चुनावों का बाज़ार और मतदाता की मानसिकता। लोकतंत्र की आत्मा पर मंडराता सबसे बड़ा संकट।
लोकतंत्र की आत्मा पर मंडराता सबसे बड़ा संकट। लोकतंत्र की आत्मा का सौदा! चुनावी बाज़ार में 'नीलाम' होता जनादेश: कर्तव्य से ज्यादा 'कीमत' की चर्चा।जिसे दुनिया का सबसे बड़ा लोकतंत्र कहा जाता है, आज एक ऐसे दोराहे पर खड़ा है जहाँ चुनाव अब 'जनसेवा का माध्यम' नहीं, बल्कि 'खुले बाज़ार की मंडी' बन चुके हैं। जिस मतदान को संविधान ने सबसे पवित्र अधिकार बताया था, वह अब 'लेन-देन' की एक इकाई में सिमट गया है।
विजय कुमार भारद्वाज/मुंबई चुनावों का बाज़ार और मतदाता की मानसिकता। लोकतंत्र की आत्मा पर मंडराता सबसे बड़ा संकट।
लोकतंत्र की आत्मा का सौदा!
चुनावी बाज़ार में ‘नीलाम’ होता जनादेश: कर्तव्य से ज्यादा ‘कीमत’ की चर्चा
मुंबई/ महाराष्ट्र: भारत, जिसे दुनिया का सबसे बड़ा लोकतंत्र कहा जाता है, आज एक ऐसे दोराहे पर खड़ा है जहाँ चुनाव अब ‘जनसेवा का माध्यम’ नहीं, बल्कि ‘खुले बाज़ार की मंडी’ बन चुके हैं। जिस मतदान को संविधान ने सबसे पवित्र अधिकार बताया था, वह अब ‘लेन-देन’ की एक इकाई में सिमट गया है। विडंबना देखिए कि मतदाता सूची में नाम होना अब नागरिक जिम्मेदारी नहीं, बल्कि चुनावी सीज़न में ‘कैश’ होने वाला चेक बन गया है।
नैतिक पतन: जब ‘लालच’ बन गया ‘समझदारी’
आज समाज का ताना-बाना इस कदर विकृत हो चुका है कि चुनाव के दौरान यदि कोई मतदाता नकद या उपहार स्वीकार नहीं करता, तो उसे समाज ‘आदर्शवादी’ नहीं बल्कि ‘मूर्ख’ और ‘नाकारा’ करार देता है। परिवार और मित्रों के बीच चर्चा का विषय यह नहीं होता कि “कौन सा नेता क्षेत्र का विकास करेगा?”, बल्कि सवाल यह होता है कि “इस बार किसने कितना दिया?”
’तेरी भी चुप, मेरी भी चुप’ की इस नई संस्कृति ने लोकतंत्र के बुनियादी ढांचे को दीमक की तरह चाटना शुरू कर दिया है। राजनीतिक दल, उम्मीदवार और ज़मीनी कार्यकर्ता—सभी ‘बहती गंगा में हाथ धोने’ की होड़ में लगे हैं।
लोकतंत्र का घातक दुष्चक्र (The Deadly Vicious Cycle)
यह खेल एक ऐसे चक्र में फंस गया है जहाँ हार अंततः जनता की ही होती है:
पैसे का वितरण: उम्मीदवार करोड़ों खर्च कर वोट खरीदता है।
शोषण की शुरुआत: सत्ता में आने के बाद प्रतिनिधि सबसे पहले अपना ‘निवेश’ (Investment) वसूलता है।
मुद्दों की विदाई: विकास, शिक्षा, स्वास्थ्य और रोज़गार जैसे बुनियादी मुद्दे चर्चा से बाहर हो जाते हैं।
बलिदान: अंततः आम आदमी के टैक्स का पैसा और उसके अधिकार इस भ्रष्टाचार की भेंट चढ़ जाते हैं।
आंकड़ों और वास्तविकता का टकराव
मतदान का गिरता स्तर: जब 50% से भी कम मतदान में सरकारें चुनी जाती हैं, तो क्या वे वास्तव में 100% जनता का प्रतिनिधित्व करती हैं?
गायब होते मुद्दे: महंगाई, बेरोज़गारी और नागरिक सुविधाओं की जगह अब जाति, धर्म और भाषा के नाम पर बँटवारा चुनावी हथियार बन गया है।
संवैधानिक संकट: संविधान की नींव को खोखला करने वाला यह ‘प्रतिशत का खेल’ अब प्रशासनिक और राजनैतिक संरक्षण में फल-फूल रहा है।
आत्ममंथन: क्या हम सिर्फ 15अगस्त और 26 जनवरी के देशभक्त हैं?
हमारी देशभक्ती अक्सर राष्ट्रीय पर्वों तक सीमित रह गई है। चुनाव के दिन ‘छुट्टी’ मनाने वाला मध्यवर्ग और ‘लालच’ में वोट बेचने वाला निम्न वर्ग—दोनों ही इस गिरावट के लिए समान रूप से जिम्मेदार हैं। यदि भारत को विश्व शक्ति बनना है, तो हमारी चुनावी व्यवस्था में नैतिक सुधार अनिवार्य है।
”यदि अब भी चेतना नहीं जगी, तो चुनाव जनतंत्र का उत्सव नहीं, बल्कि केवल सत्ता का सौदा बनकर रह जाएंगे और लोकतंत्र अपनी आत्मा खो देगा।”
बड़ा सवाल:
क्या हम एक ऐसी पीढ़ी तैयार कर रहे हैं जो लोकतंत्र को सिर्फ एक व्यापारिक सौदे के रूप में देखेगी? समय आ गया है कि नागरिक, राजनीतिक दल और संवैधानिक संस्थाएं आत्ममंथन करें। आरोप-प्रत्यारोप का समय बीत चुका है, अब अस्तित्व बचाने का संघर्ष है।पत्रकार – मुकेश शिंदे (राजनीतिक सामाजिक विश्लेषक)
संपर्क:+918779671797. इस नंबर पर और भी राजनीतिक सामाजिक विश्लेषक से विशेष बातचीत और जानकारी प्राप्त कर सकते है।