
बस्ती स्वास्थ्य विभाग में भ्रष्टाचार का ‘महादंगल’: 45% कमीशन वाली फाइलें और कागजी घोड़ों पर दौड़ता NRHM का बजट
बस्ती स्वास्थ्य विभाग की 'सर्जरी': 45% कमीशन का कैंसर और फाइलों में दफन ईमानदारी! भ्रष्टाचार का 'गोरखपुर मॉडल': बस्ती में इलाज कम, प्रिंटिंग के नाम पर लूट ज्यादा!
अजीत मिश्रा (खोजी)
बस्ती स्वास्थ्य विभाग: कमीशनखोरी का ‘गोरखपुर मॉडल’ और कागजों पर दौड़ता करोड़ों का खेल!
- साहब! ये ‘सेवा’ है या ‘सेल’? 2.5 करोड़ के बजट पर 45% कमीशन की सेंधमारी!
- बस्ती में ‘बाबा’ का चमत्कार: एक मालिक, आठ फर्में और करोड़ों की मलाई!
- अंधेर नगरी, भ्रष्ट प्रशासन: बाबू और डॉक्टर की जुगलबंदी ने स्वास्थ्य बजट को बनाया ‘एटीएम’!
- बाहरी ठेकेदारों पर ‘इश्क’ बेहिसाब, बस्ती के व्यापारियों का हक मार रहे साहब!
- DM साहब की नाक के नीचे ‘साइलेंट इकोनॉमिक क्राइम’, क्या बेखबर है प्रशासन?
- ई-पोर्टल की बाजीगरी या खुली डकैती? संदीप राय और डॉ. बृजेश शुक्ल के चक्रव्यूह में फंसा विभाग!
- सवाल: 10 हजार पैम्फलेट के ऑर्डर पर 5 हजार की सप्लाई क्यों? बाकी रकम किसकी जेब में?
ब्यूरो रिपोर्ट: बस्ती मंडल, उत्तर प्रदेश
बस्ती। क्या बस्ती का स्वास्थ्य विभाग केवल फाइलों में इलाज कर रहा है? यह सवाल आज शहर की फिजाओं में तैर रहा है। जिले के स्वास्थ्य महकमे में एक ऐसा ‘साइलेंट इकोनॉमिक क्राइम’ (मौन आर्थिक अपराध) चल रहा है, जिसने भ्रष्टाचार के सारे पुराने रिकॉर्ड ध्वस्त कर दिए हैं। चर्चा आम है कि जब गोरखपुर के चहेते ठेकेदार मुख्य चिकित्सा अधिकारी (CMO) को 45 फीसदी तक का मोटा कमीशन दे सकते हैं, तो भला बस्ती के स्थानीय व्यापारियों को काम क्यों मिले?बस्ती जिले का स्वास्थ्य विभाग इन दिनों इलाज के लिए नहीं, बल्कि अपनी ‘आर्थिक सर्जरी’ के लिए चर्चा में है। जिले के स्वास्थ्य महकमे में भ्रष्टाचार का ऐसा दीमक लगा है जो गरीबों के हक के करोड़ों रुपये डकार रहा है। ताज्जुब की बात यह है कि यहाँ नियम-कानून कागजों पर दम तोड़ रहे हैं और कमीशनखोरी का एक ऐसा ‘गोरखपुर मॉडल’ लागू किया गया है, जिसने जिले के ईमानदार सिस्टम को लकवा मार दिया है।
एक मालिक, आठ फर्में और करोड़ों का ‘खेल’ पिंटू बाबा’ का मायाजाल: एक मालिक, आठ चेहरे
भ्रष्टाचार की इस पटकथा का मुख्य नायक गोरखपुर का एक ठेकेदार पिंटू तिवारी उर्फ बाबा बताया जा रहा है। जांच का विषय यह है कि आखिर क्यों बस्ती के अधिकारियों को जिले के व्यापारियों पर भरोसा नहीं है? सूत्र बताते हैं कि पिंटू तिवारी ने बाबा इंटरप्राइजेज, पीआर इंटरप्राइजेज, अंकिता अभ्यास पुस्तिका, एके एसोसिएट्स, और जीएस इंटरप्राइजेज जैसी लगभग आठ फर्में बना रखी हैं। खेल बड़ा सीधा है: DM और CDO को शक न हो, इसलिए टेंडर को टुकड़ों में बांटा जाता है और बारी-बारी से इन आठों फर्मों को काम थमा दिया जाता है। साल भर में करीब 2.5 करोड़ रुपये का प्रिंटिंग और स्टेशनरी का काम इन्हीं चहेती फर्मों को दिया गया। जब मालिक एक ही है, तो यह स्वस्थ प्रतिस्पर्धा नहीं, बल्कि सरकारी धन की सीधी बंदरबांट है।
भ्रष्टाचार की जड़ें इतनी गहरी हैं कि गोरखपुर के एक ही रसूखदार ठेकेदार, पिंटू तिवारी उर्फ बाबा, की आठ अलग-अलग फर्मों (जैसे बाबा इंटरप्राइजेज, पीआर इंटरप्राइजेज, अंकिता अभ्यास पुस्तिका आदि) को बारी-बारी से काम थमाया जा रहा है। खेल इतना शातिर है कि जिलाधिकारी (DM) और मुख्य विकास अधिकारी (CDO) को कानोकान खबर न हो, इसलिए एक ही मालिक की अलग-अलग फर्मों के नाम पर टेंडर बांटे जाते हैं। साल भर में लगभग 2 से 2.5 करोड़ रुपये का भुगतान स्वास्थ्य विभाग की जेब से निकालकर इन चहेते ठेकेदारों की तिजोरी में डाल दिया जा रहा है।
कमीशन के ‘खिलाड़ी’: संदीप राय और डॉ. बृजेश शुक्ल का गठजोड़?
रिपोर्ट के मुताबिक, इस पूरे सिंडिकेट के पीछे बाबू संदीप राय और डॉ. बृजेश शुक्ल का नाम प्रमुखता से उभर रहा है। आरोप है कि ई-ऑफिस पोर्टल पर जानबूझकर बजट की प्रतियां संलग्न नहीं की जातीं, ताकि 10 लाख रुपये तक के ऑर्डर बिना किसी टेंडर प्रक्रिया के डीएम साहब से अनुमोदित करा लिए जाएं। यह सीधे तौर पर नियमों की धज्जियां उड़ाना और प्रशासन की आंखों में धूल झोंकने जैसा है।
बड़ा सवाल: दवाओं के स्टोर इंचार्ज स्टेशनरी क्यों प्राप्त कर रहे हैं? क्या इसलिए कि उनका भी कमीशन सेट है? अगर 10 हजार पैम्फलेट का ऑर्डर होता है, तो मौके पर सिर्फ 5-6 हजार ही पहुंचते हैं। बाकी पैसा किसकी जेब में जा रहा है?
45 फीसदी कमीशन: मेज के नीचे का गणित
बस्ती के व्यापारियों को काम इसलिए नहीं मिलता क्योंकि वे ‘राजनीति’ करते हैं, जबकि गोरखपुर के ठेकेदार चुपचाप 45 फीसदी कमीशन अधिकारियों की टेबल पर पहुंचा देते हैं।
- घटिया गुणवत्ता: कमीशन की रकम इतनी भारी है कि सामान की गुणवत्ता और मात्रा दोनों से समझौता किया जाता है।
- गिनती में हेराफेरी: अगर 10,000 पैम्फलेट का ऑर्डर दिया जाता है, तो आपूर्ति मात्र 5 से 6 हजार की होती है। बाकी का पैसा अधिकारियों और ठेकेदार की आपसी मिलीभगत की भेंट चढ़ जाता है।
पोर्टल की बाजीगरी और ‘सिंडिकेट’ के खिलाड़ी
इस पूरे खेल के पीछे बाबू संदीप राय और डॉ. बृजेश शुक्ल का नाम प्रमुखता से लिया जा रहा है। आरोप है कि ई-ऑफिस पोर्टल पर जानबूझकर बजट की ‘एलेटेड’ प्रतियां संलग्न नहीं की जातीं।
रणनीति: 10 लाख रुपये से कम के ऑर्डर तैयार किए जाते हैं ताकि टेंडर की पेचीदगियों से बचा जा सके और सीधे जिलाधिकारी से अनुमोदन प्राप्त कर लिया जाए। चूँकि अधिकारियों को कंप्यूटर और पोर्टल की तकनीकी बारीकियों का कम ज्ञान होता है, इसी का फायदा उठाकर यह सिंडिकेट फाइलों को अपनी उंगलियों पर नचा रहा है।
स्टोर इंचार्ज की ‘मेहरबानी’ या मजबूरी?
सबसे बड़ा सवाल दवाओं के स्टोर इंचार्ज की भूमिका पर है। नियमानुसार दवाओं के स्टोर इंचार्ज को स्टेशनरी और प्रिंटिंग सामग्री से क्या लेना-देना? लेकिन यहाँ स्टोर इंचार्ज ही सामान प्राप्त कर रहे हैं और ‘सब ठीक है’ की रिपोर्ट लगा रहे हैं। यह स्पष्ट करता है कि नीचे से ऊपर तक कड़ियां जुड़ी हुई हैं और एनआरएचएम (NRHM) के करोड़ों रुपये का बंदरबांट सुचारू रूप से जारी है।
बस्ती का पैसा ‘बाहरियों’ की जेब में!
बस्ती के स्थानीय कारोबारियों को दरकिनार कर गोरखपुर और लखनऊ की फर्मों को उपकृत करना सीधे तौर पर जिले के आर्थिक ढांचे पर चोट है। अधिकारियों की ‘बाहरी प्रेम’ की वजह सिर्फ और सिर्फ वह मोटा कमीशन है, जो बस्ती के लोग शायद नहीं दे पा रहे। विडंबना देखिए, बस्ती के अधिकारियों को अपने जिले के व्यापारियों पर भरोसा नहीं है। तर्क दिया जाता है कि बस्ती वाले ‘राजनीति’ ज्यादा करते हैं। लेकिन असलियत तो यह है कि बाहर के ठेकेदार बिना सवाल किए 45% कमीशन मेज के नीचे से सरका देते हैं। एनआरएचएम (NRHM) का पैसा, जो गरीबों के इलाज के लिए है, वह होर्डिंग, पोस्टर और कागजी घोड़ों को दौड़ाने में फूंका जा रहा है।
प्रशासनिक चुनौती:
क्या शासन इस ‘मौन आर्थिक अपराध’ की उच्च स्तरीय जांच कराएगा? क्या उन फाइलों को फिर से खोला जाएगा जिन्हें 10-10 लाख के टुकड़ों में बांटकर स्वीकृत कराया गया? बस्ती की जनता और यहाँ के बेरोजगार व्यापारी आज इस लूटतंत्र के खिलाफ जवाब मांग रहे हैं।
प्रशासन से तीखे सवाल:
- क्या DM और CDO महोदय को भनक भी है कि उनके डिजिटल हस्ताक्षरों का उपयोग किस तरह के ‘खेल’ के लिए हो रहा है?
- एक ही व्यक्ति की आठ फर्मों को बार-बार काम देना क्या वित्तीय नियमों का उल्लंघन नहीं है?
- घटिया क्वालिटी का सामान और कम मात्रा में आपूर्ति करने वाले इन ‘सफेदपोश’ लुटेरों पर कार्रवाई कब होगी?
बस्ती की जनता अब जवाब चाहती है। अगर ‘गोरखपुर मॉडल’ के नाम पर लूट का यह सिलसिला नहीं रुका, तो स्वास्थ्य विभाग की यह सड़ांध पूरे सिस्टम को बीमार कर देगी।





















