उत्तर प्रदेशबस्ती

डिप्टी सीएमओ रैंक के अधिकारियों को कंट्रोल रूम में बैठना पड़ रहा है, जबकि एक अदने से बाबू पर लुटाया जा रहा है सरकारी खजाना

मृतक आश्रित के नियमों को दरकिनार कर प्रदीप कुमार की नियुक्ति न सिर्फ कराई गई, बल्कि उसके पांच लाख रुपये के देयकों का भुगतान भी करवा दिया गया। जब इसकी जांच हुई, तो प्रमोद कुमार मिश्र और तत्कालीन सीएमओ कुशवाहा दोनों ही दोषी पाए गए। जांच टीम ने दोनों के खिलाफ विधिक और अनुशासनात्मक कार्रवाई की संस्तुति दी थी, लेकिन बाद में इस मामले को पूरी तरह रफा-दफा कर दिया गया।

अजीत मिश्रा (खोजी)

भ्रष्ट बाबू ‘प्रमोद मिश्र’ पर मेहरबान सीएमओ: नियमों को ताक पर रखकर दी ‘फाइव स्टार’ जैसी सुविधाएं, करोड़ों के फर्जीवाड़े का खुलासा

  • गोरखपुर में फर्जीवाड़े के दोषी बाबू को बस्ती में ज्वाइन करते ही मिला नया कमरा, एसी और सोफा
  • ढूड़ा (DUDA) में 250 से अधिक फर्जी नियुक्तियों और करोड़ों के घोटाले का मामला
  • जांच में दोषी पाए जाने के बावजूद तत्कालीन सीएमओ और बाबू पर मेहरबानी, मामला रफा-दफा

बस्ती: गोरखपुर में फर्जीवाड़े के दोषी पाए गए बाबू प्रमोद कुमार मिश्र की कारगुजारियों और भ्रष्टाचार का एक बड़ा मामला सामने आया है। गोरखपुर में पांच साल तक एक भी पटल न पाने वाले इस बाबू की प्रतिभा को पहचानते ही बस्ती के सीएमओ इस कदर मेहरबान हुए कि उसके लिए सरकारी खजाने के सारे नियम ताक पर रख दिए गए।

नया कमरा, एसी और सोफे की विशेष व्यवस्था

​बस्ती में ज्वाइन करते ही इस बाबू को नया कमरा, नया एसी और आराम करने के लिए नया सोफा उपलब्ध कराया गया। हैरानी की बात यह है कि इसी महकमे में तैनात पांच डिप्टी सीएमओ रैंक के अधिकारियों को या तो कंट्रोल रूम में बैठना पड़ता है या फिर एक ही कमरे में कई अधिकारियों को साझा बैठना पड़ता है। जब एसी और सोफा नियमों के दायरे में ही नहीं था, तब एक अदने से बाबू के विलासिता पर इतना भारी-भरकम सरकारी धन क्यों खर्च किया गया, यह बड़ा सवाल बना हुआ है।

​डूडा (DUDA) में फर्जी नियुक्तियों का खेल

​सूत्रों के अनुसार, यह वही बाबू है जिसने अपनी पिछली तैनाती (17-21) के दौरान ढूड़ा के अधिकारियों के साथ मिलकर बिना किसी योग्यता और मानक के लगभग 250 लोगों की अवैध नियुक्तियां करवाई थीं। इस गोरखधंधे में प्रत्येक लाभार्थी से 80 हजार से एक लाख रुपये तक वसूले गए। तत्कालीन सीएमओ डॉ. जेएलएम कुशवाहा के कार्यकाल में हुए इस दो से ढाई करोड़ रुपये के खेल में प्रत्येक लाभार्थी पर 20-20 हजार और बाबू के हिस्से में 10-10 हजार रुपये आए।

जांच में दोषी पाए जाने के बावजूद रफा-दफा हुआ मामला

​मृतक आश्रित के नियमों को दरकिनार कर प्रदीप कुमार की नियुक्ति न सिर्फ कराई गई, बल्कि उसके पांच लाख रुपये के देयकों का भुगतान भी करवा दिया गया। जब इसकी जांच हुई, तो प्रमोद कुमार मिश्र और तत्कालीन सीएमओ कुशवाहा दोनों ही दोषी पाए गए। जांच टीम ने दोनों के खिलाफ विधिक और अनुशासनात्मक कार्रवाई की संस्तुति दी थी, लेकिन बाद में इस मामले को पूरी तरह रफा-दफा कर दिया गया।

  • अवैध नियुक्तियों का खेल: गोरखपुर में पांच साल तक कोई पटल न पाने वाले बाबू प्रमोद कुमार मिश्र पर बस्ती के सीएमओ इस कदर मेहरबान हुए कि ज्वाइन करते ही उसे नया कमरा, एसी और नया सोफा उपलब्ध करा दिया गया।
  • नियमों को ताक पर रखकर सहूलियतें: जिन पांच डिप्टी सीएमओ रैंक के अधिकारियों को कंट्रोल रूम या एक ही कमरे में बैठना पड़ता है, उसी विभाग में एक अदने से बाबू के लिए सरकारी खजाने से एसी और सोफे पर पानी की तरह पैसा बहाया गया।
  • ढूड़ा (DUDA) के जरिए फर्जीवाड़ा: बस्ती में तैनाती के दौरान इसी बाबू ने ढूड़ा के अधिकारियों के साथ मिलकर योग्यता और मानकों को ताक पर रखकर लगभग 250 लोगों की अवैध नियुक्तियां कराईं।
  • लाखों की अवैध वसूली: इन नियुक्तियों के एवज में प्रत्येक लाभार्थी से 80 हजार से एक लाख रुपये तक की अवैध वसूली की गई, जिसमें से तत्कालीन सीएमओ डॉ. जेएलएम कुशवाहा और बाबू के बीच बकायदा हिस्सेदारी का खेल चला।
  • दो से ढाई करोड़ का घोटाला: इस पूरे खेल में दो से ढाई करोड़ रुपये का वारा-न्यारा हुआ, जिसमें प्रमोद कुमार मिश्र और ढूड़ा के जिम्मेदार अधिकारियों की मुख्य भूमिका रही।
  • मामला रफा-दफा: जांच टीम द्वारा प्रमोद कुमार मिश्र और तत्कालीन सीएमओ को दोषी पाए जाने के बावजूद, कड़ी कार्रवाई की संस्कृति को दरकिनार कर मामले को ऊपर ही ऊपर रफा-दफा कर दिया गया।
  • संरक्षण का सवाल: सवाल यह उठता है कि आखिर एनएचआरएम के डॉ. बृजेश शुक्ल और स्टोर इंचार्ज अजय मिश्र द्वारा गोरखपुर से लाए गए इस दागी बाबू पर उच्चाधिकारियों की इतनी अनुकंपा क्यों है, और क्या ऐसे भ्रष्ट तत्वों के हाथों में जनता का स्वास्थ्य महकमा सुरक्षित रह पाएगा?

किसके संरक्षण में फल-फूल रहा है भ्रष्टाचार?

​चर्चा यह भी है कि एनएचआरएम के डॉ. बृजेश शुक्ल और स्टोर इंचार्ज अजय मिश्र द्वारा इस दागी बाबू को गोरखपुर से बस्ती लाया गया था। सवाल यह उठ रहा है कि क्या प्रमोद कुमार मिश्र जैसे दागी और भ्रष्ट बाबू के हाथों में स्वास्थ्य विभाग का कोई भी पटल सुरक्षित रह सकता है? विभाग के उच्चाधिकारियों की इस चुप्पी और मेहरबानी से साफ जाहिर होता है कि इस भ्रष्टाचार के पीछे की मंशा क्या है।

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