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“सीएमओ साहब, मरीज के मरने के बाद ही क्यों जागता है आपका ‘सील’ करने वाला दस्ता?”

अमृत हॉस्पिटल या 'मौत का कुआं'? फार्मासिस्ट बना डॉक्टर, एएनएम बन गई सर्जन! लाइसेंस की आड़ में 'कमीशन' का खेल: कब तक मासूमों की लाशों पर फलेंगे-फूलेंगे स्वास्थ्य अधिकारी?

अजीत मिश्रा (खोजी)

यमराज’ के नुमाइंदे या अस्पताल? मरीज के मरने के बाद ही क्यों जागता है स्वास्थ्य महकमा!

  • तीन गलत इंजेक्शन और बुझ गया घर का चिराग; बस्ती में स्वास्थ्य विभाग की लापरवाही ने ली एक और जान!
  • गंगा मैया की कसम खाएं साहब! बिना ‘सुविधा शुल्क’ के कैसे चल रहे थे फर्जी डिग्री वाले अस्पताल?
  • ‘नीम हकीम खतरा-ए-जान’: एएनएम करा रही थी ऑपरेशन, तड़प-तड़प कर मरी महिला, जिम्मेदार कौन?
  • मरीज मरा तो ताला जड़ा: बस्ती स्वास्थ्य महकमे की ‘पोस्टमार्टम’ वाली कार्रवाई पर उठे गंभीर सवाल।

बस्ती/मुंडेरवा। उत्तर प्रदेश के स्वास्थ्य सिस्टम की नाक के नीचे ‘अमृत’ के नाम पर मौत का जो धंधा चल रहा था, उसने एक बार फिर पूरे महकमे को कटघरे में खड़ा कर दिया है। मुंडेरवा कस्बे में स्थित ‘अमृत हॉस्पिटल’ में लोहदर निवासी 27 वर्षीय रोशनी की मौत कोई पहली घटना नहीं है, बल्कि यह उस भ्रष्ट और संवेदनहीन तंत्र का नतीजा है जो चांदी के चंद सिक्कों के बदले इंसानी जिंदगियों का सौदा करता है।

सवाल सीधा और बेहद कड़वा है—”सीएमओ साहब, आखिर मरीज के मरने के बाद ही अस्पताल क्यों सील होते हैं? क्या स्वास्थ्य विभाग ने यह कसम खा रखी है कि जब तक कोई हंसता-खेलता परिवार उजड़ नहीं जाएगा, तब तक उनकी फाइलें आगे नहीं बढ़ेंगी?”

डिग्री ‘फार्मा’ की, हैसियत ‘सर्जन’ की—अंधेर नगरी चौपट राजा!

हैरानी की बात तो यह है कि जिस अस्पताल को स्वास्थ्य विभाग ने धड़ल्ले से एनओसी और लाइसेंस बांट रखे थे, उसकी सच्चाई जानकर रूह कांप जाती है।

  • अस्पताल का मालिक: मनीष श्रीवास्तव, जिसके पास कथित तौर पर सिर्फ डी. फार्मा की डिग्री है, लेकिन वह खुद को किसी बड़े सर्जन से कम नहीं समझता।
  • मालकिन (पत्नी): विजेता श्रीवास्तव, जो एएनएम की डिग्री लेकर खुद को गायनेकोलॉजिस्ट (स्त्री रोग विशेषज्ञ) समझकर महिलाओं के ऑपरेशन और डिलीवरी तक कर रही थी।

कहावत है कि ‘नीम हकीम खतरा-ए-जान’, लेकिन यहाँ तो पूरा का पूरा अस्पताल ही ‘यमराज के दूतों’ की फौज चला रही थी। बिना किसी योग्य डॉक्टर की मौजूदगी के, क्षेत्र की अप्रशिक्षित लड़कियों को काम पर रखकर मरीजों को मौत के इंजेक्शन लगाए जा रहे थे।

तीन इंजेक्शन और बुझ गया घर का चिराग

मृतका रोशनी के पति अनिल कुमार की रोती-बिलखती आंखें और उनका दर्द कलेजा चीर देने वाला है। अनिल अपनी पत्नी को महज मामूली खुजली की शिकायत पर इलाज के लिए लाया था। वहां मौजूद अप्रशिक्षित स्टाफ और नर्सों ने बिना किसी डॉक्टर की सलाह के एक के बाद एक तीन घातक इंजेक्शन ठोक दिए।

इंजेक्शन लगते ही रोशनी के मुंह से झाग निकलने लगा। जब हालत बिगड़ी, तो अस्पताल का संवेदनहीन स्टाफ मदद करने के बजाय मरीज को जबरन बाहर निकालने लगा। एम्बुलेंस तक देने से मना कर दिया गया। अस्पताल से जबरन मोटरसाइकिल पर लादकर जिला अस्पताल ले जाते समय रोशनी के शरीर ने रास्ते में ही दम तोड़ दिया। जब परिजन वापस अस्पताल पहुंचे, तो हत्यारे डॉक्टर और स्टाफ पिछले दरवाजे से फरार हो चुके थे। दवा की पर्ची मांगने पर परिजनों को धमकी दी गई।

साहब की ‘गंगा मैया’ की कसम और कमीशन का खेल!

अब जरा मुख्य चिकित्सा अधिकारी (CMO) डॉ. राजीव निगम, डिप्टी सीएमओ और नर्सिंग होम के नोडल अधिकारी डॉ. एसबी सिंह की भूमिका पर भी नजर डालिए। जनता पूछ रही है कि आखिर किस आधार पर ऐसे मानकविहीन और फर्जी अस्पतालों को धड़ल्ले से लाइसेंस जारी कर दिए जाते हैं?

क्या सीएमओ साहब और उनके डिप्टी साहब गंगा मैया की कसम खाकर कह सकते हैं कि उन्होंने इस मौत के कुएं को लाइसेंस देने के बदले कोई ‘सुविधा शुल्क’ (कमीशन) नहीं लिया? क्या बिना मोटी रकम के लेनदेन के, ऐसे फर्जी डॉक्टरों और एएनएम के भरोसे चल रहे अस्पतालों को हरी झंडी मिल सकती है?

अमृत हॉस्पिटल तो महज एक नजीर है, बस्ती जिले में सल्टौआ से लेकर कैली रोड और पचपेड़िया रोड तक ऐसे दर्जनों फर्जी अस्पताल सील होने के बाद फिर से ‘बैकडोर’ से संचालित हो रहे हैं। अधिकारी जांच के नाम पर महीनों फाइलें दबाए बैठते हैं और जब कोई मौत होती है, तो ‘सील’ करने का ड्रामा रचकर जनता का गुस्सा शांत करने की कोशिश की जाती है।

अब केवल ‘सीलिंग’ से काम नहीं चलेगा, कातिलों को जेल भेजो!

जनता के भारी आक्रोश और शव को एसपी कार्यालय के सामने रखकर किए गए प्रदर्शन के बाद पुलिस ने दो आरोपियों को गिरफ्तार जरूर किया है और स्वास्थ्य विभाग ने अस्पताल को सील कर दिया है। लेकिन सवाल वही है कि रोशनी को उसका जीवन कौन लौटाएगा?

अब समय आ गया है कि केवल अस्पताल को सील करके और कागजी खानापूर्ति करके मामले को रफा-दफा न किया जाए। जनता मांग करती है कि:

  • अस्पताल के फर्जी डिग्रीधारी संचालकों पर हत्या का मुकदमा चलाकर सख्त सजा दी जाए।
  • लाइसेंस देने और निरीक्षण में लापरवाही बरतने वाले सीएमओ, डिप्टी सीएमओ और नोडल अधिकारी पर भी सह-आरोपी के रूप में कार्रवाई हो।

जब तक सफेदपोश अधिकारियों और मौत के सौदागर डॉक्टरों की इस साठगांठ को नेस्तनाबूद नहीं किया जाएगा, तब तक उत्तर प्रदेश की स्वास्थ्य व्यवस्था वेंटिलेटर पर ही रहेगी और मासूम लोग इसी तरह ‘अस्पतालों’ में अपनी जान गंवाते रहेंगे।

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