
अजीत मिश्रा (खोजी)
भ्रष्टाचार के ‘मंदिर’ में ‘जनप्रतिनिधियों’ का कोहराम: क्या वाकई सुधरेगा सिस्टम?
- भ्रष्ट अधिकारियों को बचाने में जुटा सीडीओ? ‘दिशा’ की बैठक में पत्रकारों से बदसलूकी पर मचा बवाल
- सदन में ‘कोहराम’: खाद की कालाबाजारी और बिजली विभाग के झूठ पर घिरे अधिकारी
- जब सत्ता और विपक्ष आए एक साथ: जिले के सबसे बड़े सदन में भ्रष्टाचार के खिलाफ हुई जोरदार लामबंदी
बस्ती। हाल ही में जिला विकास समन्वय एवं निगरानी समिति (दिशा) की बैठक में जो नज़ारा देखने को मिला, वह न केवल हैरान करने वाला है, बल्कि व्यवस्था के भीतर व्याप्त सड़न का जीवंत प्रमाण है। जब सत्ता और विपक्ष के पांच विधायक एक साथ भ्रष्टाचार के खिलाफ लामबंद हुए, तो प्रशासनिक अधिकारियों की पोल खुल गई।हाल ही में जिला विकास समन्वय एवं निगरानी समिति (दिशा) की बैठक किसी सार्थक चर्चा के बजाय प्रशासनिक विफलता और भ्रष्टाचार के आरोपों का अखाड़ा बन गई। बैठक का माहौल तब गरमा गया जब सत्ता और विपक्ष के पांच विधायक एक मंच पर आकर बिजली विभाग और कृषि विभाग के अधिकारियों के खिलाफ एक साथ मुखर हो गए।
झूठ की बुनियाद पर टिका प्रशासन
बैठक में जनप्रतिनिधियों ने बिजली विभाग और कृषि विभाग के अधिकारियों को सीधे तौर पर कटघरे में खड़ा किया। ‘माननीयों’ ने एक सुर में स्वीकार किया कि अधिकारी पिछले तीन साल से झूठ बोल रहे हैं। मखौड़ा में ट्रांसफार्मर न लगना, नंगे तारों का न बदला जाना, और मनरेगा के कार्यों में धांधली जैसे मुद्दों ने यह स्पष्ट कर दिया है कि अधिकारी जनता की समस्याओं के प्रति कितने असंवेदनशील हैं। सबसे शर्मनाक पहलू यह है कि जब जनप्रतिनिधि फोन करते हैं, तो जिम्मेदार अधिकारी फोन तक नहीं उठाते।
बैठक के दौरान जनप्रतिनिधियों ने प्रशासनिक अधिकारियों की कार्यशैली पर गंभीर सवाल उठाए:
- बिजली विभाग की विफलता: विधायकों ने बिजली विभाग के अधिकारियों पर पिछले तीन वर्षों से जनता से झूठ बोलने का आरोप लगाया। मखौड़ा में अब तक ट्रांसफार्मर न लगाए जाने और जर्जर तारों को न बदले जाने को लेकर कड़ा आक्रोश व्यक्त किया गया।
- अधिकारियों का असहयोग: विधायकों ने शिकायत की कि जिम्मेदार अधिकारी (एसई) न तो जनता की सुन रहे हैं और न ही जनप्रतिनिधियों के फोन उठाते हैं। बिजली विभाग के अधिकारियों और मीटर विभाग के बीच तालमेल का घोर अभाव है, जिससे उपभोक्ता बेवजह परेशान हो रहे हैं।
- मनरेगा में धांधली: मनरेगा कार्यों में 60-40 के अनुपात का पालन न करने और मनमाने ढंग से काम आवंटित करने के आरोप भी लगाए गए।
पत्रकारों से डर और भ्रष्टाचार को संरक्षण
प्रशासनिक अधिकारियों की बौखलाहट का आलम यह है कि वे भ्रष्टाचार के सवालों का सामना करने के बजाय पत्रकारों को ही बैठक से बाहर निकालने की कोशिश करते हैं। जिस सीडीओ पर किसानों का सबसे अधिक भरोसा होना चाहिए था, वही अधिकारियों की करतूतों पर पर्दा डालते हुए रंगे हाथों पकड़े गए। यह स्पष्ट है कि जो गलत करता है, वही डरता है।
- बैठक के दौरान प्रशासन का एक और चेहरा तब सामने आया जब सीडीओ ने कवरेज के लिए आए पत्रकारों को बैठक से बाहर जाने का निर्देश दिया।
- एमएलसी प्रतिनिधि हरीश सिंह ने इसका कड़ा विरोध किया और कहा कि जब बैठक में भ्रष्टाचार के गंभीर मुद्दे उठ रहे हैं, तो प्रशासन पत्रकारों से क्यों डर रहा है?
- सीडीओ पर आरोप लगा कि वे भ्रष्टाचार में लिप्त अधिकारियों का बचाव कर रहे हैं, जो खुद किसानों के हितैषी होने का दावा करते हैं।
- पूर्व सांसद हरीश द्विवेदी ने भी बैठक के दौरान पत्रकारों को हटाने की बात कही थी, जिसके बाद उन्हें बाद में अपनी गलती पर अफसोस करना पड़ा था।
कालाबाजारी और बेबस किसान
बैठक में खाद की कालाबाजारी का मुद्दा बेहद गंभीरता से उठा। 400 रुपये में किसानों को निजी दुकानों से खाद खरीदने पर मजबूर किया जा रहा है। सवाल उठता है कि जब एआर और जिला कृषि अधिकारी सब जानते हुए भी कार्रवाई नहीं कर रहे, तो क्या वे इस भ्रष्टाचार में भागीदार नहीं हैं?
दीवान चंद्र चौधरी ने सदन में सबसे मुखर होकर खाद की कालाबाजारी का मुद्दा उठाया। उन्होंने आरोप लगाया कि:
- सहकारी समितियों से खाद गायब है और निजी दुकानों पर किसानों को 400 रुपये तक में खाद खरीदने को मजबूर किया जा रहा है।
- इस पूरे खेल में एआर (AR) और जिला कृषि अधिकारी की भूमिका संदिग्ध है, क्योंकि वीडियो प्रमाण होने के बावजूद कोई कार्रवाई नहीं की गई।
- होलसेलर्स के साथ मिलीभगत के कारण निजी विक्रेताओं को संरक्षण मिल रहा है।
निष्कर्ष: दिखावा या बदलाव की शुरुआत?
जिले के सबसे बड़े सदन में भ्रष्टाचार पर हुआ यह ‘हमला’ क्या केवल एक रस्म अदायगी बनकर रह जाएगा? जब विकास भवन के भीतर ही अधिकारी इतने बेखौफ होकर भ्रष्टाचार का बचाव करेंगे, तो आम आदमी की सुनवाई कहां होगी? जनप्रतिनिधियों का यह आक्रोश तभी सार्थक माना जाएगा जब दोषियों के खिलाफ केवल ‘चेतावनी’ ही नहीं, बल्कि कठोर दंडात्मक कार्रवाई सुनिश्चित होगी।
यह पूरी बैठक यह दर्शाती है कि जिले की प्रशासनिक व्यवस्था गहरे संकट में है। जब जनता के चुने हुए प्रतिनिधि सदन के भीतर भ्रष्टाचार के खिलाफ एक स्वर में आवाज उठाते हैं और अधिकारी उसे दबाने या छिपाने की कोशिश करते हैं, तो यह सीधे तौर पर सुशासन के दावों पर प्रश्नचिह्न लगाता है। अब देखना यह है कि क्या यह केवल एक राजनीतिक ‘हंगामा’ बनकर रह जाएगा या वास्तव में दोषियों पर कार्रवाई होगी?






















