

🔥 देवबंद में बयान पर बवाल: “आतंकवाद का कोई धर्म नहीं होता” कहना पड़ा भारी, वायरल वीडियो से दबाव बढ़ा और ईमानदार इंस्पेक्टर नरेंद्र शर्मा — सोशल मीडिया पर तूफ़ान, समर्थन में उमड़ा जनसैलाब 🚨
देवबंद, सहारनपुर। थाना प्रभारी निरीक्षक नरेंद्र शर्मा का एक सामान्य, तथ्यात्मक और पूरी तरह निष्पक्ष बयान—“आतंकी किसी भी धर्म के हो सकते हैं, अपराधी केवल अपराधी होता है”—सोशल मीडिया पर अचानक तीखे विवाद का रूप ले बैठा। यह बयान वर्षों से सुरक्षा एजेंसियों, सेना, खुफिया विभाग और राष्ट्रीय सुरक्षा विशेषज्ञों द्वारा दोहराई जाने वाली वास्तविकता ही थी, लेकिन वीडियो वायरल होते ही कुछ कट्टरपंथी और उग्र हिंदुत्ववादी सोशल मीडिया अकाउंट्स ने इसे घुमा-फिराकर पेश किया और ऐसा माहौल बनाया जैसे इंस्पेक्टर शर्मा ने कोई गंभीर अपराध कर दिया हो। आरोपों और ट्रोलिंग के दबाव में प्रशासन ने उन्हें तुरंत लाइनहाज़िर कर दिया, जबकि वीडियो में कही गई बात में कहीं भी कोई आपत्तिजनक या विवादास्पद तत्व नहीं था। शर्मा ने केवल यह बताया था कि देश में DRDO, एयरफोर्स, सेना और अन्य संस्थानों में काम करने वाले विभिन्न धर्मों के कई लोग ISI के लिए जासूसी करते पकड़े गए—और यह पूरी तरह दस्तावेज़ित तथ्य है। इसके बावजूद, सोशल मीडिया ने इस सामान्य बयान को ऐसा मोड़ा कि मानो यह किसी खास समुदाय के विरुद्ध या पक्ष में दिया गया हो। इसी बीच बड़ी संख्या में आम नागरिक, सामाजिक कार्यकर्ता और पुलिसकर्मी उनके समर्थन में उतर आए और कहा कि “समस्या तुम्हारे धर्म से नहीं, समस्या इससे है कि तुम हमसे कितनी नफ़रत करते हो। तुम चाहते हो कि सच बोलना भी अपराध बन जाए।” लोगों ने प्रशासन पर सवाल उठाते हुए कहा कि क्या अब अधिकारी सच भी नहीं बोल सकते? क्या हर शब्द की राजनीतिक व्याख्या होगी? क्या “आतंकवाद का कोई धर्म नहीं” कहना भी अपराध है? इंस्पेक्टर शर्मा की ईमानदार और सख्त छवि का एक बड़ा उदाहरण यह भी है कि सरसावा में पोस्टिंग के दौरान उन्होंने हिंदू योद्धा परिवार संगठन के संचालक विष कंबोज को गौ-वंश के नाम पर लोगों को भड़काने, शांति व्यवस्था खराब करने और कई संगीन धाराओं में जेल भेजा था। इस कार्रवाई को लेकर उनकी कार्यशैली की पूरे जिले में सराहना हुई थी। यही कारण है कि आज जब उनके खिलाफ गलत नैरेटिव चलाकर कार्रवाई कराई गई, तो लोग इसे खुला अन्याय मान रहे हैं। यह पूरा घटनाक्रम यह भी दर्शाता है कि सोशल मीडिया ट्रेंड अब पुलिस अधिकारियों की पोस्टिंग और उनके करियर को प्रभावित करने लगे हैं। बड़ा सवाल यह है कि क्या अब अधिकारी सच बोलने से डरेंगे? क्या हम उस दौर में प्रवेश कर रहे हैं जहां तथ्यों को भी विवादित बना दिया जाए? देवबंद का यह मामला केवल एक अधिकारी का मुद्दा नहीं, बल्कि प्रशासनिक स्वतंत्रता, ईमानदार आवाज़ और सोशल मीडिया के बढ़ते प्रभाव पर गंभीर प्रश्नचिह्न है।
✍️ रिपोर्ट — ALICK SINGH, EDITOR – VANDE BHARAT LIVE TV NEWS
📞 संपर्क: 8217554083
















