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“बेटियों की विदाई या सिस्टम की रुसवाई? जीआईसी ग्राउंड में लुटेरों और भ्रष्ट कर्मचारियों का तांडव!”

"सरकारी शादी में सेंधमारी: किसी का पर्स गया तो किसी का मोबाइल, कर्मचारी घर ले गए फल-मिठाई!"

अजीत मिश्रा (खोजी)

।। भ्रष्टाचार की भेंट चढ़ा ‘सामूहिक विवाह’: आशीर्वाद की जगह बेटियों को मिला सरकारी कुव्यवस्था का दंश।।

उत्तर प्रदेश।

बस्ती। सरकार की महत्वाकांक्षी योजनाएं जब भ्रष्टाचार और विभागीय लापरवाही की भेंट चढ़ती हैं, तो उसका मंजर जीआईसी इंटर कॉलेज ग्राउंड में आयोजित सामूहिक विवाह समारोह जैसा होता है। जहाँ एक ओर गरीब बेटियों के हाथ पीले हो रहे थे, वहीं दूसरी ओर व्यवस्था की सड़ांध ने इस पवित्र आयोजन को बदइंतजामी का अखाड़ा बना दिया।

सुरक्षा के दावों की खुली पोल: लुटेरों के हवाले रहा पंडाल

आयोजन में सुरक्षा और व्यवस्था के बड़े-बड़े दावों की हकीकत यह रही कि दर्जनों जोड़ों के मोबाइल और पर्स पार हो गए। हद तो तब हो गई जब बहादुरपुर ब्लॉक से आई एक महिला का पर्स गायब हो गया, जिसमें 4000 रुपये नकद, एटीएम, पैन कार्ड और आधार कार्ड जैसे महत्वपूर्ण दस्तावेज थे।

हैरानी की बात यह है कि जहाँ भारी भीड़ और सरकारी तामझाम था, वहाँ लुटेरे बेखौफ होकर अपना काम कर रहे थे। एक जोड़े ने तो यहाँ तक बताया कि सिंदूरदान की रस्म के लिए रखा गया ‘सिंघोरा’ ही चोरी हो गया। जिस आयोजन में परंपराओं और भावनाओं का सम्मान होना चाहिए था, वहाँ विभागीय उदासीनता के कारण पीड़ित परिवार अपनी खुशियाँ छोड़ अपनी चोरी हुई पूंजी तलाश रहे थे।

👉शाही दावत या कर्मचारियों की लूट?

व्यवस्था की सबसे शर्मनाक तस्वीर तब सामने आई जब विभाग के कर्मचारी ही लाभार्थियों के हक पर डाका डालते नजर आए। आयोजन स्थल पर बंटने वाले फल और लड्डू गरीब परिवारों तक पहुंचने के बजाय, विभाग के कर्मचारी सरेआम अपने घरों को ले जाते देखे गए।

तल्ख टिप्पणी: जब रक्षक ही भक्षक बन जाएं और विभाग के छोटे से लेकर बड़े कर्मचारी सरकारी सामान को निजी संपत्ति समझकर घर भरने लगें, तो व्यवस्था में चूक होना कोई इत्तेफाक नहीं बल्कि एक सोची-समझी लापरवाही है।

👉बोर्ड की बड़ी लापरवाही, कौन लेगा जिम्मेदारी?

यह पूरा आयोजन उत्तर प्रदेश अन्य सन्निर्माण कर्मकार कल्याण बोर्ड के तहत किया गया था, जिसकी लापरवाही अब जगजाहिर है। जीआईसी ग्राउंड की बदइंतजामी चीख-चीख कर कह रही है कि आयोजन के नाम पर केवल खानापूर्ति की गई। बजट ठिकाने लगाने के चक्कर में न तो सुरक्षा का ख्याल रखा गया और न ही आयोजन की शुचिता का।

अगर सामूहिक विवाह जैसे संवेदनशील और पुनीत कार्य में भी भ्रष्टाचार और चोरी का बोलबाला है, तो प्रशासन की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े होते हैं। क्या उच्चाधिकारी इन ‘घरखोर’ कर्मचारियों और लापरवाह जिम्मेदारों पर कार्रवाई की जहमत उठाएंगे?

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