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पुत्रों के दीर्घायु के लिए माताओं ने किया जीवित्पुत्रिका पर निर्जला व्रत

चिली ने सियारी को सुनाई थी जीवित्पुत्रिका व्रत की कथा

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गडहनी। आश्विन मास के कृष्ण पक्ष अष्टमी को मनाये जाने वाले जीवित्पुत्रिका का व्रत प्रखण्ड क्षेत्र के विभिन्न गाँव कस्बो मे विधि विधान के साथ मनाया गया।इस अवसर पर माताओं ने अपने पुत्र के दीर्घायु की कामना को लेकर निर्जला व्रतोपवास रख भगवान जीमूतवाहन की पूजा अर्चना कर कथा श्रवण की।पण्डित अमरेन्द्र कुमार मिश्र एवं राजीव रंजन मिश्र ने जीवित्पुत्रिका व्रत के महत्व के बारे मे बताते हुए कहा कि जीवितपुत्रिका व्रत आश्विन मास की कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि को किया जाने वाला व्रत है। मान्यता है कि माताएं अपनी संतान के लंबे व स्वस्थ जीवन के लिये इस व्रत को करती हैं।पौराणिक ग्रंथों के अनुसार इस व्रत का संबंध महाभारत से माना जाता है। कथा के अनुसार अपने पिता की हत्या का प्रतिशोध लेने के लिये अश्वत्थामा पांडवों के वंश का नाश करने के अवसर ढुंढता है। एक दिन मौका पाकर उसने पांडव समझते हुए द्रौपदी के पांच पुत्रों की हत्या कर दी। उसके इस कृत्य की बदौलत अर्जुन ने अश्वत्थामा को बंदी बना लिया और उससे उसकी दिव्य मणि छीन ली। लेकिन इसके पश्चात अश्वत्थामा का क्रोध और बढ़ गया और उसने उत्तरा की गर्भस्थ संतान पर ब्रह्मास्त्र का प्रयोग किया जिसे रोक पाना असंभव था। लेकिन उस संतान का जन्म लेना भी अत्यावश्यक था। तब भगवान श्री कृष्ण ने अपने समस्त पुण्यों का फल उत्तरा को समर्पित किया जिससे गर्भ में मृत संतान को जीवन मिला। मृत्योपरांत जीवनदान मिलने के कारण ही इस संतान को जीवित्पुत्रिका कहा गया।यह संतान कोई और नहीं बल्कि राजा परीक्षित ही थे। उसी समय से आश्विन अष्टमी को जीवित्पुत्रिका व्रत के रूप में मनाया जाता है।इस दिन भगवान जीमूतवाहन व गरूड की पूजा अर्चना की जाती है।वहीं कालांतर में इसमें कई कथाएं जुड़ी। गंधर्वराज जिमुतवाहन के त्याग व गरूड़ से सर्प माता के इकलौते पुत्र की रक्षा की कहानी भी प्रेरणा का स्रोत रहा है।लोकमत में चिली व सियारी की कथा बहुत प्रचलित हुई।चिली ने सियारी को जीवित्पुत्रिका की कथा सुनाई। कैसे सत्यनिष्ठ होकर चिली ने अपने सात पुत्रों की रक्षा की जो इस कलिकाल मे प्रेरणास्त्रोत बनी और तब से सभी माताएं अपने पुत्रों के लिए तीन दिवसीय जीवित्पुत्रिका अर्थात जितिया व्रत रखती है और पुत्रों के दीर्घायु जीवन की कामना करती हैं।इसे सबसे कठिन वर्तों में शुमार किया जाता है।व्रतोपवास करने वाली माताओं मे अराधना देवी, माया देवी, बिन्दु देवी, कुसुम देवी, शालिनी मिश्रा, पुनम देवी, ममता देवी, माया देवी बडहरा सहित हजारों महिलायें शामिल रहीं।

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