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ट्रेनों में तस्करी का नंगा नाच: क्या रेलवे सुरक्षा के नाम पर सिर्फ मज़ाक हो रहा है?

ट्रेनों में तस्करी का नंगा नाच: क्या सुरक्षा के नाम पर रेलवे सिर्फ मज़ाक कर रहा है? गांजा और शराब का 'हाइवे' बनी ट्रेनें: क्या सिस्टम के भीतर ही बैठे हैं तस्कर?

अजीत मिश्रा (खोजी)

ट्रेनों में तस्करी का ‘नेटवर्क’: सुरक्षा व्यवस्था पर बड़ा सवालिया निशान

  • आरपीएफ और जीआरपी की नाक के नीचे से बह रही शराब की नदियां, तस्कर बेखौफ!
  • यात्रियों की आड़ में तस्करी का खेल: पुलिस की नाकामी या मिलीभगत का सबूत?
  • सुरक्षा का दावा खोखला: ट्रेनों में तस्करों के आगे नतमस्तक हुआ रेलवे प्रशासन!

बस्ती/गोरखपुर: क्या भारतीय रेलवे अब यात्रियों की सुरक्षा के लिए सुरक्षित रह गया है? रिपोर्ट के मुताबिक, पूर्व से पश्चिम तक दौड़ने वाली ट्रेनें अब नशीले पदार्थों और अवैध शराब की तस्करी का मुख्य जरिया बन चुकी हैं।पूर्व से पश्चिम तक दौड़ने वाली ट्रेनें अब केवल यात्रियों को ढोने का काम नहीं कर रही हैं, बल्कि ये गांजा और अवैध शराब की तस्करी का ‘हाइवे’ बन चुकी हैं।

सिस्टम की विफलता या मिलीभगत?

यह कोई इत्तेफाक नहीं है कि आए दिन ट्रेनों से भारी मात्रा में शराब और नशीले पदार्थ बरामद हो रहे हैं। गोरखपुर-रायबरेली एक्सप्रेस हो या अन्य ट्रेनें, तस्कर बेखौफ होकर अपनी खेप पहुँचा रहे हैं। सबसे बड़ा सवाल यह है कि सुरक्षा की इतनी परतें होने के बावजूद, ये तस्कर ट्रेनों के अंदर तक कैसे पहुँच जाते हैं? क्या रेलवे सुरक्षा बल (आरपीएफ) और जीआरपी की नज़रें केवल कागज़ों पर काम कर रही हैं?

​तस्करी का विस्तृत जाल

​तस्करों का गिरोह नेपाल से गांजा लाकर बिहार के रास्ते उत्तर प्रदेश, दिल्ली और पंजाब तक पहुँचा रहा है। केवल गांजा ही नहीं, अवैध शराब की तस्करी भी चरम पर है। हाल ही में गोरखपुर-रायबरेली एक्सप्रेस ट्रेन में सहायक वाणिज्य प्रबंधक के पास से 45 पाउच देशी शराब बरामद हुई थी, जिसके बाद कोच अटेंडेंट को गिरफ्तार किया गया। यह स्पष्ट करता है कि तस्करी का यह नेटवर्क केवल बाहरी लोगों तक सीमित नहीं है, बल्कि सिस्टम के भीतर भी पैठ बना चुका है।

​शातिराना तरीके और पुलिस की नाकामी

​रिपोर्ट के अनुसार, तस्कर बहुत ही शातिराना ढंग से काम कर रहे हैं। वे यात्रियों के बीच बैठकर चलते हैं, उनके पास वैध टिकट होते हैं, और वे इतनी चतुराई से अपनी पहचान छुपाते हैं कि पुलिस भी उन्हें पहचान नहीं पाती। यह स्वीकार करना कि पुलिस ‘कैरियर’ की पहचान नहीं कर पा रही है, सीधे तौर पर सुरक्षा तंत्र की अक्षमता को दर्शाता है।तस्करों ने तस्करी के लिए बहुत ही संगठित तरीके अपना रखे हैं:

  • भेष बदलकर सफर: तस्कर सामान्य यात्रियों की तरह ट्रेन में चढ़ते हैं, उनके पास वैध टिकट होते हैं, जिससे सुरक्षा बलों के लिए उन्हें पहचानना लगभग नामुमकिन हो जाता है।
  • गुप्त तरीके से पैकिंग: शराब की खेप को सीटों के नीचे, कागजों में लपेटकर या गत्ते के बॉक्स में छिपाया जाता है।
  • तस्करी के अलग-अलग रास्ते: इन तस्करों के पास गांजे की अपनी एक गुप्त कोड भाषा भी है, जिसे ‘धमेबाज’ कहा जाता है।

​सुरक्षा तंत्र की सुस्ती

​आरपीएफ और जीआरपी लगातार चेकिंग के दावे कर रही हैं, लेकिन हकीकत यह है कि बरामदगी के बावजूद तस्करों पर नकेल कसने में वे विफल साबित हो रहे हैं। आरपीएफ बस्ती और स्पेशल टास्क टीम अब सीसीटीवी फुटेज खंगालने का राग अलाप रही है।

​क्या सीसीटीवी फुटेज देखना ही एकमात्र समाधान है? यदि रेलवे प्रशासन और पुलिस के पास इन गिरोहों की पहले से जानकारी थी, तो फिर इन्हें समय रहते क्यों नहीं रोका गया? 8,280 लीटर शराब की बरामदगी यह साबित करती है कि यह कोई छिटपुट मामला नहीं, बल्कि एक सुनियोजित और बड़ा रैकेट है।रेलवे पुलिस के दावे कितने खोखले हैं, इसका अंदाज़ा इस बात से लगाया जा सकता है कि वे अब भी “सीसीटीवी फुटेज खंगालने” और “टीप” मिलने का इंतज़ार कर रहे हैं। क्या प्रशासन को यह नहीं पता था कि यूपी-बिहार के रास्ते गांजा और अवैध शराब का यह खेल लंबे समय से चल रहा है? क्या अब तक की गई सारी चेकिंग सिर्फ खानापूर्ति थी?

तस्करों के इस नेटवर्क ने नेपाल से लेकर दिल्ली और मुंबई तक का जाल बिछा रखा है, जबकि हमारा सुरक्षा तंत्र अभी भी शुरुआती जांच और फुटेज की फाइलों में उलझा हुआ है।

आम जनता को अब सिर्फ बयान नहीं, ठोस कार्रवाई चाहिए। अगर रेलवे प्रशासन ट्रेनों में फैलते इस ज़हर को नहीं रोक सकता, तो क्या यह माना जाए कि तस्करों की पहुंच सिस्टम के अंदर तक है।

​जनता का भरोसा दांव पर

​जब रेलवे का कर्मचारी ही तस्करी में संलिप्त पाया जाए, तो आम यात्री किस पर भरोसा करे? तस्करों की यह पहुंच और निर्भीकता यह दर्शाती है कि सुरक्षा व्यवस्था में कहीं न कहीं बड़ी चूक है या मिलीभगत। केवल स्टेशनों पर छापा मारने से कुछ नहीं होगा; जब तक इस नेटवर्क के सरगनाओं को नहीं पकड़ा जाता, तब तक ट्रेनों में तस्करी का यह ‘खेल’ जारी रहेगा।

​अब समय आ गया है कि रेलवे प्रशासन अपनी विफलता को स्वीकार करे और इस संगठित अपराध को खत्म करने के लिए सख्त और त्वरित कदम उठाए, न कि केवल जांच के नाम पर खानापूर्ति करे।

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