

🔴 निठारी कांड: 18 साल बाद ‘काली कोठी’ के दरिंदे आज़ाद! 50 मासूमों की चीखें किसके जिम्मे? पीड़ित परिवारों का फूटा दर्द—“न्याय का गला घोंटा गया”
नोएडा। निठारी कांड—एक ऐसा नाम जो आज भी सुनकर रूह कांप उठती है। देश के सबसे सनसनीखेज और निर्मम अपराधों में गिने जाने वाले इस मामले के 18 साल बाद भी पीड़ित परिवारों के दिल से दर्द कम नहीं हुआ था कि अब कोर्ट के फैसलों ने उनके जख्मों को और गहरा कर दिया है। कभी डी-5, निठारी की जिस कुख्यात कोठी को लोग ‘काली कोठी’ कहते थे, उसके भीतर 50 से अधिक बच्चों के कंकाल मिले थे। इन बच्चों में 15 से 22 वर्ष की आयु के लड़के-लड़कियां शामिल थे, जिनके साथ पहले दुष्कर्म किया गया, फिर बेरहमी से हत्या कर शवों को काटकर उनके अंगों की तस्करी तक की गई। कई पीड़ित परिवार आज भी यह कहते नहीं थकते कि “सिर्फ तस्करी ही नहीं, उनके अंग खाए तक गए।”
इन मासूमों में अधिकतर वे बच्चे थे, जिनके माता-पिता गरीब थे—कोई दिहाड़ी मजदूर, कोई सब्ज़ी बेचने वाला, कोई बर्तन धोकर पेट पालने वाला। इन परिवारों के लिए बच्चे ही उनकी दुनिया थे, लेकिन वह दुनिया मनिंदर सिंह पंढेर की कोठी की कालिख में समा गई। जांच एजेंसियों के अनुसार, इस नरसंहार के पीछे मनिंदर सिंह पंढेर और उसका नौकर सुरेंद्र कोली मुख्य आरोपी पाए गए। दोनों पर ही पुलिस और CBI की जांच में ऐसे गुनाह सामने आए थे जिन्हें बयान करना भी मुश्किल है—बच्चों को बहला-फुसलाकर बुलाना, उनके साथ दुष्कर्म करना, हत्या करना, शवों को काटना और अवशेष छुपा देना। अदालतों ने भी कई मामलों में इन दोनों को दोषी माना और मौत की सजा तक सुनाई थी।
लेकिन अब सबसे बड़ा सवाल यह है कि ऐसे घिनौने अपराधों के बावजूद 18 साल बाद दोनों कैसे आज़ाद हो रहे हैं? सुप्रीम कोर्ट ने सबूतों के अभाव का हवाला देते हुए पहले मनिंदर सिंह पंढेर को रिहा किया, जिसके बाद देशभर में सवाल उठे। और अब, सुरेंद्र कोली को भी जमानत दे दी गई है, जिसके बाद वह जेल से बाहर आ चुका है। कोर्ट का कहना है—“बिना पर्याप्त सबूत किसी को सजा नहीं दी जा सकती। न्याय सबको मिलना चाहिए।” मगर पीड़ित परिवार पूछ रहे हैं—“हमारे बच्चों का न्याय कहाँ है? उनकी चीखों, उनके दर्द, उनकी मौतों और उन कंकालों का क्या?”
निठारी के उस काले अध्याय को याद करते हुए पीड़ित आज भी टूट जाते हैं। 2006 में जब नालियों, गड्ढों और कूड़े के ढेर से बच्चों के कंकाल और कटे हुए अंग बरामद हुए थे, तब पूरा देश सन्न रह गया था। लोगों ने उस ‘काली कोठी’ के बाहर मोमबत्तियाँ जलाई थीं, गुस्से में सड़कें जाम कर दी थीं, और अपराधियों को कड़ी सजा देने की मांग की थी। जांच आगे बढ़ी, अदालतों ने सजा सुनाई, और देश को लगा कि शायद न्याय हुआ। लेकिन अब जब दोनों आरोपी बाहर हैं, तब पीड़ित परिवारों को लगता है कि उनके बच्चों की मौत को भुला दिया गया है।
आज भी निठारी की गलियों में उन परिवारों की सिसकियाँ सुनी जा सकती हैं। कई परिवार तो गरीबी और सदमे के बोझ तले खुद भी खत्म हो गए। कुछ अब भी उस दिन का इंतजार कर रहे हैं जब उन्हें अपने बच्चों के लिए सच्चा न्याय मिलेगा। वे कहते हैं—“हम गरीब थे इसलिए आवाज दब गई। अगर अमीरों के बच्चे होते, तो क्या यही फैसला आता?” उनके चेहरे पर गुस्सा भी है, दर्द भी, और साथ ही बहुत बड़ा सवाल—क्या कानून उन मासूमों की चीखों को नजरअंदाज कर रहा है?
“काली कोठी” आज भी खड़ी है—सिल हुई दीवारों, सूखे खून के दागों और दफन रहस्यों के साथ। लेकिन पीड़ित परिवार यह कहते हैं—“काली कोठी नहीं, अब हमारी किस्मत और न्याय व्यवस्था काली दिख रही है।”
निठारी कांड की ये गूंज आज फिर देश भर में सुनाई दे रही है और लोग पूछ रहे हैं—क्या 50 मासूम बच्चों की मौतें सिर्फ कागजों में कैद होकर रह जाएंगी?
✍️ रिपोर्ट — ALICK SINGH, EDITOR – VANDE BHARAT LIVE TV NEWS
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