
सिद्धार्थनगर: वन विभाग का ‘जादुई’ खेल; जमीन पर सन्नाटा, कागजों पर चल रही आरा मशीन!
सरकारी कर्मी का भाई और भ्रष्टाचार की 'आरी'; बिना मशीन के ही हो रहा है सालों से रिन्यूअल।
अजीत मिश्रा (खोजी)
।। सिद्धार्थनगर: वन विभाग का ‘अदृश्य’ खेल, कागज पर दौड़ रही आरा मशीन, धरातल से गायब।।
सोमवार 19 जनवरी 26, उत्तर प्रदेश।
सिद्धार्थनगर। जनपद का वन विभाग इन दिनों अपने अनोखे कारनामों को लेकर चर्चा में है। ताजा मामला भ्रष्टाचार की उन जड़ों को उजागर करता है, जहाँ सरकारी रसूख और विभागीय मिलीभगत के खेल में नियम-कानूनों की धज्जियां उड़ाई जा रही हैं। मामला कपिलवस्तु नगर पंचायत के चैनपुर भठ्ठे के पास का है, जहाँ कागजों में तो आरा मशीन धड़ल्ले से संचालित हो रही है, लेकिन हकीकत में वहाँ सन्नाटा पसरा है।
⭐भाई का ‘कवच’ और सरकारी पद का रसूख
सूत्रों से मिली जानकारी के अनुसार, इस पूरे खेल के पीछे वन विभाग के ही एक कर्मी का हाथ बताया जा रहा है। चर्चा है कि यह आरा मशीन गौरीशंकर के भाई शिव सोनी के नाम पर दर्ज है। बड़ा सवाल यह है कि एक सरकारी कर्मचारी के परिवार के नाम पर विभाग ने लाइसेंस की अनुमति आखिर किस आधार पर दी? क्या यह पद का दुरुपयोग नहीं है?
⭐धरातल पर शून्य, कागजों में ‘फुल स्पीड’
स्थानीय ग्रामीणों का कहना है कि बहुत पहले यहाँ कोई मशीन लगी थी, लेकिन वर्तमान में मौके पर ऐसी किसी मशीन का नामोनिशान नहीं है। हैरानी की बात यह है कि जब मौके पर मशीन ही नहीं है, तो विभाग हर साल इसका नवीनीकरण (रिन्यूअल) कैसे कर रहा है? सूत्रों का दावा है कि टेड़िया निवासी एक व्यक्ति ने अपनी मशीन महज एक महीने के लिए किराए पर दी थी, जिसे आधार बनाकर कागजी खानापूर्ति की जा रही है।
⭐भ्रष्टाचार की ‘जड़ें’ और जीएसटी की चोरी
यह सिर्फ एक लाइसेंस का मामला नहीं है, बल्कि एक बड़े वित्तीय घोटाले की ओर इशारा करता है।
जीएसटी चोरी: जब मशीन संचालित ही नहीं है, तो उसके नाम पर होने वाले लेन-देन और टैक्स का क्या? विभाग आखिर इस ‘अदृश्य’ मशीन पर इतना मेहरबान क्यों है?
रिन्यूअल का खेल: आरोप है कि विभाग हर साल रिन्यूअल के नाम पर भारी रकम डकार रहा है। बिना भौतिक सत्यापन के फाइलें टेबल दर टेबल कैसे पास हो रही हैं, यह जांच का विषय है।
⭐जवाबदेही से बचता विभाग
सिद्धार्थनगर वन विभाग में भ्रष्टाचार की जड़ें इतनी गहरी हो चुकी हैं कि खुलेआम हो रही इन धांधलियों पर कोई अधिकारी बोलने को तैयार नहीं है। आखिर कब तक रसूखदारों के इशारे पर सरकारी तंत्र को कठपुतली बनाया जाता रहेगा? क्या उच्च अधिकारी इस ‘भूतिया’ आरा मशीन और इसके पीछे के असली खिलाड़ियों पर कार्रवाई करेंगे या भ्रष्टाचार का यह आरा यूं ही चलता रहेगा?
प्रमुख सवाल जो विभाग को चुभेंगे:
👉बिना मशीन के मौके पर भौतिक सत्यापन (Physical Verification) कैसे सफल हो गया?
👉क्या एक विभागीय कर्मी के सगे भाई को लाइसेंस देना ‘हितों के टकराव’ (Conflict of Interest) का मामला नहीं है?
👉इस फर्जीवाड़े से हो रही राजस्व और जीएसटी की हानि का जिम्मेदार कौन है?


















