?php echo do_shortcode('[t4b-ticker]'); ?
इतवाउत्तर प्रदेशकुशीनगरगोंडागोरखपुरबस्तीबहराइचलखनऊसिद्धार्थनगर 

विशेष रिपोर्ट: बस्ती स्वास्थ्य विभाग की ‘कोटेशन तिजोरी’ में बंद है जनता के हक का करोड़ों रुपया

स्वास्थ्य विभाग में ‘भ्रष्टाचार का पोस्टमार्टम’: कोटेशन की आड़ में जनता के करोड़ों का बंदरबांट! बस्ती स्वास्थ्य विभाग का ‘खेल’: डीएम-सीडीओ की नाक के नीचे पनप रहा करोड़ों का घपला।

अजीत मिश्रा (खोजी)

प्रशासनिक मिलीभगत या भ्रष्टाचार का खुला खेल: बस्ती स्वास्थ्य विभाग सवालों के घेरे में

ब्यूरो रिपोर्ट, बस्ती मंडल

  • करोड़ों का बजट, कागजों पर इलाज: क्या स्वास्थ्य विभाग अब सिर्फ ‘कमीशन’ का अड्डा है?
  •  बस्ती स्वास्थ्य विभाग में ‘टेंडर’ से परहेज क्यों? नियमों की बलि चढ़ाकर चहेतों की जेबें भर रहे अधिकारी।
  • वित्तीय अनियमितता या सोची-समझी साजिश? बस्ती के स्वास्थ्य महकमे में ‘कोटेशन’ का गंदा खेल उजागर।
  • सरकारी धन की लूट: बस्ती में स्वास्थ्य सेवाओं का बुरा हाल, ठेकेदारों की मौज जारी!
  • बस्ती का स्वास्थ्य विभाग: जहाँ दवा से ज्यादा ‘कमीशन’ का इलाज होता है!
  • फाइलें चिल्ला रहीं, प्रशासन मौन: बस्ती स्वास्थ्य विभाग में जारी है ‘लूट का उत्सव’।

बस्ती के स्वास्थ्य विभाग में भ्रष्टाचार का एक ऐसा चक्रव्यूह रचा गया है, जिसकी गूंज पूरे मंडल में सुनाई दे रही है। सरकारी खजाने से करोड़ों रुपए निकल रहे हैं, लेकिन धरातल पर दवाइयों, उपकरणों और सेवाओं की स्थिति दयनीय है। ‘भ्रष्टाचार के खेल’ की बारीकियों को देखें तो साफ होता है कि यह कोई अनियंत्रित चूक नहीं, बल्कि एक सुनियोजित ‘वित्तीय अपराध’ है।बस्ती के स्वास्थ्य विभाग में ‘भ्रष्टाचार का एक ऐसा खेल’ चल रहा है, जो सरकारी खजाने को दीमक की तरह चाट रहा है। सवाल यह है कि जब बजट करोड़ों का है, तो टेंडर के बजाय ‘कोटेशन’ की आड़ में खेल क्यों खेला जा रहा है? और सबसे बड़ा यक्ष प्रश्न यह है कि—आखिर क्यों ‘सीएमओ’ के इस कथित भ्रष्टाचार पर डीएम और सीडीओ की मुहर लग रही है?

टेंडर नहीं, ‘टुकड़ों में कमीशन’ का खेल

सरकारी खरीद का सीधा नियम है—यदि किसी मद में खर्च 10 लाख से अधिक है, तो पारदर्शी ‘ई-टेंडरिंग’ होनी चाहिए। लेकिन बस्ती स्वास्थ्य विभाग के आला अधिकारी इस नियम से बचते रहे हैं। विभाग ने बड़े बजट को छोटे-छोटे टुकड़ों में बांटकर ‘कोटेशन’ के माध्यम से काम करना शुरू किया है। इसका एकमात्र उद्देश्य है—अपने चहेते ठेकेदारों को काम देना और कमीशन का प्रतिशत तय करना। यह सीधे तौर पर सरकारी वित्तीय नियमों का उल्लंघन है।नियम स्पष्ट हैं: यदि बजट एक करोड़ का है, तो टेंडर प्रक्रिया अनिवार्य है। लेकिन बस्ती स्वास्थ्य विभाग में इसे दरकिनार कर ‘दस लाख से कम’ के कोटेशन के जरिए काम किए जा रहे हैं। जानकारों का कहना है कि यह कोई चूक नहीं, बल्कि एक सुनियोजित साजिश है ताकि बड़े टेंडर से बचा जा सके और चहेते ठेकेदारों को ‘टुकड़ों’ में भुगतान कर कमीशन की मोटी मलाई काटी जा सके।

क्या कागजों पर ही हो रही है आपूर्ति?

आरोप बेहद गंभीर हैं। एक रुपए की वस्तु को दस रुपए में खरीदने का खेल और फिर घटिया सामान की आपूर्ति—यह सब प्रशासनिक नाक के नीचे हो रहा है। सवाल उठता है कि ई-ऑफिस के जरिए होने वाली इस पूरी प्रक्रिया में जब फाइलों पर डीएम और सीडीओ के हस्ताक्षर होते हैं, तो क्या उन्हें यह ‘वित्तीय अनियमितता’ दिखाई नहीं देती?सबसे बड़ा सवाल यह है कि स्वास्थ्य विभाग की हर फाइल का अनुमोदन और भुगतान से पहले का परीक्षण जिला प्रशासन के स्तर पर होता है। यदि जिलाधिकारी (DM) और मुख्य विकास अधिकारी (CDO) के दफ्तरों से इन फाइलों पर हस्ताक्षर हो रहे हैं, तो क्या उन्हें यह नहीं दिखा कि एक ही मद में बार-बार कोटेशन क्यों लिए जा रहे हैं? क्या प्रशासनिक स्तर पर ‘फाइलें’ देखी जा रही हैं या केवल ‘कमीशन’ का हिसाब-किताब? प्रशासन की चुप्पी कई बड़े अधिकारियों की संलिप्तता की ओर इशारा कर रही है।

सरकारी खजाने पर ‘चहेतों’ की सेंधमारी

सूत्रों की मानें तो हर साल करोड़ों का बजट इन्हीं चहेते ठेकेदारों की जेब में जा रहा है। गोरखपुर के कुछ ठेकेदारों के नाम बार-बार चर्चा में हैं, जो सरकारी धन को अपनी जागीर समझ रहे हैं। जिला अस्पताल, महिला अस्पताल से लेकर 100 बेड वाले एमसीएच विंग और टीबी अस्पताल तक, भ्रष्टाचार की जड़ें गहरी हैं।आरोप है कि विभाग के कई बड़े काम गोरखपुर के कुछ चुनिंदा ठेकेदारों को ही दिए जा रहे हैं। स्थानीय स्तर पर काबिल एजेंसियों के मौजूद होने के बावजूद, बाहरी ठेकेदारों को काम सौंपना ही अपने आप में संदेह पैदा करता है। सूत्रों के मुताबिक, इन ठेकेदारों की पहुंच सीधे विभाग के निर्णय लेने वाले अधिकारियों तक है। यही कारण है कि बिल पास कराने से लेकर भुगतान तक की प्रक्रिया में न तो देरी होती है और न ही कोई सवाल पूछा जाता है।

बुनियादी सुविधाओं का अभाव

एक तरफ स्वास्थ्य विभाग में पैसों की गंगा बह रही है, दूसरी तरफ जिला अस्पताल और एमसीएच विंग (100 बेड) में मरीजों को मूलभूत सुविधाएं नहीं मिल रही हैं। कभी दवाइयां गायब रहती हैं, तो कभी जांच मशीनें खराब। करोड़ों का बजट आखिर खर्च कहां हो रहा है? क्या यह बजट फाइलों में दवाइयां और उपकरण बनकर खरीद लिया जाता है, लेकिन मरीजों तक पहुंचते-पहुंचते गायब हो जाता है?

जनता का पैसा, ठेकेदारों की मौज

पिछले दो वर्षों में स्वास्थ्य विभाग द्वारा खरीदी गई सामग्री और किए गए निर्माण कार्यों की ‘थर्ड पार्टी ऑडिट’ की मांग उठ रही है। अगर निष्पक्ष जांच हो, तो करोड़ों के घोटाले का पर्दाफाश होना तय है। लेकिन डर इस बात का है कि जांच के नाम पर होने वाली कमेटियां खुद उन अधिकारियों द्वारा गठित की जाती हैं, जो इस घोटाले के मुख्य सूत्रधार हैं।

  • बस्ती का स्वास्थ्य विभाग अब आम आदमी के लिए ‘बीमार’ हो चुका है। हम प्रशासन से मांग करते हैं कि:
  • गत दो वर्षों के सभी कोटेशन कार्यों की सूची सार्वजनिक की जाए।
  • इन कार्यों का भौतिक सत्यापन किसी स्वतंत्र जांच एजेंसी से कराया जाए।
  • डीएम स्तर पर इस पूरे मामले में ‘वित्तीय अनियमितता’ की निष्पक्ष जांच रिपोर्ट सार्वजनिक की जाए।

यदि अब भी कार्रवाई नहीं हुई, तो यह स्पष्ट हो जाएगा कि ‘भ्रष्टाचार’ का यह खेल ऊपर तक फैला है। बस्ती की जनता अब अपने खून-पसीने के टैक्स के पैसे का हिसाब चाहती है।

कब जागेगा प्रशासन?

शिकायतें होती हैं, बैठकें होती हैं, लेकिन अंत में ‘जांच’ का नाम लेकर फाइलों को ठंडे बस्ते में डाल दिया जाता है। क्या डीएम और सीडीओ की चुप्पी इस भ्रष्टाचार को मौन सहमति है? क्या अब समय नहीं आ गया है कि इस पूरे वित्तीय वर्ष के खर्चों की निष्पक्ष और उच्च-स्तरीय जांच हो?

जनता पूछ रही है:

  • क्या जिला प्रशासन के पास इन कथित घोटालों का कोई जवाब है?
  • क्या चहेते ठेकेदारों को बचाने की कोशिश में सरकारी नियमों की बलि दी जा रही है?
  • कब तक ‘जीरो टॉलरेंस’ के दावों के बीच भ्रष्टाचार का यह नंगा नाच चलता रहेगा?

बस्ती की जनता अब केवल आश्वासनों से संतुष्ट होने वाली नहीं है। अब वक्त है जवाबदेही तय करने का और उन चेहरों को बेनकाब करने का जो सेवा के नाम पर अपनी तिजोरियां भर रहे हैं।

Back to top button
error: Content is protected !!