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कसडोल की नर्स की खामोश मौत, सिस्टम की चीखती नाकामी

अभिलाषा की मौत नहीं, समाज और प्रशासन की हार

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बलौदा बाजार जिले के विकासखंड कसडोल से सामने आई नर्स अभिलाषा जॉन की मौत केवल एक आत्महत्या नहीं, बल्कि उन तमाम सवालों की चीख है जो आज भी प्रशासन, समाज और व्यवस्था से टकराकर अनसुने रह जाते हैं। कसडोल सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र में कार्यरत अभिलाषा जॉन, जो हाल ही में नाइट शिफ्ट पूरी करने के बाद अचानक संपर्क से बाहर हो गई थी, उसकी खामोशी ने पूरे जिले को झकझोर कर रख दिया। पूरे दिन कॉल किए गए, लेकिन फोन नहीं उठा। शाम होते-होते जो खबर सामने आई, उसने एक परिवार की दुनिया उजाड़ दी—अभिलाषा अब इस दुनिया में नहीं रही।
सूत्रों के अनुसार, अभिलाषा का प्रियांशु बंजारा (निवासी कटगी, अमोदी) के साथ प्रेम संबंध था। यह रिश्ता धीरे-धीरे एक ऐसे जाल में बदल गया, जिसमें अभिलाषा जॉन फंसती चली गई। आरोप है कि प्रियांशु बंजारा ने शादी का झांसा देकर उसके साथ शारीरिक, मानसिक और आर्थिक शोषण किया। हर दिन बढ़ता दबाव, लगातार अपमान और बदनाम करने की धमकियां—इन सबने अभिलाषा जॉन को अंदर से तोड़ दिया। वह हालात से लड़ती रही, सहती रही, लेकिन अंततः उसे ऐसा लगा कि शायद मौत ही इस पीड़ा से मुक्ति का रास्ता है।
अभिलाषा की मां नीरस लता जॉन, जो स्वयं 2016 में सेवानिवृत्त नर्स हैं, आज टूटे स्वर में अपनी बेटी की कहानी सुनाती हैं। बांग्लाभाटा निवासी और वर्तमान में बिलाईगढ़ वार्ड नंबर 06 में रहने वाली मां बताती हैं कि अभिलाषा ने घर आकर उन्हें अपने रिश्ते के बारे में बताया था। दोनों शादी करना चाहते थे, लेकिन जातिगत भिन्नता के कारण परिवार ने आपत्ति जताई। मां ने मना किया, समझाया, लेकिन अभिलाषा अपने प्रेम में अडिग रही।प्यार को पीछे छोड़ प्रियांशु ने दूसरी लड़की से रचा लिया विवाह।27 नवंबर के बाद से अभिलाषा की पीड़ा और गहरी हो गई। उसने साफ शब्दों में मां को बताया कि प्रियांशु उसे मानसिक रूप से प्रताड़ित कर रहा है, शारीरिक और आर्थिक रूप से परेशान कर रहा है और हर जगह बदनाम करने की कोशिश कर रहा है। मां ने बेटी को उससे दूरी बनाने और बातचीत बंद करने की सलाह दी। लेकिन शायद तब तक बहुत देर हो चुकी थी। 9 दिसंबर 2025 को मां ने बेटी को फोन लगाया—फोन नहीं उठा। 10 दिसंबर 2025 को जो खबर मिली, उसने मां के पैरों तले जमीन खिसका दी—अभिलाषा की मौत हो चुकी थी।यह सवाल अब सिर्फ एक परिवार का नहीं रहा। यह सवाल प्रशासन से है—क्या किसी महिला के टूटने का इंतजार किया जाता है, तब जाकर कार्रवाई होती है? क्या कार्यस्थल, पुलिस, समाज और सिस्टम की जिम्मेदारी नहीं बनती कि ऐसे मामलों में समय रहते हस्तक्षेप किया जाए? अगर एक शिक्षित, नौकरीपेशा नर्स भी खुद को असहाय महसूस करने लगे, तो आम बेटियों की हालत का अंदाजा लगाना मुश्किल नहीं।
आज कसडोल की यह कहानी पूरे बलौदा बाजार जिले के लिए एक आईना है। यह घटना बताती है कि प्रेम, विवाह, जाति और सत्ता के नाम पर होने वाला शोषण कैसे धीरे-धीरे किसी की जिंदगी छीन लेता है। सवाल अब भी हवा में तैर रहा है—अभिलाषा को इंसाफ कब मिलेगा? और उससे भी बड़ा सवाल—क्या अगली अभिलाषा को बचाने के लिए सिस्टम समय पर जागेगा, या फिर एक और फाइल बंद कर दी जाएगी?

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