
‘कलम’ के सिपाही और ‘भगवान’ के पुजारी पर चौतरफा वार, आखिर कब तक गाली सहेगा प्रबुद्ध वर्ग?
बस्ती मंडल ग्राउंड रिपोर्ट: लोकतंत्र के चौथे स्तंभ और समाज के मार्गदर्शक को निशाना बनाना बंद करो! दोषी चंद लोग... तो पूरे समाज को सजा क्यों? पत्रकारों और ब्राह्मणों के खिलाफ नफरत का ये कैसा 'फैशन'?
अजीत मिश्रा (खोजी)
‘कलम’ और ‘भगवान’ के ‘पुजारी’ को ‘मिल’ रही ‘गालियां’!: समाज की सेवा करने वालों पर चौतरफा हमला, आखिर कब तक सहेगा प्रबुद्ध वर्ग?
ब्यूरो रिपोर्ट: बस्ती मंडल (उत्तर प्रदेश)
- सत्ता के दलालों और भ्रष्टाचारियों को जब चुभती है ‘कलम’, तो उगलते हैं गालियों का जहर!
- समाज सेवा का कैसा सिला? ‘आईना’ दिखाने वालों को मिल रही सिर्फ गालियां!
- 90 फ़ीसदी बेदाग, फिर भी निशाने पर ब्राह्मण और पत्रकार; आखिर क्यों आसान शिकार बन गए दोनों वर्ग?
- पुरखों की भूल की सजा बच्चों को क्यों? राजनीतिक रोटियां सेकने के लिए प्रबुद्ध वर्ग पर तीखा हमला!
- सवाल उठाते हैं तो बागी कहलाते हैं, सच लिखते हैं तो गालियां पाते हैं!
- सियासत के गलियारों से समाज के चौराहों तक, क्यों हो रहा ‘कलम’ और ‘संस्कार’ का अपमान?
बस्ती। आज समाज में एक बेहद गंभीर और विचारणीय यक्ष प्रश्न खड़ा हो गया है—आखिर क्यों सबसे अधिक गाली ‘कलम’ के सिपाही यानी पत्रकार और ‘भगवान’ के पुजारी यानी ब्राह्मण को ही मिल रही है? जो दो वर्ग निस्वार्थ भाव से सदियों से समाज को सही दिशा दिखाने और उसकी सेवा करने में जुटे हैं, आज उन्हीं को समाज के एक धड़े द्वारा लगातार निशाना बनाया जा रहा है। क्या यह दोनों वर्गों की कर्तव्यनिष्ठा पर सवाल है, या फिर समाज की दूषित होती मानसिकता का परिणाम?
सवाल उठना लाजमी है: क्या धन और लालच हावी हो गया है?
एक दौर था जब पत्रकार को समाज का ‘आईना’ और ब्राह्मण को समाज का ‘मार्गदर्शक’ माना जाता था। लेकिन आज आरोप लग रहे हैं कि क्या ये दोनों वर्ग कर्तव्य से अधिक धन और लालच को महत्व देने लगे हैं?
- पत्रकारों पर लगते आरोप: आज समाज का एक बड़ा तबका यह मानने लगा है कि अधिकांश पत्रकार निष्पक्ष रहने के बजाय किसी न किसी ‘दरबार के दरबारी’ हो गए हैं। यही वजह है कि पत्रकारों को गाली खाना पड़ रहा है। हालात ये हैं कि मानो पत्रकारों को गाली देना एक नया रिवाज बन गया है—पत्रकार सही लिखे तब भी गाली पाए, गलत लिखे तब भी, और कुछ न लिखे तब भी उसे ही कोसा जाता है।
- ब्राह्मणों पर चौतरफा हमला: ठीक इसी तरह ब्राह्मण समाज को भी लगातार निशाना बनाया जा रहा है। जो समाज में उनकी एक पावन और मार्गदर्शक की छवि थी, उसे धूमिल करने का सुनियोजित प्रयास किया जा रहा है। ब्राह्मण चाहे सही रहे या गलत, समाज का एक हिस्सा उन्हें गाली देने का कोई मौका नहीं छोड़ता।
दोषी चंद लोग, सजा पूरे समाज को क्यों?
देखा जाए तो इतिहास से लेकर वर्तमान तक, इन्हीं दोनों वर्गों का शोषण भी सबसे अधिक हुआ है। इतना सब झेलने के बावजूद दोनों वर्ग लगातार समाज को अपनी सेवाएं दे रहे हैं। लोगों को यह बिल्कुल नहीं भूलना चाहिए कि समाज को सबसे अधिक आवश्यकता इन्हीं दोनों वर्गों की पड़ती है।
”इस बात से इंकार नहीं किया जा सकता कि अतीत में कुछ लोगों ने गलतियां की होंगी या शोषण किया होगा, लेकिन उनके पुरखों की सजा आज उनके बच्चों को गालियों के रूप में क्यों भुगतनी पड़ रही है?”
आज जनप्रतिनिधि और राजनेता भी अपनी राजनीति चमकाने के लिए इन दोनों वर्गों को सरेआम गाली देने लगे हैं। पत्रकारों और ब्राह्मणों को गाली देना जैसे आज के दौर का एक नया ‘फैशन’ बन गया है। कुछ लोगों का कुतर्क है कि जब कोई वर्ग अपनी राह से भटक जाता है, तो गाली मिलना स्वाभाविक है। लेकिन क्या सभी लोग भटक गए हैं? बिल्कुल नहीं। फिर चंद लोगों के भटकने का खमियाजा पूरे वर्ग को क्यों भुगतना पड़ रहा है?
जाति व्यवस्था का गुस्सा और लोकतंत्र के चौथे स्तंभ पर प्रहार
- जाति व्यवस्था का निशाना: बहुजन समाज, दलितों, शोषितों और वंचितों के अधिकारों की लड़ाई लड़ने के नाम पर सबसे आसान निशाना ब्राह्मण ही बनता है। लोग मान बैठे हैं कि हर शोषण के पीछे ब्राह्मण ही है, जबकि सच्चाई इसके बिल्कुल उलट है। भले ही समाज के कुछ गिने-चुने लोगों ने गलत किया होगा, लेकिन आज भी 90 फीसदी ब्राह्मण समाज की सेवा ठीक उसी प्रकार कर रहे हैं, जैसे एक सच्चा पत्रकार देश की सेवा करता है।
- भ्रष्टाचार पर चोट तो मिलती है गाली: पत्रकार लोकतंत्र के चौथे स्तंभ हैं। जब भी कोई ईमानदार पत्रकार सत्ता, सरकार और समाज में व्याप्त भ्रष्टाचार पर सवाल उठाता है या उसे उजागर करता है, तो भ्रष्टाचारियों के समर्थक और सिंडिकेट एकजुट होकर उस पत्रकार को गाली देने और उसे बदनाम करने में लग जाते हैं।
ब्यूरो की तीखी टिप्पणी: गाली समस्या का समाधान नहीं!
इस कड़वे सच को झुठलाया नहीं जा सकता कि दोनों वर्गों ने समाज को बहुत कुछ दिया है। किसी को भी गाली देने से पहले समाज को अपनी गिरेबान में झांकना होगा। गाली देना किसी भी समस्या का समाधान नहीं हो सकता।
अगर समाज को प्रगति के पथ पर आगे बढ़ना है, तो इसका समाधान आपसी भाईचारे, सम्मान और प्यार से ही निकलेगा। प्रबुद्ध वर्ग पर इस तरह के आक्रामक मानसिक हमलों को तुरंत रोकना होगा, अन्यथा समाज का ताना-बाना बिखरने में देर नहीं लगेगी। ‘प्यार दीजिए और प्यार पाइए’—यही वक्त का तकाजा है।



















