुध नहीं ले रहा। परिवार ने मुआवजा, एक आश्रित को नौकरी और मामले की उच्चस्तरीय जांच की मांग की है।
बीसीसीएल सूत्रों के अनुसार, कोल इंडिया प्रबंधन के हालिया निर्देशों के तहत कार्यस्थल पर हुई मृत्यु के मामलों में आश्रितों को न्यूनतम 25 लाख रुपए की अनुग्रह राशि और एक सदस्य को रोजगार देने का प्रावधान है। हाल ही में झारखंड हाईकोर्ट ने भी कहा है कि मृतक कर्मचारी की पत्नी मृत्यु की तिथि से ही मुआवजे की हकदार होती है, भले ही उसने आवेदन न दिया हो। परिजनों का कहना है कि जब तक उन्हें न्याय नहीं मिलता, वे धरना स्थल नहीं छोड़ेंगे। अब देखना होगा कि बीसीसीएल प्रबंधन और जिला प्रशासन इस परिवार की त्रासदी के प्रति कब संवेदनशील रवैया अपनाते हैं।












