

सीएनआई चर्च विवाद: आरोप-प्रत्यारोप के बीच निष्पक्ष जांच की मांग तेज, दोनों पक्षों की जांच से ही सामने आएगा सच
बिशप मोरिस एडगर दान प्रकरण और विद्यालयों से जुड़े विवादों पर उठे सवाल, चर्च की प्रतिष्ठा बचाने के लिए निष्पक्ष जांच जरूरी
लखनऊ। चर्च ऑफ नॉर्थ इंडिया (CNI) और उससे जुड़े संस्थानों में चल रहे विवादों को लेकर अब निष्पक्ष जांच की मांग जोर पकड़ने लगी है। जनहित से जुड़े लोगों का कहना है कि किसी भी पक्ष को दोषी मानने से पहले सभी आरोपों की स्वतंत्र और निष्पक्ष जांच आवश्यक है, ताकि वास्तविक तथ्य सामने आ सकें और धार्मिक एवं शैक्षणिक संस्थाओं की प्रतिष्ठा प्रभावित न हो।
बताया जाता है कि बिशप मोरिस एडगर दान चर्च ऑफ नॉर्थ इंडिया, लखनऊ डायोसिस के प्रमुख धर्मगुरु हैं। उनके अधीन प्रदेश के विभिन्न क्षेत्रों में कई विद्यालय, महाविद्यालय, चर्च और अन्य संस्थाएं संचालित होती हैं। ऐसे में उनसे जुड़े किसी भी विवाद का प्रभाव केवल व्यक्तिगत स्तर तक सीमित नहीं रहता, बल्कि संस्थागत छवि पर भी असर पड़ता है।
मामला तब चर्चा में आया जब बिशप जॉनसन कटरा एक्सटेंशन विद्यालय की हेडमिस्ट्रेस प्रियदर्शनी पर आरोप लगाए गए कि उन्होंने एक पुरुष साथी के साथ मिलकर अधिवक्ताओं पर हमला करवाया था। हालांकि इन आरोपों की स्वतंत्र पुष्टि जांच का विषय है। घटना के बाद विद्यालय की छवि को ध्यान में रखते हुए उन्हें कुछ समय के लिए अवकाश पर भेजे जाने की बात सामने आई।
आरोप है कि अवकाश अवधि के दौरान ही प्रियदर्शनी विद्यालय पहुंचीं और वहां हंगामा हुआ, जिसके बाद प्रबंधन द्वारा उन्हें पद से हटाने की कार्रवाई की गई। इसके बाद प्रियदर्शनी ने कर्नलगंज थाने में बिशप मोरिस एडगर दान समेत तीन लोगों के खिलाफ शोषण का मुकदमा दर्ज कराया। बाद में एक अन्य प्राथमिकी भी दर्ज कराई गई, जिसमें धमकी देने के आरोप लगाए गए।
वहीं दूसरी ओर, ब्वॉयज हाई स्कूल एंड कॉलेज से जुड़े पूर्व कार्यवाहक प्रधानाचार्य डेविड एंड्रयू ल्यूक और उनके परिजनों के खिलाफ आर्थिक अपराध शाखा (EOW) लखनऊ सेक्टर में करीब 10 करोड़ रुपये के कथित गबन का मामला दर्ज होने की जानकारी सामने आई है। जांच में आरोप लगाया गया कि वर्ष 2014 से 2021 के बीच शिक्षण शुल्क से संबंधित धनराशि में अनियमितताएं हुईं और तीन निर्माण कंपनियों के माध्यम से धन के दुरुपयोग की बात सामने आई।
जांच अधिकारी नरेंद्र सिंह की रिपोर्ट के आधार पर भारतीय दंड संहिता की विभिन्न धाराओं के तहत आरोप लगाए गए हैं। इससे पहले भी डेविड ल्यूक पर फर्जी एमए डिग्री और करोड़ों रुपये की वित्तीय अनियमितताओं के आरोप लगने की बातें सामने आई थीं, जिसके बाद उन्हें पद से हटाए जाने का मामला भी चर्चा में रहा।
विवाद के बीच एक पक्ष का आरोप है कि कुछ लोगों के दबाव में प्रियदर्शनी द्वारा बिशप दान, सचिव राकेश छत्री, एलेन दान सहित अन्य लोगों के खिलाफ गंभीर आरोप लगाए गए। हालांकि इन आरोपों की भी जांच आवश्यक है, क्योंकि ऐसे मामलों में केवल आरोप के आधार पर निष्कर्ष निकालना उचित नहीं माना जा सकता।
वहीं बिशप मोरिस एडगर दान की ओर से यह कहा गया है कि यदि उनके खिलाफ लगाए गए आरोप सत्य साबित होते हैं तो कानून के अनुसार कठोर कार्रवाई होनी चाहिए, लेकिन यदि आरोप झूठे पाए जाते हैं तो झूठे मुकदमे दर्ज कराने वालों के खिलाफ भी कार्रवाई होनी चाहिए।
सीएनआई से जुड़े रॉकवेल अमर मोजेस ने भी मामले में निष्पक्ष जांच की आवश्यकता पर जोर देते हुए कहा कि बिशप एक धार्मिक पद पर हैं और वर्तमान विवाद चर्च के आंतरिक मतभेदों से जुड़ा हुआ प्रतीत होता है। उन्होंने कहा कि विवाद के कारण चर्च ऑफ नॉर्थ इंडिया की छवि प्रभावित हो रही है, इसलिए सच्चाई सामने आना जरूरी है।
कानूनी विशेषज्ञों का कहना है कि किसी भी गंभीर आरोप की जांच निष्पक्ष एजेंसी से होना न्यायहित में महत्वपूर्ण होता है। इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ पीठ द्वारा क्रिमिनल मिसलेनियस रिपिटीशन संख्या 1793/2025 (अरविंद यादव बनाम उत्तर प्रदेश राज्य) में 05 मार्च 2025 को दिए गए निर्देशों का हवाला देते हुए कहा जा रहा है कि फर्जी मुकदमों और ब्लैकमेलिंग जैसे मामलों में जांच की निष्पक्षता बेहद महत्वपूर्ण है।
ऐसे में बिशप दान प्रकरण में भी दोनों पक्षों के आरोपों की गहन जांच की मांग उठ रही है। लोगों का कहना है कि जांच किसी दबाव से मुक्त होकर होनी चाहिए, जिससे यदि कोई दोषी है तो उस पर कार्रवाई हो और यदि कोई निर्दोष है तो उसकी प्रतिष्ठा को नुकसान न पहुंचे।
जनहित में यही आवश्यक है कि आरोपों और प्रत्यारोपों से ऊपर उठकर निष्पक्ष जांच कराई जाए, ताकि सच्चाई सामने आए और चर्च, शैक्षणिक संस्थाओं तथा समाज का विश्वास कायम रह सके।
✍️ रिपोर्ट: एलिक सिंह
संपादक – वंदे भारत लाइव टीवी न्यूज़
ब्यूरो प्रमुख – हलचल इंडिया न्यूज़
सहारनपुर
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