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‘साहब’ खुद नहीं, अब ‘अर्दली’ और ‘पेशकार’ के जरिए लेते हैं रिश्वत: प्रशासनिक तंत्र पर उठते सवाल

08 Jul 2026, 10:50 AM • Vande Bharat Live TV News
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​अजीत मिश्रा (खोजी)

‘साहब’ खुद नहीं, अब ‘अर्दली’ और ‘पेशकार’ के जरिए लेते हैं रिश्वत: प्रशासनिक तंत्र पर उठते सवाल

  • क्या ‘अर्दली’ और ‘पेशकार’ तय कर रहे हैं सरकारी फैसले? प्रशासनिक व्यवस्था पर एक तल्ख टिप्पणी
  • भ्रष्टाचार की काली कमाई: रुसवा करता पैसा और गिरती प्रशासनिक गरिमा

बस्ती। प्रशासनिक अधिकारियों का पद समाज में प्रतिष्ठा, विश्वास और न्याय का प्रतीक माना जाता है। लेकिन वर्तमान समय में प्रशासनिक तंत्र में व्याप्त भ्रष्टाचार ने इस गरिमा को गहरा आघात पहुँचाया है। आज स्थिति यह हो गई है कि कई अधिकारी अपनी छवि बचाने के लिए खुद रिश्वत लेने के बजाय अपने ‘अर्दली’ और ‘पेशकार’ का सहारा ले रहे हैं।

अधिकारियों की गिरती साख

आज के प्रशासनिक अधिकारियों ने अपना नैतिक स्तर इतना गिरा लिया है कि उन्हें जनता से वह मान-सम्मान नहीं मिल पा रहा है, जिसके वे हकदार थे। जब कोई अधिकारी अपने अधीनस्थों के माध्यम से अनुचित लाभ उठाता है, तो वह न केवल जनता की नजरों में गिरता है, बल्कि उन लोगों की नजरों में भी अपनी साख खो देता है जिनसे उसने रिश्वत ली है।

अमानवीय व्यवहार और भ्रष्टाचार का चक्र

राजस्व और चकबंदी विभाग में न्याय पाने की चाह में लोग अपनी जमा-पूंजी और सांसें तक गंवा देते हैं। आज के कई अधिकारी इस हद तक गिर चुके हैं कि वे न केवल रिश्वत लेते हैं, बल्कि काम के बदले पैसे लेने के बाद भी फरियादियों को परेशान करते हैं। ऐसी स्थिति में, यदि कोई फरियादी किसी अधिकारी से पीड़ित होता है, तो वह अधिकारी के प्रति श्रद्धा रखने के बजाय उनका विरोध करने पर मजबूर हो जाता है।

ईमानदारी का अभाव और संस्कार

पहले भी ऐसे अधिकारी रहे हैं जो अपनी ईमानदारी और मानवीय संवेदनाओं के लिए याद किए जाते हैं। ऐसे अधिकारी न केवल गरीब किसानों की मदद करते थे, बल्कि किसी की मजबूरी का फायदा उठाने के बजाय उन्हें अपनी जेब से सहायता भी प्रदान करते थे। ईमानदारी कोई बाजार में बिकने वाली वस्तु नहीं है, बल्कि यह एक संस्कार है जो विरासत में मिलता है। माता-पिता अपने बच्चों को ईमानदारी और मेहनत का पाठ पढ़ाकर ही नौकरी के लिए विदा करते हैं, लेकिन व्यवस्था में आने के बाद कुछ अधिकारी अपने पद की गरिमा भूलकर भ्रष्टाचार की राह अपना लेते हैं।

  • भ्रष्टाचार का गिरता स्वरूप: कई अधिकारी अब खुद रिश्वत नहीं लेते, बल्कि अपने अधीनस्थों का उपयोग करते हैं, जिससे वे न केवल जनता, बल्कि अपने कर्मचारियों की नजरों में भी गिर जाते हैं।
  • पारिवारिक मूल्यों पर असर: इस भ्रष्टाचार का सबसे दुखद पहलू यह है कि अधिकारी के घर में भी उनकी साख कम होती है। जब अधिकारी का अपना बच्चा उसे भ्रष्टाचार में लिप्त पाता है, तो एक पिता के रूप में उसका सम्मान खत्म हो जाता है।
  • आदर्श का उदाहरण: लेख में कीर्तिप्रकाश भारती जैसे अधिकारियों को याद किया गया है, जो न केवल ईमानदार थे, बल्कि गरीब फरियादियों की आर्थिक मदद भी करते थे। उनके कार्यकाल में न तो अर्दली की मनमानी चलती थी और न ही पेशकार की।
  • ईमानदारी एक संस्कार है: यह स्पष्ट है कि ईमानदारी कोई बाजार में बिकने वाली वस्तु नहीं है, बल्कि यह संस्कारों और विरासत से आती है। माता-पिता तो अपनी संतान को मेहनत और ईमानदारी का पाठ पढ़ाकर ही नौकरी पर भेजते हैं, लेकिन व्यवस्था में आकर अधिकारियों का बदलना चिंताजनक है।

परिवार पर पड़ने वाला दुष्प्रभाव

भ्रष्टाचार का सबसे दुखद पहलू पारिवारिक जीवन पर पड़ता है। जो अधिकारी अपनी कुर्सी का दुरुपयोग करते हैं, उनका सबसे बड़ा अपमान उनके अपने घर में होता है। जब एक बेटा अपने पिता को भ्रष्टाचार में लिप्त देखता है, तो पिता के प्रति उसका सम्मान समाप्त हो जाता है।

निष्कर्ष

लेख का स्पष्ट संदेश है कि यदि अधिकारी अपनी कार्यशैली नहीं बदलते और न्याय की कुर्सी की गरिमा को नहीं समझते, तो वे समाज और परिवार दोनों की नजरों में रुसवा होंगे। समय की मांग है कि प्रशासनिक अधिकारी जन-सेवा के मूल उद्देश्य को समझें और भ्रष्टाचार के इस जाल से खुद को बाहर निकालें।

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