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बस्ती का ‘मायावी’ टेंडर: फाइलें दौड़ीं सरपट, प्यासी जनता अब भी ‘वेटिंग’ पर!

22 लाख की मलाई और तकनीकी 'खामियों' का तड़का, जलकल विभाग का अनोखा खेल!

अजीत मिश्रा (खोजी)

बस्ती का ‘अमृत’ जल: टेंडर-टेंडर का खेल, जनता प्यासी और बाबू मेल!

ब्यूरो: बस्ती मंडल, उत्तर प्रदेश

  • नलकूप के नसीब में फिर से ‘निविदा’: मानकों की आड़ या किसी ‘खास’ का इंतज़ार?  
  • पाइपलाइन बिछने से पहले ‘सेटिंग’ की लाइन बिछी, निरस्त टेंडर ने खोली पोल!  
  • नगर पालिका की ‘यू-टर्न’ नीति: महीने भर की कसरत के बाद टेंडर फिर शून्य पर!  

बस्ती। शहर की प्यास बुझाने का इरादा नेक है, लेकिन इरादे से ज्यादा ‘इशारे’ नेक होने चाहिए। नगर पालिका और जलकल विभाग के गलियारों में इन दिनों ‘टेंडर-टेंडर’ का बड़ा ही रोचक खेल खेला जा रहा है। खेल ऐसा कि दर्शक (जनता) दीर्घा में बैठकर प्यास से गला सुखा रही है और खिलाड़ी (अधिकारी व रसूखदार) मैदान में फाइलें दौड़ा रहे हैं।

​मामला 22 लाख रुपये का है। इसमें ओवरहेड टैंक का कायाकल्प होना था, पाइपलाइन बिछनी थी और नलकूपों को नई ‘जवानी’ मिलनी थी। एक महीना पहले बड़े ढोल-नगाड़ों के साथ टेंडर निकाला गया। उम्मीद थी कि अब नल से जल टपकेगा, लेकिन टपक गई तो केवल ‘कमियां’! ऐन वक्त पर हुक्मरानों को याद आया कि टेंडर में ‘तकनीकी खामियां’ हैं।

व्यंग्य का कोना: जानकार कहते हैं कि ये ‘खामियां’ तकनीकी नहीं, बल्कि ‘इच्छाशक्ति’ वाली थीं। शायद वह ‘खास चेहरा’ आवेदन नहीं कर पाया था, जिसे यह मलाई खिलाई जानी थी। इसीलिए खेल बिगाड़ दिया गया ताकि बिसात दोबारा बिछाई जा सके।

 

​अब फिर से वही टेंडर निकाला गया है। मानक वही हैं, शहर वही है और समस्या भी वही। बदला है तो बस वक्त, जो जनता का बर्बाद हो रहा है। शहर के लोग चक्कर काट रहे हैं कि कब उनके घर के सूखे नलों में हलचल होगी, लेकिन विभाग अभी ‘मानक’ और ‘जांच’ के उलझे धागों को सुलझाने का अभिनय कर रहा है।

​ईओ साहब का कहना है कि मानकों पर आवेदन नहीं थे इसलिए निरस्त किए गए। अब सवाल यह है कि पहली बार टेंडर क्या किसी नौसिखिए ने बनाया था जो उसमें इतनी गलतियां रह गईं? या फिर यह जानबूझकर छोड़ी गई ‘खिड़कियां’ थीं, ताकि जब तक मनचाहा ठेकेदार न आए, तब तक दरवाजा बंद रखा जाए?

​बस्ती की जनता अब यह समझने लगी है कि विकास की गाड़ी पहियों पर नहीं, बल्कि ‘सेटिंग’ के पेट्रोल पर चलती है। जब तक ‘खास व्यक्ति’ की मुहर नहीं लगेगी, तब तक नलकूप भी चुप्पी साधे रहेंगे। फिलहाल, 22 लाख का यह टेंडर फिर से मैदान में है, देखते हैं इस बार ‘तकनीकी’ जीतती है या ‘तगड़ी सिफारिश’!

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