
भूमि पूजन और शिलान्यास निश्चित रूप से किसी भी विकास कार्य की अच्छी शुरुआत माने जाते हैं। मंच सजते हैं, फीता कटता है, फोटो खिंचते हैं और बड़े-बड़े वादे किए जाते हैं। लेकिन असली सवाल वहीं का वहीं खड़ा रहता है — क्या जनता को वास्तव में उन सुविधाओं का लाभ मिल रहा है, जिनकी वह हकदार है?
आज जरूरत केवल पत्थर पर नाम लिखवाने की नहीं, बल्कि जमीन पर बदलाव दिखाने की है। अगर किसी क्षेत्र में Primary Health Centre (पीएचसी) को Community Health Centre (सीएचसी) में उच्चीकृत कर दिया जाए और उसे उपलब्धि के रूप में प्रस्तुत किया जाए, तो यह समाधान नहीं बल्कि सवाल खड़ा करता है। स्वास्थ्य सेवाएं कागजों में नहीं, धरातल पर मजबूत होनी चाहिए।
ग्रामीण और दूरस्थ क्षेत्रों की जनता पहले से ही सीमित संसाधनों के सहारे जीवन जी रही है। उन्हें बेहतर इलाज, विशेषज्ञ डॉक्टर, जरूरी दवाइयां और 24 घंटे आपातकालीन सुविधा चाहिए। यदि अस्पतालों में डॉक्टरों की कमी हो, मशीनें काम न करें, एम्बुलेंस समय पर न पहुंचे और मरीजों को जिला मुख्यालय की ओर रेफर कर दिया जाए, तो भवन चाहे जितना भव्य हो, उसका क्या लाभ?
सरकार की प्राथमिकता केवल उद्घाटन समारोह नहीं होनी चाहिए, बल्कि सेवा की गुणवत्ता होनी चाहिए। स्वास्थ्य व्यवस्था केवल इमारत खड़ी करने से मजबूत नहीं होती; वह प्रशिक्षित स्टाफ, पर्याप्त बजट, आधुनिक उपकरण और जवाबदेही से मजबूत होती है। जनता टैक्स देती है, वोट देती है और भरोसा करती है — बदले में उसे सम्मानजनक और प्रभावी सुविधाएं मिलनी ही चाहिए।
विकास का असली पैमाना यह नहीं कि कितने शिलान्यास हुए, बल्कि यह है कि कितने लोग लाभान्वित हुए। कितनी माताओं को सुरक्षित प्रसव सुविधा मिली, कितने बुजुर्गों को समय पर इलाज मिला, कितने बच्चों को टीकाकरण और पोषण सेवाएं सहज उपलब्ध हुईं — यही असली उपलब्धि है।
यह समय है कि घोषणाओं से आगे बढ़कर परिणामों पर ध्यान दिया जाए। जनता को दिखावे नहीं, भरोसा चाहिए। उन्हें ऐसे अस्पताल चाहिए जहां इलाज के लिए सिफारिश न लगानी पड़े, जहां दवाएं बाजार से खरीदने की मजबूरी न हो, और जहां हर व्यक्ति को समान अधिकार से स्वास्थ्य सेवा मिले।
भूमि पूजन और लोकार्पण अच्छी शुरुआत हो सकते हैं, पर वे अंत नहीं हैं। असली जीत तब होगी जब हर गांव, हर परिवार को यह महसूस हो कि सरकार सचमुच उनकी जरूरतों को समझती है और उन्हें प्राथमिकता देती है। विकास का मतलब केवल निर्माण नहीं, बल्कि संवेदनशील और सशक्त व्यवस्था है — और यही लोकतंत्र की सच्ची पहचान है।
यह विरोध नहीं पीड़ा है पहाड़ की
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