?php echo do_shortcode('[t4b-ticker]'); ?
A2Z सभी खबर सभी जिले की

अध्यादेश या कानून से नहीं बढ़ाया जा सकता ग्राम प्रधानों का कार्यकाल, इलाहाबाद हाईकोर्ट ने संवैधानिक व्यवस्था पर दिया स्पष्ट संदेश

FB IMG 1783356098508

वंदे भारत लाइव टीवी न्यूज
प्रयागराज। ग्राम पंचायतों के कार्यकाल और पंचायत चुनाव को लेकर इलाहाबाद हाईकोर्ट की महत्वपूर्ण टिप्पणी एक बार फिर चर्चा में है। न्यायालय ने स्पष्ट किया कि संविधान में निर्धारित अवधि से अधिक ग्राम प्रधानों का कार्यकाल केवल अध्यादेश, शासनादेश या सामान्य कानून के माध्यम से नहीं बढ़ाया जा सकता। पंचायतों का कार्यकाल समाप्त होने से पहले नियमानुसार चुनाव कराना राज्य की संवैधानिक जिम्मेदारी है।
मामले की सुनवाई के दौरान न्यायालय ने यह स्पष्ट किया कि भारतीय संविधान के अनुच्छेद 243-ई के अनुसार पंचायतों का कार्यकाल पहली बैठक की तिथि से अधिकतम पाँच वर्ष का होता है। इस अवधि को प्रशासनिक आदेशों या सामान्य अधिसूचनाओं के माध्यम से बढ़ाना संविधान की भावना के अनुरूप नहीं माना जा सकता।
सरकार और राज्य निर्वाचन आयोग का पक्ष
सुनवाई के दौरान राज्य निर्वाचन आयोग की ओर से अदालत को बताया गया कि आयोग पंचायत चुनाव कराने के लिए तैयार है। वहीं राज्य सरकार की ओर से यह पक्ष रखा गया कि अन्य पिछड़ा वर्ग (ओबीसी) आरक्षण से संबंधित प्रक्रिया पूरी होने के बाद चुनाव कराने का निर्णय लिया जाएगा। सरकार ने आयोग की रिपोर्ट आने तक चुनाव प्रक्रिया स्थगित रखने का अनुरोध किया।
आरक्षण का मुद्दा भी रहा प्रमुख
मामले में ओबीसी आरक्षण से जुड़े विवाद का भी उल्लेख हुआ। न्यायालय के समक्ष यह तथ्य रखा गया कि आरक्षण की स्थिति स्पष्ट होने के बाद ही पंचायत चुनाव कराए जाएंगे। हालांकि अदालत ने यह भी दोहराया कि संवैधानिक व्यवस्था के तहत पंचायत चुनाव अनावश्यक रूप से टाले नहीं जा सकते।
संवैधानिक व्यवस्था पर कोर्ट की टिप्पणी
न्यायालय ने कहा कि संविधान में पंचायतों के कार्यकाल की स्पष्ट सीमा निर्धारित है और लोकतांत्रिक संस्थाओं के नियमित चुनाव लोकतंत्र की मूल भावना का हिस्सा हैं। यदि किसी कारण से चुनाव में विलंब होता है, तो भी यह अपने आप कार्यकाल बढ़ाने का आधार नहीं बन सकता।
क्यों महत्वपूर्ण है यह फैसला?
इस निर्णय को पंचायत व्यवस्था और स्थानीय स्वशासन की दृष्टि से महत्वपूर्ण माना जा रहा है। इससे यह संदेश मिलता है कि निर्वाचित पंचायतों का कार्यकाल संवैधानिक प्रावधानों से नियंत्रित होगा और कार्यकाल बढ़ाने के लिए संविधान के विपरीत कोई प्रशासनिक या विधायी उपाय स्वीकार्य नहीं होगा।
निष्कर्ष
इलाहाबाद हाईकोर्ट की टिप्पणी पंचायत चुनावों की समयबद्धता और संवैधानिक मर्यादा को रेखांकित करती है। हालांकि, इस विषय में किसी भी आदेश या निर्णय की वर्तमान कानूनी स्थिति समय के साथ बदल सकती है। इसलिए यदि इस मामले पर नवीनतम स्थिति जाननी हो, तो संबंधित न्यायालय के आदेश, राज्य निर्वाचन आयोग अथवा राज्य सरकार की आधिकारिक जानकारी को देखना आवश्यक होगा।

Jitendra Maurya

Vande Bharat Live TV News District Head Ghazipur Uttar Pradesh India
Back to top button
error: Content is protected !!