
हर्रैया का सियासी संग्राम: क्या भाजपा स्वीकार करेगी राजकिशोर सिंह का ‘वजूद’?
गोरखपुर-अवध के 'भाजपा संस्कार' में कितना फिट बैठेंगे राजकिशोर सिंह? अजय सिंह की 'हैट्रिक' की राह में राजकिशोर बने दीवार, किसका कटेगा टिकट?
अजीत मिश्रा (खोजी)
हर्रैया का सियासी संग्राम : क्या भाजपा स्वीकार करेगी राजकिशोर सिंह को?
- दो दिग्गजों की लड़ाई में कहीं ‘तीसरा’ न मार ले जाए बाजी!
- सिटिंग विधायक अजय सिंह का टिकट काटना भाजपा के लिए नहीं होगा आसान।
- सोशल मीडिया की रायशुमारी से जमीनी बगावत तक: कितनी तैयार है हर्रैया भाजपा?
- दलों के सफर के बाद भाजपा की चौखट पर राजकिशोर, क्या मक़सद होगा पूरा?
- जैसे-जैसे नजदीक आएगा चुनाव, हर्रैया की सियासत का बढ़ेगा सस्पेंस।
बस्ती। उत्तर प्रदेश की राजनीति में ‘हर्रैया विधानसभा’ हमेशा से ही एक बेहद संवेदनशील और हाई-प्रोफाइल सीट रही है। लेकिन इस बार यहाँ की सियासी फिजाओं में जो सुगबुगाहट है, उसने न सिर्फ स्थानीय कार्यकर्ताओं बल्कि राजधानी में बैठे राजनीतिक पंडितों को भी सोचने पर मजबूर कर दिया है। सवाल बड़ा है—क्या भाजपा स्वीकार करेगी राजकिशोर सिंह को?
भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) के बारे में अक्सर कहा जाता है कि उसके ‘संस्कार’ और ‘कैडर-बेस्ड’ कार्यशैली की धमक गोरखपुर और अवध क्षेत्र में सबसे मुखर होकर दिखाई देती है। यहाँ संगठन सर्वोपरि है और बाहरी नेताओं को पचा पाना पार्टी के मूल कार्यकर्ताओं के लिए इतना आसान नहीं होता। लेकिन राजनीति संभावनाओं का खेल है, और मौजूदा दौर की बदलती करवटें यह इशारा कर रही हैं कि भाजपा को भी इस बार हर्रैया के समीकरणों के लिए राजकिशोर सिंह के नाम पर बेहद संजीदगी से विचार करना पड़ सकता है।
भाजपा में आने का क्या है मक़सद?
तीन बार के पूर्व कैबिनेट मंत्री राजकिशोर सिंह का हर्रैया की जमीन पर अपना एक अलग मजबूत जनाधार रहा है। कई दलों का सफर तय करने के बाद उनका भाजपा का दामन थामना महज एक संयोग नहीं, बल्कि एक सोची-समझी राजनीतिक बिसात है। उनका सीधा मक़सद अपनी खोई हुई सियासी जमीन को वापस पाना और हर्रैया की राजनीति के केंद्र में दोबारा स्थापित होना है। लेकिन यहाँ उनके सामने सबसे बड़ी चुनौती ‘अपनों’ से ज्यादा ‘पार्टी के भीतर’ स्थापित चेहरों से है।
क्या वर्तमान विधायक का टिकट काट पायेंगे?
वर्तमान भाजपा विधायक अजय सिंह को कम आंकना किसी भी मायने में समझदारी नहीं होगी। वे लगातार दो बार (2017 और 2022) से इस सीट पर कमल खिला रहे हैं। विधानसभा में उनकी पकड़, संगठन में उनकी पैठ और जनता के बीच ‘एंटी-इन्कंबेंसी’ को मात देने का हुनर उनके पक्ष में जाता है। अजय सिंह का टिकट काटना भाजपा के शीर्ष नेतृत्व के लिए भी बिल्कुल आसान नहीं होगा, क्योंकि सिटिंग विधायक का टिकट काटने के लिए पार्टी को किसी बहुत बड़े ‘विंडेबिलिटी फैक्टर’ या आंतरिक सर्वे की जरूरत होगी।
सोशल मीडिया पर जंग और जनता का मूड
हाल ही में सोशल मीडिया पर दोनों नेताओं के समर्थकों के बीच चली ‘रायशुमारी’ (जैसा कि अखबार की कतरनों में भी दिख रहा है) ने इस लड़ाई को और हवा दे दी है। भले ही ये डिजिटल पोल किसी चुनाव के अंतिम परिणाम तय नहीं करते, लेकिन ये कार्यकर्ताओं के अति-उत्साह और आने वाले समय में होने वाले भितरघात या अंतर्कलह का संकेत जरूर दे देते हैं।
सियासी पेंच: हर्रैया का चुनावी मौसम इतनी तेजी से गर्म हो रहा है कि इन दोनों दिग्गजों (अजय सिंह बनाम राजकिशोर सिंह) की आपसी वर्चस्व की लड़ाई का नुकसान पार्टी को भी उठाना पड़ सकता है। राजनीतिक गलियारों में यह चर्चा भी जोरों पर है कि कहीं ‘दो बिल्लियों की लड़ाई में बंदर बाजी न मार ले जाए’, यानी दोनों की जंग में कहीं कोई तीसरा चेहरा टिकट की रेस में आगे न निकल जाए।
निष्कर्ष: रहस्य का बढ़ता दायरा
जैसे-जैसे चुनाव की घड़ी नजदीक आएगी, हर्रैया का यह सियासी सस्पेंस और गहराता जाएगा। एक तरफ जहाँ अजय सिंह के सामने अपनी हैट्रिक बचाने और टिकट बरकरार रखने की चुनौती है, वहीं दूसरी तरफ राजकिशोर सिंह के वजूद और उनकी ‘खास’ राजनीतिक साख की परीक्षा है। क्या भाजपा अपने मूल कैडर और सिटिंग विधायक पर भरोसा जताएगी या राजकिशोर सिंह के बड़े जनाधार के सहारे नए समीकरण गढ़ेगी? यह तो आने वाला वक्त ही बताएगा, लेकिन इतना तय है कि हर्रैया की यह ‘नूराकुश्ती’ इस बार बेहद दिलचस्प होने वाली है।

















